आम आदमी बने रहने की कोई नहीं सोचता-आलेख


कहने को कई लोग आपसी वार्तालाप में ऐसी टिप्पणियां कर जाते हैं जो उनके स्वयं के समझ में नहीं आतीं तो किसी अन्य व्यक्ति के समझ में क्या आ जातीं  हैं।

एक सज्जन ने कहा कि‘नेता बनने की बजाय मैं भिखारी बनना चाहूंगा।’

एक सज्जन को मैने कहते सुना-‘मैं संत की बजाय वैश्या बनना चाहूंगा।’

किसी ने कहा-‘मैं पुलिस वाला बनने की बजाय मूंगफली बेचने वाला बनना चाहूंगा।

मतलब यह कि किसी खास आदमी से नाराज होने के कारण  कोई व्यक्ति वैसा नहीं बनना चाहता-इस बात की घोषणा तो वह करता है पर आम आदमी बने रहने की कोई इच्छा छोड़कर वह कुछ बनना चाहता है।
हर कोई अपने पास शक्ति के स्त्रोत बनाये रखना चाहता है। पद, पैसा और प्रतिष्ठा पाने के मोह में सब अंधी दौड़ प्रतियोगिता के धावक है। हर कोई आम आदमी की जमात से बाहर  निकलकर खास आदमी की तरह चमकना चाहता है। अपने से दूर उसे आकर्षण का केंद्र दृष्टिगोचर होता है। वहां पहुंचता है तो उसे फिर वही अंधेरा दिखाई देता है। वह फिर दूसरी जगह आकर्षण की तलाश करता है। कोई पद मिल गया तो उससे संतोष नहीं होता उसके साथ अन्य लाभ भी होना चाहिए। धन का लाभ होता है तो वह अन्य प्रकार के लालच भी करता है। घर के बाहर किसी अन्य महिला से संपर्क बने यह भी कुछ लोग अपने अंदर विचार करते हैं। कोई व्यक्ति उसके सामने सच न कहे यह अहंकार का भाव उसमें आता है। अपने ही बनाये गये जाल में पकड़ा   जाता है और फिर  कहता है कि ‘‘मेरे पास सब है पर शांति नहीं है जिसके पास शांति है वही सुखी है।‘

जिसके पास धन प्रचुर मात्रा में नहीं है, न वह किसी उच्च  पद पर विराजमान है, न किसी उच्च पद वाले व्यक्ति का हाथ उसके ऊपर है और न ही वह देह से बलवान होता  है, उसे भी अपने ऐसे गुणों का बखान करने की आदत होती है जो उसमें है ही नहीं। वह अपने को खास आदमी साबित करना चाहता है। हर आदमी  आम है पर खास कहलाना चाहता है। यह भाव  है आदमी के चरित्र और विचारों में पतन का कारण ।

एक बार आम आदमी होने का बोध धारण कर लो और खास आदमी को दूर से देखकर ही अपनी नजर फेर लो। ऐसा नहीं कर सकते  तो पहले उस खास आदमी की दिनचर्या देखो उसमें ऐसा कुछ नहीं होता जो आम आदमी में नहीं होता। उसमें भी  वैसे ही गुण और अवगुण होते हैं जैसे आम आदमी में होते हैं। जब अपने आम आदमी की तरह अनुभव करोगे तुम्हारे ज्ञान चक्षु खुल जायेंगे। यह अनुभव कर सकते हो कि उसके और तुम्हारे अंतर्मन में कोई अंतर नहीं है। आम आदमी होने को अर्थ है जीवन के प्रति दृष्टा भाव रखना। जब हम दृष्टा भाव से देखेंगे तब हमारे मन की बेचैनी दूर हो जायेगी। हमारे जैसी हालत में सब जी रहे हैं। हां, कुछ बाहरी दिखावा करते हैं और उनके देखकर हम भी उन जैसा करने लग जाते हैं फिर अपने अंदर ही यह अहसास होता हैं कि हम केवल अपने मुख से अपनी झूठी प्रशंसा  कर रहे हैं। 

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टिप्पणियाँ

  • mahendra mishra  On मई 11, 2008 at 10:33 पूर्वाह्न

    अपने अंदर ही यह अहसास होता हैं कि हम केवल अपने मुख से अपनी झूठी प्रशंसा कर रहे हैं।
    बहुत बढ़िया आलेख प्रस्तुति के लिए धन्यवाद

  • meenakshi  On मई 11, 2008 at 10:43 पूर्वाह्न

    पढ़ते तो हमेशा है और सोचते हैं कि आप के लेख टिप्पणी के
    मोहताज़ नहीं . आज अनायास जी चाहा कि अपने मन के भाव
    लिख डालें. आपके सभी ब्लॉग एक से बढ़कर एक हैं. जीवन को
    आसान बनाने के छोटे छोटे मंत्र यहाँ हैं जो बड़ी गहरी बात समझा

    जाते हैं. आभार

  • dr parveen chopra  On मई 11, 2008 at 1:01 अपराह्न

    जिंदगी की बेसिक सच्चाई आप ने हमें परोस दीं…..काश, हम लोग यह सब बचपन ही से समझ लें।

  • समीर लाल  On मई 11, 2008 at 11:14 अपराह्न

    बिल्कुल सही कह रहे हैं. अच्छा विमर्श.

  • raviwar  On मई 13, 2008 at 7:05 पूर्वाह्न

    बहुत ही बढ़िया….. जनमानस को इतनी बारीकि से समझने और उस पर इतनी सुदरता से रोशनी जालने के लिए बहुत बहुत साधुवाद.

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