मै अखबार आज भी क्यों पढ़ता हूं-हास्य व्यंग्य


          मैने अखबार पढ़ना बचपन से ही शुरू किया क्योंकि मोहल्ले का वाचनालय हमारे किराये के घर के पास में ही था। धीरे-धीरे इसकी ऐसी आदत हो गयी कि जब हमने मकान बदले तो भी मैं सुबह वाचनालय अखबार पढ़ने जरूर जाता और धीरे-धीरे शहर बढ़ने के साथ  थोड़ी दूर एक कालोनी में आया और वहां कोई वाचनालय नहीं होने के कारण अखबार मंगवाना शुरू किया।

इधर इलैक्ट्रोनिक मीडिया के तेजी से बढ़ने के साथ ही डिस्क कनेक्शन भी लग गया और एक लायब्रेरी भी पास में खुल गयी जहां मैं अपने घर आने वाले अखबार के अलावा अन्य अखबार वहां कभी कभी पढ़ लेता हूं। कई बार सोचता हूं कि अखबार बंद कर दूं पर श्रीमतीजी उसे बड़ी रुचि के साथ पढ़ती हैं और वही हमें बतातीं हैं कि आज अमुक जगह आपको शवयात्रा या उठावनी में जाना है।

सुबह जब मैं अपने घर के बाहर पेड़ के नीचे योगसाधना करता हूं  तब अखबार वाला फैंक कर चला जाता है और उस समय वह कई बार मेरे ऊपर आकर गिरता है। खासतौर से जब उष्टासन या सर्वांगासन के समय वह आकर गिरता है तब अगर श्रीमतीजी वहां  होती है तो जोर-जोर से  हंसती हैं।

कई बार देर होने की वजह से अखबार नहीं पढ़ पाता तो श्रीमती जी मोबाइल पर सूचना देतीं हैं ‘आपने आप अखबार नहीं पढ़ा आज उठावनी पर जाना है‘ या ‘आज आप जल्दी निकल गये उधर शवयात्रा पर जाना है’। शहर से बाहर होने के बावजूद आप अपने लोगों से कट नहीं सकते। किसी कि शादी में आप जायें या नहीं या कोई आपको बुलाये या नहीं पर गमी में आपको जाना ही चाहिये और इसी कारण इसकी सूचना कहीं न कहीं से होना जरूरी है। कई बार निकट व्यक्ति होने के कारण सूचना फोन पर आ जाती है, पर अगर थोड़ा दूर का हो तो उस फिर उसके लिये अखबार एक मददगार साबित होता है।

कई बार ऐसे अवसरों पर दूसरे शहर भी जाना पड़ता है। उस समय उस शहर में बस स्टेंड या रेल्वे स्टेशन पर ही अखबार खरीद लेता हूं जिससे पता चल जाता है कि उठावनी कहां है। कई बार तो  ऐसा भी हुआ है कि जिनके घर हम जा रहे हैं उनका पता हमें इसीलिये नहीं होता क्योंकि पहले कभी उनके घर गये नहीं हैं या उसकी आवश्यकता नहीं अनुभव की। तब ऐसे ही अखबार से पता लिया है। एक बार तो हम छहः लोग एक साथ एक दूसरे शहर उठावनी में शामिल होने जा रहे थे पर किसी के पास पता नहीं था। तब मैंने ही अखबार का आईडिया सुझाया और मेरा अनुमान सही निकला।  हम समय पर वहां पहुंच गये और वहां किसी को नहीं बताया कि अखबार से पता निकाल कर लायें हैं वरना कोई सुनता तो क्या कहता कि निकटस्थ लोग होकर इनको घर का पता तक नहीं मालुम था। वह समय यह सफाई देने का नहीं होता कि जिसके यहां आये हैं वह हमारे पास कई बार आये पर हम उनके यहां पहली बार आये हैं।

एक बार तो हम एक शोक कार्यक्रम में शामिल होने गये तो जिस व्यक्ति के यहां जा रहे थे उसके घर पर न होने की पक्की संभावना थी क्योंकि उनके पिता का देहांत हुआ था और वह उनसे अलग रहते थे। हम पांच लोग थे और इस बात को लेकर चिंतित थे कि कैसे वहां पहुंचेगे। मैने बस से उतरते ही अखबार खरीद लिया और फिर हमारी समस्या हल हो गयी।

हालांकि अखबार में कई दिलचस्प खबरे आतीं हैं और वह हमारे जीवन को अभिन्न अंग है पर समय के साथ कुछ ऐसा हो गया है कि उसमें दिलचस्पी तभी होती है जब समय होता है पर फिर भी ऐसे अवसरों पर अखबारों की सहायता मिलती है जो उनके प्रकाशन का उद्देश्य बिल्कुल नहीं होता।  हालांकि आजकल अखबार इतने सस्ते हैं कि उसका व्यय तो कही गिना भी नहीं जाता पर फिर भी कभी आदमी सोचता है कि क्या फायदा? कहा जाता है कि किसी की शादी में भले मत जाओ पर गमी में जरूर जाना चाहिए। शहरों के बढ़ने के साथ आधुनिक साधन भी आये हैं पर आदमी की सोच और विचार का दायदा सिकुड़ रहा है। कई बार लोग ऐसे अवसरों सूचना नहीं देते या आवश्यकता नहीं अनुभव नहीं करते पर वहां अपना पहुंचना जरूरी होता है तब अखबारों की सहायता मिल जाती है। इसलिये आज भी अखबार पढ़ता हूं तो केवल इसलिये ताकि अन्य सूचनाओं के साथ ऐसी सूचनाएं भी मिलतीं रहें जिससे समाज से सतत संपर्क में रहा जा सके। अन्य सूचनाएं भी मिल जाती है जो महत्वपूर्ण होती हैं और अपने लिखने के साथ जानकारी बढ़ाने के काम भी आतीं हैं।


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टिप्पणियाँ

  • mehek  On मई 1, 2008 at 4:11 अपराह्न

    ye to sahi hai akhbar mein local aur aas paas ki news milti hai,jo kahi aur nahi milti,humne to akhabar par hi ka,kha,ga,gha ke hindi aur marathi akshar sikhe the,so subhah ke chai ke saath paper hona bahut jaruri hai,kabhi paper nahi aaya,pichale din ka hi lekar baith jate hai,vaise subhah ki chai waqt par bade naseeb se milti hai,agar koi emergency nahi ho to,varna to nahi bhi.

  • anil shrivastava  On मई 3, 2008 at 6:00 पूर्वाह्न

    वाह, पढ़ कर मजा आ गया !

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