क्या क्रिकेट की पुनःप्रतिष्ठा इंटरनेट के लिये चुनौती है?


मुझे याद है जब पिछली बार मैं ब्लाग बनाने के लिये प्रयास कर रहा था तब वेस्टइंडीज में विश्वकप शुरू हो चुका था और मैने यह सोचा कि लीग मैचों में भारतीय (जिसे अब मैं बीसीसीआई की टीम कहता हूं) क्रिकेट टीम   तो ऐसे ही जीत जायेगी। इतना ही नहीं मैने  इस टीम के खेल पर संदेह होने कारण एक व्यंग्य भी लिखा था ‘क्रिकेट में सब चलता है यार’ पर वह कोई नहीं पढ़ पाया। बहरहाल यह टीम लीग मैचों में ही बाहर हो गयी। तब  मेरा ब्लाग तैयार हो चुका था पर उसे पढ़ कोई नहीं पा रहा था पर हां क्रिकेट पर लिखी सामग्री नारद पर चली जाती थी पर यूनिकोड में न होने के कारण कोई पढ़ नहीं पाता था। नारद ने बकायदा एक अलग काउंटर बना दिया था।

मुझे उस समय यह देखकर हैरानी हो रही थी कि जो नारद मुझे पंजीकृत नही कर रहा है वह मेरे क्रिकेट से संबंंधित ब्लाग क्यों अपने यहां दिखा रहा है। बहरहाल भारतीय क्रिकेट टीम के हारते ही नारद ने अपना काउंटर भी वहां से हटा लिया और मैं फिर वहां से बाहर हो गया। भारतीय क्रिकेट टीम हारी लोगों की हवा ही निकल गयी। ऐसे में कई लोगों के विज्ञापन तक रुक गये।

मैं पिछले 25 बरसों से इस टीम का खेल देख रहा हूं और पिछले साल गयी टीम की जीत की भविष्यवाणी करने वालें से मैं एक ही सवाल करता था कि ‘आप मुझे टीम का एक भी ऐसा पक्ष बतायें जिसकी वजह से इस टीम को संभावित विजेता मान सकें। टीम हारी लोगों की दुनियां ही लुट गयी। संयोगवश मैं यूनिकोड में लिखना शूरू कर चुका था और लिखने बैठा तो एक तो मुझे इस हार के गम से नहीं गुजरना पड़ा तो दूसरे खिसियाये लोग इंटरनेट की तरह आते दिखे।  सभी लोग पढ़ने नहीं आये तो सभी ऐसे वैसे फोटो देखने भी नहीं आये। पिछले साल से इंटरनेट का इस्तेमाल बढ़ा है।
मैने अपने ब्लाग पर हिट्स और व्यूज तेजी से बढ़ते देखे हैं और एक समय तो मुझे लगा कि हो सकता है कि 2008 के अंत तक किसी एक ब्लाग पर एक दिन में पांच सौ व्यूज भी हो सकते हैं। वर्डप्रेस के हर ब्लाग पर व्यूज सौ से ऊपर निकलते देखे हैं।  एक ब्लाग पर तो दो दिन तक 200 व्यूज आते दिखे। आज हालत वैसी नहीं है। अपने हिसाब से थोड़ा विश्लेषण किया तो कुछ स्मृतियां मेरे मन में आयी है।

अचानक भारतीय टीम ने ट्वंटी-ट्वंटी विश्व कप जीत लिया और उस समय मैने लिखा भी था कि क्रिकेट फिर जनचर्चा का विषय बना। एक हास्य कविता भी लिखी कि अब बीस का नोट पचास में चलायेंगे-आशय यह था कि पचास ओवरों के विश्व कप में पिट गये तो अब बीस का जीतकर फिर क्रिकेट को जीवित करने की कोशिश होगी। यही हुआ और उसके बाद कई खिलाड़ी जो हाशियं पर जा रहे थे वापस चर्चा में आ गये और तीन वरिष्ठ खिलाड़ी जो ट्वंटी-ट्वंटी विश्व कप में नहीं थे फिर मैदान में जम गये। इधर यह भी दिखाई   दिया कि भारतीय क्रिकेट टीम ने घरेलू श्रंखलाओं में जीत दर्ज की तो नवयुवक को एक वर्ग उस पर फिदा हो रहा है। साथ भी मैने यह अनुभव किया कि पिछले चार माह में ब्लाग पर हिट और व्यूज  की संख्या कम होती जा रही है।

अब यह जो नयी प्रतियागिता शुरू हुई है उसके बाद मुझे लग रहा है कि व्यूज और कम होते जा रहे हैं। पहले सौ के आसपास रहने वाले व्यूज साठ से सतर और तीस  से पचास तक सिमट रहे हैं।  मैने ब्लागवाणी पर भी जाकर अनुभव किया कि वहां भी सभी ब्लाग पर व्यूज कम हैं।  हो सकता है यह मेरा मतिभ्रम हो पर मुझे लगता है कि कुछ ब्लागर भी यह मैच देखने में लग गये हैं। मैने आज अपने साइबर कैफे के मालिक अपने मित्र से पूछा-‘‘क्या तुम्हें ऐसा लगता है कि इन मैचों की वजह से तुम्हारे यहां आने वाले लोगों की संख्या कम हुई है?’’

तो उसने कहा-‘‘हां, पर गर्मिंयां और छुट्टियां होने से भी यह हो सकता है पर मुझे लगता है मैचों वाले समय में संख्या कम हो रही है।’

इधर मुझे भी लगता है कि कुछ ऐसे लोग भी मैच देखने में लग गये हैं जो बिल्कुल इससे विरक्त हो गये थे। शायद इसका कारण यह भी है कि लोगों के पास समय पास करने के लिये और कोई जरिया भी तो नहीं है। इसलिये अब इस खेल में मनोरंजन का भी इंतजाम किया गया है। मैं उन लोगों में हूं जिनका मोह तभी इस खेल से भंग होता गया जब इस संदेह के बादल लहराने लगे थे। इसके बावजूद मैं आधिकारिक मैच मैं देखता हूं और यह प्रतियोगिता मुझे अधिक प्रभावित नहीं कर पा रही। मैं पहले भारत का वासी हूं और फिर मध्यप्रदेश का ओर दोनों का वहां कोई वजूद नहीं देखता इसलिये मुझे इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। हां, इधर जब ब्लागवाणी पर दूसरे ब्लाग और वर्डप्रेस के अपने ब्लाग पर घटते व्यूज देखे तो विचार आया कि कहीं अंतर्जाल की वेबसाईटों और ब्लागों पर क्या लोगो की आमद कम हो जायेगी? इस तरह क्या इंटरनेट को क्रिकेट की पुनःप्रतिष्ठा से कोई चुनौती मिलने वाली है। 

यह बात याद रखने वाली है कि आदमी को चलाता मन ही है और इधर इंटरनेट पर जो लोग आये वह कोई आसमान से नहीं आये। मैं क्रिकेट, अखबार और टीवी से हटकर यहां आया तो और भी आये। मैं वहां नहीं जा रहा क्योंकि मुझे लिखने में मजा आ रहा है पर दूसरे तो जा सकते हैं। फिलहाल तो ऐसा लग रहा है पर कालांतर में फिर लोग इधर आयेंगे। मेरे जो मित्र पहले क्रिकेट से विरक्त हो चुके थे और यह मैच देख रहे हैं उनका कहना था कि ‘यह मैच अधिक समय तक लोकप्रिय नहीं रहेंगे क्यांेंकि इनमें राष्ट्रप्रेम का वह जज्बा नहीं है जिसकी वजह से क्रिकेट इस देश में लोकप्रिय हुआ था’। यह प्रतियोगिता समाप्त होते ही फिर लोग अपने पुराने ढर्रे पर वापस आ जायेंगे और अगर मुझे लगता है कि इन मैचों की वजह से इंटरनेट पर लोगों की आमद कम है तो वह निश्चित रूप से बाद में बढ़ेगी। यहां याद रखने वाली बात यह है कि लोग अपना समय केवल खेल देखने में ही नहीं बल्कि उसके बाद होने वाली चर्चाओं पर भी व्यय करते हैं और ऐसे में अगर इंटरनेट पर लोगों की आमद कम हो रही हो तो आश्चर्य की बात नहीं है।

मेरी स्थिति तो यह है कि हरभजन सिंह को टीम से निकाला गया-यह खबर भी मुझे बहुत  हल्की लगी। अगर यही अगर उसे किसी अतर्राष्ट्रीय एक दिवसीय मैच से निकाला जाता तो शायद मैं कुछ जरूर  लिखता। इस प्रतियोगिता में खेल रही टीमों में कोई दिलचस्पी नहीं होने के कारण कोई भी समाचार मेरे दिमाग में जगह नहीं बना पाता।

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