संत कबीर वाणी:जीभ का रस सर्वोत्तम (sant kabir vani-jibh ka ras sarvottam)


        देखा जाये तो संसार में ज्ञानी लोगों  की संख्या अत्यंत कम है। उसके बाद ऐसे लोगों की संख्या है जो ज्ञान की तलाश के लिये प्रयासरत रहते हैं यह अलग बात है कि योग्य गुरु के अभाव में उनको सफलता नहीं मिलती। मगर ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो न तो जिनके पास ज्ञान है न उनको पाने की जिज्ञासा है। देहाभिमान से युक्त ऐसे लोग हर समय अपने आपको श्रेष्ठ प्रमाणित करने के लिये बकवाद करते हैं। दूसरों का मजाक बनाते हैं। ऐसे मूर्ख लोग अपने आपको बुद्धिमान साबित करने के लिये किसी भी हद तक चले जाते हैं। न तो वह समय देखते हैं न व्यक्ति। अपने शब्दों का अर्थ वह स्वयं नहीं समझते। उनको तो बस बोलने के लिये बोलना है। ऐसे लोग न बल्कि दूसरों को दुःख देते हैं बल्कि कालांतर में अपने लिये संकट का निर्माण भी करते हैं।
संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि
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सहज तराजू आनि के, सब रस देखा तोल
सब रस माहीं जीभ रस, जू कोय जाने बोल
“संसार में विभिन्न प्रकार के रस हैं और हमने सब रसों को सहज स्वभाव की ज्ञान -तुला पर तौलकर देख-परख लिया है। सब रसों में जीभ का रस सर्वोत्तम एव अधिक वजन वाला है। उसे वही जान सकता है जो अपने शब्द और वाणी का सही उपयोग करना जानता है।”
मुख आवै सोई कहै, बोलै नहीं विचार
हटे पराई आतमा, जीभ बाँधि तलवार
“कुछ नासमझ लोग ऐसे हैं जो कभी भी सोच समझकर नहीं बोलते और मुहँ में जो आता है बक देते हैं। ऐसे लोगों की वाणी और शब्द तलवार की तरह दूसरों को कष्ट पहुँचाते हैं।”
         इसके विपरीत ज्ञानी लोग हर शब्द के रस का अध्ययन करते हैं। उनके प्रभाव पर दृष्टिपात करते हैं। उनका अभ्यास इतना अधिक हो जाता है कि उनके मुख से निकला एक एक शब्द न केवल दूसरों का सुख देता है बल्कि वह स्वयं भी उसका आनंद उठाते हैं। एक बात निश्चित है कि किसी भी मनुष्य के मुख से निकले शब्द उसके अंतर्मन का प्रमाण होते हैं। दुष्ट लोग जहां हमेशा अभिमान और कठोरता से भरे भरे शब्द उपयोग करते है जबकि सज्जन कठोर बात भी मीठे शब्दों में कहते हैं। इसलिये जब कहीं वार्तालाप करते हैं तो इस बात का विचार करें कि हमारे शब्द का बाहर प्रभाव क्या होगा? इससे न केवल हम दूसरे को सुख दे सकते हैं बल्कि अपने लिये आने वाले संकटों से भी बच सकते हैं। कहा भी जाता है कि यही वाणी आपको धूप में बैठने का दुःख और छांव में बैठने के सुख का कारण बनती है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja “Bharatdeep”,Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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टिप्पणियाँ

  • mehhekk  On फ़रवरी 15, 2008 at 3:05 अपराह्न

    realy beautiful thought.

  • मीनाक्षी  On मई 13, 2008 at 4:12 अपराह्न

    हम यहाँ जो भी पढ़ते हैं उनमें से कुछ पर तो अपनी उपस्थिति दर्ज करनी ही चाहिए, आपकी कल की पोस्ट से लगा कि आपको पता भी नहीं चलता और हम यहाँ से अनमोल वचन आत्मसात करके चलते बनते हैं.
    कबीर के दोहे जितनी बार पढ़ते हैं और पढ़ने की लालसा जाग जाती है.

  • Shabbir  On मई 28, 2011 at 12:57 अपराह्न

    ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये |
    औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए ||

    बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय |
    जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय ||

    जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप |
    जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप ||

    प्रेम भावः एक चाहिए, भेष अनेक बनाये |
    चाहे घर में बास कर, चाहे बन को जाए ||

    पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय |
    ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय ||

    कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये,
    ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये

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