फिर कौन चेला और कौन गुरु-हास्य कविता


बोने चरित्र के लोग पहुंचे हैं
बड़ी जगहों पर
समस्या शुरू होती हैं यहीं से शुरू
जो कभी किसी के शिष्य नहीं बने
कर न सके नहीं किसी की सेवा
बन गए हैं अब लोगों के गुरु

पढ़ने के अनेक प्रमाणपत्र उनके पास
पर उनके पढे होने पर शक होता
क्योंकि लिखने में उनको भी डर होता
खुल न जाये कहीं पोल
बहस से बचने के लिए
बना लेते हैं सचिव को गुरु

उनकी नीयत पर क्या यकीन करें
जिनके घर हैं
बदनाम लोगों का पहरा
आँगन में मौजूद है
काली दौलत का कुआं गहरा
आभास नहीं अकूत संपत्ति का
कहाँ ख़त्म है और कहाँ से शुरू

कुटिलता से मुस्कराता चेहरा
साफ नजर आता
पर उनकी नीयत का
उनके सामने बयान करना भी
किसी को नहीं आता
खडे हैं ऐसे जैसे कोई बडे बुत हों
पर छोटी नीयत
कमजोर दिल
जब तक चलता है साथ सिंघासन
चल जाता है उनका ह्ठासन
जो हिलता तो जमीन पर गिर जाते
सारे समीकरण बदल जाते हैं
फिर कौन चेला और कौन गुरु

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टिप्पणियाँ

  • mehhekk  On जनवरी 30, 2008 at 6:38 अपराह्न

    bahut khub,apki hasya kavita mein bhi ek samajik sandesa hota hai.ye baat shayad har khuda ghar bharnewale polotician par lagu hoti hai.

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