जो सहज वह ‘कबीर’ जो असहज वह गरीब है


भारत में संत कबीर जी का नाम बहुत श्रद्धा से लिया जा सकता है. कबीर दास जी के दोहों और साखियों में न केवल सहज भक्ति भाव की प्रेरणा है वरन जीवन में नैतिक आदर्शों पर चलने और व्यवहार में सरलता अपनाने का भी संदेश है. कबीर दास जी ने अगर सभी धर्मों पर कटाक्ष नहीं किये होते और मूर्ति पूजा को हास्यास्पद नही बताया होता तो तो शायद उनके नाम पर भी लोगों ने धर्म का प्रतिपादन किया होता-और आश्रम बनाकर उनका ख़ूब प्रचार करते. सच तो यह है कि उन्होने जीवन को सहजता से जीने का संदेश दिया है वह अनुकरणीय है. संत कबीर सहजता के प्रतीक हैं और मेरी इसमें मान्यता है कि जो आदमी जीवन में भक्ति और व्यवहार में सहज वह कबीर है और जो असहज है वह गरीब है.

कबीर दास जी ने अपना पूरा जीवन के जुलाहे के रूप में व्यतीत किया. कभी अपना काम नहीं छोडा. श्री गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि ‘हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु है और कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ. क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूं तो बड़ी हानि हो जाये क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं. इसलिये मैं कर्म न करूं तो तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं संकरताका करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ.’

संत कबीर के अपने जीवन कल में ही शिष्य बन गये थे फिर भी उन्होने अपना काम बंद नहीं किया क्योंकि वह जानते थे कि अगर उन्होने ऐसा किया तो बाद में लोग उनके कथन पर यकीन नहीं करेंगे-यह अलग बात है कि आजकल के कई व्यासायिक संत उनके कथनों को सुनाकर वाह-वाही लूटते हैं पर उनके जीवन चरित्र पर चलने का साहस कोई नहीं कर पाता.

पाँव पुजावेँ बैठि के, भखै मांस मद दोय
तिनकी दीच्छा मुक्ति नहिं, कोटि नरक फल होय

आशय -जो साधू-संत खाली बैठकर अपने पाँव पुजवाते हैं और मांस-मदिरा दोनों का सेवन करते हैं उनकी दीक्षा से कभी किसी की मुक्ति नहीं हो सकती, उल्टे करोड़ों नरकों का भीषण कष्टप्रद फल भोगना पड़ता है।
आप यह समझ सकते हैं कि कबीर दास जी कितने बडे दूरदर्शी थे. इससे एक बात और समझ सकते हैं कि हम कहते हैं कि आजकल ज़माना ही ऐसा हो गया है पर हम देखें तो एसा तो उनके समय में रहा होगा तभी तो उन्होने ऐसा लिखा. शायद यही कारण है कि कबीर का दर्शन आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पहले था- हम यह नहीं कह सकते कि उनका ज़माना कुछ और था और हमारा और.

जो जल बाढै नाव में, घर में बाढै दाम
दोनों हाथ उलीचिये, यही सयानों काम

संत शिरोमणि कबीरदास जी का आशय यह है किसी कारणवश नाव में जल भरने लगे और घर में धन की मात्रा बढती चली जाये तो बिना देरी किये दोनों हाथों से उसे निकालो, यही बुद्धिमानी का काम है, अन्यथा डूब जाओगे।
वह जीवन के गूढ़ रहस्यों के साथ मनुष्य के मनोविज्ञान को कितनी गहराई सा समझते थे उनकी रचनाओं को देखकर यह समझा जा सकता है. कबीरदास जीं कोई न तो कोइ पूंजीपति थे और न ही आश्रमों का निर्माण करने वाले संत. जीवन भर अपने परिवार के साथ घर में रहे. कोई पाखंड या दिखावा नहीं किया, यही कारण यह है कि उनका जीवन दर्शन आम आदमी के निकट दिखाई देता है.

अगर आज हम देखें तो हमारे अन्दर जो मन है वह भावनाओं की नदी में तैरता है. आजकल उसमें भगवान् की भक्ति की जगह ऐसे भाव भरे जा रहे हैं जिससे उनका आर्थिक दोहन किया जा सके-और अगर कोई इसके बाद भी हाथ नहीं आता तो भक्ति में ही ऐसे आकर्षक तत्व जोड़ दो कि अपने आप आदमी जेब ढीली करेगा. एक मजे की बात यह है कि मैने देखा है कि भक्ति के तंतु अगर बचपन में आदमी के मन में नहीं बैठे तो फिर कभी नहीं आते और आजकल धार्मिक चैनलों को लेकर ऎसी टिप्पणी आती है कि वह तो केवल बूढों के लिए है-और भगवान की भक्ति तो बुदापे में की जाती है . मैं इन बातों पर बचपन पर ही हंसता हूँ. मैं हर विषय में दिलचस्पी लेता हूँ पर लिप्प्त भक्ति में ही होता हूँ क्योंकि मुझे यह संस्कार बचपन से मिले हैं. श्रीवाल्मिकी रामायण, श्रीगीता और श्रीगुरु ग्रंथ साहब के साथ हिंदी साहित्य में कबीर दास की रचनाओं के अध्ययन मैने भक्ति और चिंतन के साथ किया है. शायद यही वजह है कि मुझे इन पर लिखने में बहुत मजा आता है इस बात की परवाह किये बिना कि उसे कितना पढेंगे. कबीर दास का जीवन के प्रति सहज और सरल भाव मुझे सदैव आकर्षक लगता है. वह हमेशा ही सादगी से दैहिक जीवन जिए और आत्मिक रूप से आज भी हमारे आध्यात्म विचार का महत्वपूर्ण स्तम्भ हैं. इसलिये कहता हूँ कि जो आदमी जीवन में सहज है वह कबीर है और जो असहज है वह गरीब है. जिसके पास सब कुछ है पर संतोष नहीं है उसे गरीब नही तो क्या कहा जायेगा. ऐसे महान संत को मेरा प्रणाम.

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