लोकतंत्र के रास्ते पर चलते ही रहना होगा


उत्तर प्रदेश में चुनाव शांति से संपन्न हो गये है और उसके परिणाम भी आ गये हैं। जैसे हर चुनाव के बाद तमाम तरह के विश्लेषण प्रस्तुत किये जाते हैं और विभिन्न पार्टियां अपने हिसाब से अपनी हार और जीत पर मंथन करती हैं वह दौर शुरू हो चुका है। भारतीय लोकतंत्र पर कुछ लोग तथाकथित रुप से नाज़ करते हैं तो कुछ बुध्दिजीवी इसका मखोल भी उड़ाते हैं पर मेरा इस पर एक स्पष्ट नज़रिया है और वह मैं व्यक्त करना चाहता हूँ , ऐसा हो सकता है कि ऐसे विचार कभी और लोगों ने भी व्यक्त किये हौं पर उनमें तथ्य अधिक तर्क कम होते हैं। अभी मैंने एक जगह पढा था कि एक ऎसी महान शख्सियत हैं जिन्हें विदेशों में पुरस्कार भी मिल चुके हैं उन्हें भारतीय लोकतंत्र मैं बहुत सारे छिद्र दिखायी देते हैं । मुझे लिखने में कोई पुरस्कार नहीं मिला पर मैं भी अपने आपको कम नहीं समझता। वैसे भी कोई पुरस्कार अब बड़ा नहीं बना सकता क्योंकि जब से इण्टरनेट पर पर ब्लोग बनाकर लिखना शुरू किया है तो लगता है कि इससे बड़ा और लेखक और कौन हो सकता है जो विपरीत परिस्थतियों में भी लिखता रहे। अब जरा भारतीय लोकतंत्र पर खुलकर बात हो जाये तो अच्छा है।पहली बात यह है कि इस देश को अगर इसी रुप में अखण्डता के साथ रखना है तो इस लोकतंत्र के अलावा और कोई चारा भी नहीं है । एयर कन्डीशन वाले कमरों में रहने वाले, हवाई जहाज़ों में सफ़र करने वाले और विदेशो की तरफ ही देखते रहने वाले बुध्दिजीवी लोग इसका महत्त्व नहीं समझ सकते-हालांकि इसका लाभ सबसे ज्यादा वही उठा रहे हैं और लोकतंत्र के नाम से भी नाक-भौं सिकोदते हैं। उनकी मनोवृति यह है कि गरीब का ख़ून भी चुसें और कराहे भी नहीं और इस लोकतंत्र ने भी धनवानों, उच्च पद पर विराजमान और समाज में अपने बाहुबल से नेतृत्व करने वालों को वैसा ही संरक्षण दिया है जैसा राजतंत्र में मिलता था पर वह गरीब के कराहने के अधिकार की रक्षा करता है । सीधी-साधी भाषा में कहूं तो लोकतंत्र में गरीब और विवश आदमी को अपने दर्द और पीडा कहने के लिए मंच उपलब्ध हो जाता है राजतन्त्र और तानाशाही में वह उस अधिकार से वंचित हो जाता है। विक्सित व्यक्ति लोकतंत्र में अपने मतदान के प्रति कम जागरूक होते है जबकि गरीब व्यक्ति ज्यादा दिलचस्पी लेता है , शायद इसी कारण विक्सित देशों में मतदान का प्रतिशत कम रहता है। भारत में भी गुजरात विक्सित प्रदेश माना जाता है और वहां मतदान का प्रतिशत कम ही रहता है, अगर उत्तर प्रदेश में कम प्रतिशत रहने पर किसी को चिंता हो तो वह इस पर विचार कर ले। मीडिया में उत्तर प्रदेश की कानून व्यवस्था को लेकर पिछले कई दिनों से बवाल मचा था और मीडिया वालों ने इस पर अनेक टिप्पणियां की थीं । अगर यह सब थम जाये तो आप समझ लेना कि यह सब चुनावी स्टंट था। मतदान का कम प्रतिशत तो कम से कम इस बात को प्रमाणित नहीं करता कि वहां सब गड़बड़ था और न ही यह करता है सब कुछ ठीकठाक था। पिछले कुछ वर्षों से हमारे देश में मध्यम वर्ग की आय में वृध्दि हुई है -और वह अपने सुविधाओं को भोगने में इतना व्यस्त रहता है कि उसके पास वोट डालने का समय ही नहीं मिलता। गरीबी इस देश में कभी खत्म हो सकती है यह ख्वाब तो मैं भी नहीं देखता और जो ख्वाब दिखाते है वह झूठ बोल रहे हैं । मैं अर्थशास्त्र का विद्यार्थी रहा हूँ और इस देश की गरीबी कोई बीमारी नहीं बल्कि कयी बीमारियों का परिणाम है जो बढती जनसँख्या, धन के असमान वितरण, अर्थव्यवस्था के अकुशल प्रबंध और सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक रूरिवादिता के कारण है। लोकतंत्र की रक्षा के लिए अगर गरीब लड़ता है तो केवल इसीलिये क्योंकि वह जानता है कि लोकतंत्र में उसके पास रोने, कराहने और चिल्लाने का अधिकार तो है और वह वोट डालने के लिए निकलता है । मतलब यह कि इस देश में गरीबी और भुखमरी को देखकर इस देश का मखौल उड़ाने वाले इस बात का ध्यान रखें कि वह जिनकी पीड़ा को देखकर इस देश के लोकतंत्र को बेमतलब बता रहे हैं वही गरीब और पीड़ित इस देश के लोकतंत्र का रक्षक भी है यह जानते हुए भी कि उसे इससे कोई आर्थिक लाभ नहीं होने वाला वह मतदान केंद्र तक जाता है। चुनावों में धनबल, बाहुबल और भ्रामक वादों का उपयोग के साथ मतदान केंद्रों पर कब्जे की ख़ूब घटनाएं होती हैं और अपने चुनाव आयोग भी पाना ख़ूब सामर्थ्य दिखाते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करा ही लेता है। इतना विशाल देश और जनसँख्या को देखते हुए जो घटनाएं होती हैं वह नगण्य हैं और उस पर अपने ही देश के लोग इस पर आपत्तियाँ उठाएँ तो मैं तो उनकी अज्ञानता ही कहूंगा। समाचारों में केवल दुर्घटनाओं को स्थान मिलता है। इतनी सारी ट्रेनें रोज सुरक्षित निकल जाती है पर समाचार तो केवल दुर्घटनाओं को मिलता है। यही हाल चुनावों का है। विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र देश है और उस पर हमें ख़ुशी भी होना चाहिए । जिन पश्चिमीदेशों ने विद्युतीय चुनाव मशीनें बनाईं वह आज भी इसके उपयोग से कतराते हैं । उन्हें अपनी परंपरागत शैली से दूर हट कर इन मशीनों के उपयोग में अभी तक संकोच हो रहा है और हमारे देश में दूरदराज तक गावों में अक्षित ग्रामीण तक इससे परिचित हो गये है। विदेशी लोकतंत्र और उनके प्रगतिशील होने का विश्वास करने वाले लोग इस तथ्य को नॉट करें। चुनावों में धांधली कराने में कुछ लोग सफल हो जाते हैं पर संसद क्या पार्षद के चुनाव के परिणाम तक वह प्रभावित नहीं कर पाते, हाँ जीत हार के अंतर में मामूली प्रभाव हो सकता है वह भी वहां जहाँ विपक्षी कमजोर हो-और हारने के बाद अपनी शिक़ायत प्रभावी ढंग से उचित जगह नहीं रख पा ता हो ।देश में बहुत सारी गंभीर समस्याएँ हैं पर इसके लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था जिम्मेदार नहीं है, इसके लिए अलग से विश्लेषण किया जाना चाहिए ।लोकतंत्र में मतदाता और नेता दोनों की अपनी भुमिका होती है , नेताओं के बारे में तो बहुत कुछ अच्छा और बुरा कहा जाता है पर क्या कभी मतदाताओं की जिम्मेदारी पर भी कुछ कहा जाता है। एक आम मतदाता होने के नाते मैं जानता हूँ कि मतदाता किस विचार के साथ मतदान करता है या नहीं करता है। कभी अपने मत का उपयोग करते हुए उसके योग्य उम्मीदवार को ढूँढने के लिए कोई मेहनत नहीं करते , जिनके नाम और दल आंखों के सामने है उन्हें ही मत दिया । किसी ने कहा अमुक को वोट दो उसके संक्षिप्त विचार सुने और दे दिया-हम विस्तार से जानने का प्रयास नहीं करते । मतलब प्रचार से प्रभावित होकर वोट दिया जिस पर पैसा खर्च होता है और वह केवल एक नंबर की कमाई से संभव नहीं है। जिसे वोट लेना है वह खुद हमारे पास आएगा, ऐसा विचार कर हम अपने मस्तिष्क को वैचारिक संकट से बचा लेते हैं -कभी यह विचार नहीं करते कि क्या ऐसा कोई उम्मीदवार है जो धन और बाहुबल की कमी के चलते हमारे पास नहीं आ पा रहा तो हमीं ज़रा उसकी खोज खबर लें -कहीं वह हमारे मत के लिए सुयोग्य उम्मीदवार तो नहीं है -ऐसा विचार हम कभी नही करते। नेताओं में दोष देखकर अपने देश के लोकतांत्रिक ढाँचे पर उंगली उठाना मेरी दृष्टि से अपने वैचारिक खोखलेपन को छिपाने का प्रयास व्यर्थ ही है। इस बारे में विस्तार से बहस की जरूरत है। हम अगर नेताओं पर ही मतदाताओं को जागरूक कराने का जिम्मा सौंपेंगे तो गलती करेंगे -क्योंकि वह उसी सीमा तक अपना काम करेंगे जहां तक उनके हित सिध्द हौं -और उंचे किस्म के बुध्दिजीवियों के लिए तो अमेरिका और ब्रिटेन ही सर्वश्रेष्ठ हैं और अपना देश तो गरीब और पिछडा है जिसे कोसा ही जा सकता है। भले अपनी जिन्दगी में कभी किसी गरीब और विवश आदमी की सहायता नहीं की हो पर उसके नाम और दर्द की आड़ में इस देश के लोकतंत्र को कोसने में मजा आता है। इसके बावजूद मैं आशावादी हूँ कि लोकतंत्र से ही यह देश स्थिर और अखंड रह सकता है । जैसे जैसे मतदाताओं में चेतना बढती जायेगी बैसे-वैसे लोकतंत्र के परिणाम और अच्छे होते जायेंगे। आज जो पश्चिमी राष्ट्र लोकतंत्र के सहारे मजबूत दिख रहे हैं उन्हें एक शताब्दी से ज्यादा इस प्रणाली के साथ चलते हुए हो गये हैं , उसे देखे हुए हम उनसे पिछड़े नहीं कहे जा सकते। और भविष्य के लिए मैं आशावादी हूँ। दोष हमार तरीकों में हो सकता है पर लोकतंत्र में नहीं। चुनाव में कौन जीता या हारा यह महत्वपूर्ण नहीं है पर उत्तर प्रदेश के लोगों ने मतदान में भाग लिया इसके लिए उन्हें बधाई .

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