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	<title>दीपक भारतदीप की  शब्द- पत्रिका</title>
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	<description>दीपक बापू कहिन की सहयोगी पत्रिका-यहाँ मेरी मौलिक रचनाएं प्रकाशित है और इसके कहीं अन्य व्यवसायिक प्रकाशन के लिए मेरे से पूर्व अनुमति एवं पारिश्रमिक देना अनिवार्य होगा जो प्रति रचना दो हजार रूपये है । कोई लेखक इसका पूर्ण या आंशिक उपयोग कर सकता है पर उसके लिए उसे सूचना देना चाहिए ऐसा आग्रह है । ब्लोग लेखको के लिए कोई बंदिश नहीं है। संपादक</description>
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		<title>दीपक भारतदीप की  शब्द- पत्रिका</title>
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		<title>प्रजातंत्र में ब्लॉग की महत्वपूर्ण भूमिका-हिंदी लेख (democracy and hindi blog-hindi article)</title>
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		<pubDate>Wed, 04 Nov 2009 15:47:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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		<description><![CDATA[भारत में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या सात करोड़ से ऊपर है-इसका सही अनुमान कोई नहीं दे रहा। कई लोग इसे साढ़े बारह करोड़ बताते हैं। इन प्रयोक्ताओं को यह अनुमान नहीं है कि उनके पास एक बहुत बड़ा अस्त्र है जो उनके पास अपने अनुसार समाज बनाने और चलाने की शक्ति प्रदान करता है-बशर्ते उसके [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=rajlekh.wordpress.com&blog=880918&post=789&subd=rajlekh&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><b>भारत में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या सात करोड़ से ऊपर है-इसका सही अनुमान कोई नहीं दे रहा। कई लोग इसे साढ़े बारह करोड़ बताते हैं। इन प्रयोक्ताओं को यह अनुमान नहीं है कि उनके पास एक बहुत बड़ा अस्त्र है जो उनके पास अपने अनुसार समाज बनाने और चलाने की शक्ति प्रदान करता है-बशर्ते उसके उपयोग में संयम, सतर्कता और चतुरता बरती जाये, अन्यथा ऐसे लोगों को इस पर नियंत्रण करने का अवसर मिल जायेगा जो समाज को गुलाम की तरह चलाने के आदी हैं।</p>
<p>यह इंटरनेट न केवल दृश्य, पठन सामग्री तथा समाचार प्राप्त करने के लिये है बल्कि हमें अपने फोटो, लेखन सामग्री तथा समाचार संप्रेक्षण की सुविधा भी प्रदान करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि हम केवल प्रयोक्ता नहीं निर्माता और रचयिता भी बन सकते हैं। अनेक वेबसाईट-जिनमें ब्लागस्पाट तथा वर्डप्रेस मुख्य रूप से शामिल हैं- ब्लाग की सुविधा प्रदान करती हैं। अधिकतर सामान्य प्रयोक्ता सोचते होंगे कि हम न तो लेखक हैं न ही फोटोग्राफर फिर इन ब्लाग की सुविधा का लाभ कैसे उठायें? यह सही है कि अधिकतर साहित्य बुद्धिजीवी लेखकों द्वारा लिखा जाता है पर यह पुराने जमाने की बात है। फिर याद करिये जब हमारे बुजुर्ग इतना पढ़े लिखे नहीं थे तब भी आपस में चिट्ठी के द्वारा पत्राचार करते थे। आप भी अपनी बात इन ब्लाग पर बिना किसी संबंोधन के एक चिट्ठी के रूप में लिखने का प्रयास करिये। अपने संदेश और विचारों को काव्यात्मक रूप देने का प्रयास हर हिंदी नौजवान करता है। इधर उधर शायरी या कवितायें लिखवाकर अपनी मित्र मंडली में प्रभाव जमाने के लिये अनेक युवक युवतियां प्रयास करते हैं। इतना ही नहीं कई बार अपने ज्ञान की अभिव्यक्ति के लिये तमाम तरह के किस्से भी गढ़ते हैं। यह प्रयास अगर वह ब्लाग पर करें तो यह केवल उनकी अभिव्यक्ति को सार्वजनिक रूप ही नहीं प्रदान करेगा बल्कि समाज को ऐसी ताकत प्रदान करेगा जिसकी कल्पना वह नहीं कर सकते। </p>
<p>आप फिल्म, क्रिकेट,साहित्य,समाज,उद्योग व्यापार, पत्र पत्रिकाओं, टीवी चैनल तथा उन अन्य क्षेत्रों को देखियें जिससे बड़े वर्ग द्वारा छोटे वर्ग पर प्रभाव डाला जा सकता है वहां पर कुछ निश्चित परिवारों या गुटों का नियंत्रण है। यहां प्रभावी लोग जानते हैं कि यह सभी प्रचार साधन उनके पास ऐसी शक्ति है जिससे वह आम लोगों को अपने हितों के अनुसार संदेश देख और सुनाकर उनको अपने अनुकूल बनाये रख सकते हैं। क्रिकेट में आप देखें तो अनेक वर्षों तक एक खिलाड़ी इसलिये खेलता&nbsp; है क्योंकि उसे पीछे खड़े आर्थिक शिखर पुरुष उसका व्यवसायिक उपयोग करना चाहते हैं। फिल्म में आप देखें तो अब घोर परिवारवाद आ गया है। सामान्य युवकों के लिये केवल एक्स्ट्रा में काम करने की जगह है नायक के रूप में नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि हमारे आर्थिक, सामाजिक तथा प्रचार के शिखरों पर जड़ता है। आप पत्र पत्रिकाओं में अगर लेख पढ़ें तो पायेंगे कि उसमें या तो अंग्रेजी के पुराने लेखक लिख रहे हैं या जिनको किसी अन्य कारण से प्रतिष्ठा मिली है इसलिये उनके लेखन को प्रकाशित किया जा रहा है। पिछले पचास वर्षों में कोई बड़ा आम लेखक नहीं आ पाया। यह केवल इसलिये कि समाज में भी जड़ता है। याद रखिये जब राजशाही थी तब यह कहा जाता था कि ‘यथा राजा तथा प्रजा’, पर लोकतंत्र में ठीक इसका उल्टा है। इसलिये इस जड़ता के लिये सभी आम लोग जिम्मेदार हैं पर वह शिखर पर बैठे लोगों को दोष देकर अपनी असमर्थता जाहिर करते हैं कि ‘क्या किया जा सकता है।’</p>
<p>इस इंटरनेट पर जरा गौर करें। अक्सर आप लोग देखते होंगे कि समाचार पत्र पत्रिकाओं में में उसकी चर्चा होती है। आप सुनकर आश्चर्य करेंगे कि इनमें से कई ऐसे आलेख होते हैं जिनको इंटरनेट पर ब्लाग से लिया जाता है-जब किसी का नाम न दिखें तो समझ लें कि वह कहीं न कहीं इंटरनेट से लिया गया है। यह सब इसलिये हो रहा है क्योंकि अधिकतर इंटरनेट प्रयोक्ता केवल फोटो देखने या अपने पढ़ने के लिये बेकार की सामग्री पढ़ने में व्यस्त हैं। उनकी तरफ से हिंदी भाषी लेखकों के लिये प्रोत्साहन जैसा कोई भाव नहीं है। ऐसा कर आप न अपना समय जाया कर रहे हैं बल्कि अपने समाज को जड़ता से चेतन की ओर ले जाने का अवसर भी गंवा रहे हैं। वह वर्ग जो समाज को गुलाम बनाये रखना चाहता है कि फिल्मी अभिनेता अभिनेत्रियों के फोटो देखकर आप अपना समय नष्ट करें क्योंकि वह तो उनके द्वारा ही तय किये मुखौटे हैं। आपके सामने टीवी और समाचार पत्रों में भी वही आ रहा है जो उस वर्ग की चाहत है। ऐसे में आपकी मुक्ति का कोई मार्ग नहीं था तो झेल लिये। अब इंटरनेट पर ब्लाग और ट्विटर के जरिये आप अपना संदेश कहीं भी दे सकते हैं। इस पर अपनी सक्रियता बढ़ाईये। जहां तक इस लेखक का अनुभव है कि एक एस. एम. एस लिखने से कम मेहनत यहां पचास अक्षरों का एक पाठ लिखने में होती है। जहां तक हो सके हिंदी में लिखे गये ब्लाग और वेबसाईट को ढूंढिये। स्वयं भी ब्लाग बनाईये। भले ही उसमें पचास शब्द हों। लिखें भले ही एक माह में एक बार। अगर आप समाज के सामान्य आदमी है तो बर्हिमुखी होकर अपनी अभिव्यक्ति दीजिये। वरना तो समाज का खास वर्ग आपके सामने मनोरंजन के नाम पर कार्यक्रम प्रस्तुत कर आपको अंतर्मुखी बना रहा है ताकि आप अपनी जेब ढीली करते रहें। आप किसी से एस. एम. एस. पर बात करने की बजाय अपने ब्लाग पर बात करें वह भी हिंदी में। ऐसे टूल उपलब्ध हैं कि आप रोमन में लिखें तो हिंदी हो जाये और हिंदी में लिखें तो यूनिकोड में परिवर्तित होकर प्रस्तुत किये जा सकें।<br />
याद रखें इस पर अपनी अभिव्यक्ति वैसी उग्र या गालीगलौच वाली न बनायें जैसी आपसी बातचीत में करते हैं। ऐसा करने का मतलब होगा कि उस खास वर्ग को इस आड़ में अपने पर नियंत्रण करने का अवसर देना जो स्वयं चाहे कितनी भी बदतमीजी कर ले पर समाज को तमीज सिखाने के लिये हमेशा नियंत्रण की बात करते हुए धमकाता है।<br />
<span style="color:blue;">प्रसंगवश यहां यह भी बता दें कि यह ब्लाग भी पत्रकारिता के साथ ही चौथा स्तंभ है पांचवां नहीं जैसा कि कुछ लोग कह रहे हैं। सीधी सी बात है कि विधायिका, कार्यपालिका, न्याय पालिका और पत्रकारिता चार स्तंभ हैं। इनमें सभी में फूल लगे हैं। विधायिका में अगर हम देखें तो संसद, विधानसभा, नगर परिषदें और ग्राम पंचायतें आती हैं। कार्यपालिका में मंत्री, संतरी,अधिकारी और लिपिक आते हैं। न्याय पालिका के विस्तारित  रूप को देखें तो उसमें भी माननीय न्यायाधीश, अधिवक्ता, वादी और प्रतिवादी  होते हैं। उसी तरह पत्रकारिता में भी समाचार पत्र, पत्रिकायें, टीवी चैनल और ब्लाग- जिसको हम जन अंतर्जाल पत्रिका भी कह सकते हैं- आते हैं। इसे लोकतंत्र का पांचवां स्तंभ केवल अभिव्यक्ति के इस जन संसाधन का महत्व कम करने के लिये प्रचारित किया जा रहा है ताकि इस पर लिखने वाले अपने महत्व का दावा न करे।<br />
</span><br />
कहने का तात्पर्य यह है कि हिंदी के ब्लाग जगत में आपकी सक्रियता ही इंटरनेट या अंतर्जाल पर आपको प्रयोक्ता के साथ रचयिता बनायेगी। जब ब्लाग आम जन के जीवन का हिस्सा हो जायेगा तक अब सभी क्षेत्रों में बैठे शिखर पुरुषों का हलचल देखिये। अभी तक वह इसी भरोसे हैं कि आम आदमी की अभिव्यक्ति का निर्धारण करने वाला प्रचारतंत्र उनके नियंत्रण में इसलिये चाहे जैसे अपने पक्ष में मोड़ लेंगे। हालांकि अभी हिंदी ब्लाग जगत अधिक अच्छी हालत में नहीं है- इसका कारण भी समाज की उपेक्षा ही है-तब भी अनेक लोग इस पर आंखें लगाये बैठे हैं कि कहीं यह माध्यम शक्तिशाली तो नहीं हो रहा। इसलिये पांचवां स्तंभ या रचनाकर्म के लिये अनावश्यक बताकर इसकी उपेक्षा न केवल स्वयं कर रहे हैं बल्कि समाज में भी इसकी चर्चा इस तरह कर रहे हैं कि जैसे इसको बड़े लोग-जैसे अभिनेता और प्रतिष्ठत लेखक-ही बना सकते हैं। जबकि हकीकत यह है कि अनेक ऐसे ब्लाग लेखक हैं जो अपने रोजगार से जुड़े काम से आने के बाद यहां इस आशा के साथ यहां लिखते हैं कि आज नहीं तो कल यह समाज में जनजन का हिस्सा बनेगा तब वह भी आम लोगों के साथ इस समाज को एक नयी दिशा में ले जाने का प्रयास करेंगे। इसलिये जिन इंटरनेट प्रयोक्ताओं की नजर में यह आलेख पड़े वह इस बात का प्रचार अपने लोगों से अवश्य करें। याद रखें यह लेख उस सामान्य लेखक है जो लेखन क्षेत्र में कभी उचित स्थान न मिल पाने के कारण यह लिखने आया है।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</b><br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior<br />
http://dpkraj.blogspot.com</b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://anantraj.blogspot.com/">2.अनंत शब्दयोग</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
<a href="http://teradipak.blogspot.com/">4.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान पत्रिका</a><br />
</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
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		<title>समाज को नकली नायकों के महिमा मंडन बचना होगा-चिंत्तन आलेख (nakali naykon ka mahim mandan-hindi lekh)</title>
		<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/11/02/nakali-naykon-ka-mahim-mandan/</link>
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		<pubDate>Mon, 02 Nov 2009 13:16:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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		<description><![CDATA[भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान में व्यक्ति को सदैव सकारात्मक सोच की प्रेरणा दी जाती है।  इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि मनुष्य का मन उसे अपने सुख सुविधायें पाने के लिये हमेशा विचलित किये रहता है। ऐसे में मनुष्य या तो दिमागी रूप से आलसी होकर रह जाता है या फिर उसके अंदर नकारात्मक [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=rajlekh.wordpress.com&blog=880918&post=787&subd=rajlekh&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><b>भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान में व्यक्ति को सदैव सकारात्मक सोच की प्रेरणा दी जाती है।  इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि मनुष्य का मन उसे अपने सुख सुविधायें पाने के लिये हमेशा विचलित किये रहता है। ऐसे में मनुष्य या तो दिमागी रूप से आलसी होकर रह जाता है या फिर उसके अंदर नकारात्मक विचारों के प्रति रुझान बढ़ता है। </p>
<p>देखा जाये तो हमारे देश में नकारात्मकता का बोलबाला हमेशा ही रहा है इसलिये धर्मग्रंथों में नाटकीयता के साथ अध्यात्मिक ज्ञान भी सम्मिलित किया गया है पर लोग उनमें शामिल नाटकीय विषयों को मनोरंजन की दृष्टि से देखते हैं जबकि उसमें शामिल अध्यात्मिक ज्ञान ही ग्रहण करने लायक है यह बहुत कम लोग सोच पाते हैं।<br />
लोगों के दृष्टिकोण का यह हाल है कि उनको नकारात्मक विषयों के प्रति अधिक रुझान रहता है।<br />
हमारे देश में यह पंरपरा है कि लड़का जब बाहर कहीं जाता है तो अपने माता पिता के पांव छूता है और आता है तो छूता है।  ऐसे दृश्य को लोग निरपेक्ष भाव से देखते हैं।  कभी आपसी चर्चा में ऐसे नहीं कहते कि ‘अमुक लड़का अपने माता पिता के पांव छूता है’।  इसके विपरीत अगर किसी लड़के ने माता पिता पर हमला कर दिया तो चीत्कार कर उठते हैं ‘आजकल कैसा खराब जमाना आ गया है’।<br />
ठीक उसी तरह हर माता अपने माता अपने बच्चे को प्यार करती है पर कुछ ऐसी घटनायें ऐसी भी हो जाती हैं जब वह अपने बच्चे का गला घोंट देती है। तब भी ऐसी ही चीत्कार।  कहने का तात्पर्य यह है प्रेम और सम्मान निरपेक्ष भाव से देखे जाते हैं और चर्चा के लिये घृणा के साथ हिंसा के विषय लोगों को अच्छे लगते हैं। यह आज से नहीं बल्कि बहुत समय से होता रहा है।  आजकल समाचार पत्र और टीवी ने तो एक तरह से आदमी की सोच को लुप्त ही कर दिया है। उसमें आये दिन ऐसे ही समाचार आते हैं।  उसमें खलपात्रों का भी प्रचार किया जाता है।  अमुक डान ने यह किया तो अमुक ने वह किया।  एक तो समाज में वैसे ही नकारात्मक सोच की प्रधानता उस परा टीवी और समाचार पत्रों के खलपात्रों का महिमामंडल आज की पीढ़ी को भटका रहा है।  सच तो यह है कि समाज में अच्छाई और बुराई का भेद ही समाप्त हो चुका है। बुराई और दुस्साहस को सक्रियता और अच्छाई को निष्क्रियता की तरह प्रदर्शन करना अंततः इस देश के लिये भारी संकट बनता जा रहा है। </p>
<p>अपने विषयों की प्रस्तुति की आक्रामक अभिव्यक्ति करने की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही है यही कारण है कि फिल्म, नाटक, धारावाहिक और साहित्य में सकारात्मक सृजन का अभाव दृष्टिगोचर हो रहा है।  लोग तात्कालिक उपलब्धियों के लिये चीख और चिल्ला कर अपनी अभिव्यक्ति इस तरह दे रहे हैं जैसे कि उसके बिना उनकी कोई सुनेगा ही नहीं।  यह सही है कि किसी भी प्रकार के दृश्यव्य और शाब्दिक सृजन में नायक की प्रतिष्ठा तभी बढ़ती है जब उसके सामने खलनायक हो पर इसमें नाटकीयता के साथ संदेश भी होना चाहिए।  मगर हमेशा ही नायक और खलनायक की द्वंद्वपूर्ण कथा संदेश देने वाली नहीं होती।  हमारे पुराने ग्रंथों में भी नायक और खलनायकों की चर्चा है पर उनमें ऐसे भी पूज्यनीय लोग भी चर्चित रहे हैं जिन्होंने किसी भौतिक  खलनायक का मुकाबला न करते हुए अपने सृजन से ही अपना नाम प्रतिष्ठित किया।   हम भगवान श्रीराम और कृष्ण का नाम जानते हैं पर इन्हें जननायक की तरह प्रतिष्ठित करने वाले बाल्मीकी और वेदव्यास कभी प्रत्यक्ष किसी बैरी से नहीं लड़े।  महाराज शुकदेव ने श्रीमद्भागवत की कथा का प्रतिपादन किया।  विदुर और उनके पुत्र संजय ने भी अपना नाम प्रतिष्ठित करते हुए  किसी प्रकार का युद्ध नहीं किया।  कहने का तात्पर्य यह है कि दृश्यव्य और शाब्दिक  सृजन में नायक और खलनायक की द्वंद्वपूर्ण नाटकीयता का महत्व तो होता है पर सभी कुछ वही नहीं होता। सकारात्मक संदेश देने वाले लोग भी नायक से कम नहीं होते।<br />
वैसे इस नकारात्मक सोच के पीछे हमारी फिल्मों का भी कम योगदान नहीं है।  उसमें नायक, नायिका, खलनायक और खलनायिका की प्रधानता रही है। लोग भी इसके आदी हो गये हैं।   नायक या नायिका तो सभी नहीं बन सकते-आजकल के जमाने में सभी लोग इस सत्य का जाने गये हैं-इसलिये लोग वास्तविक खलनायकों के कृकृत्यों का मुकाबला करने की बजाय उनको  अनदेखा कर जाते हैं।   दरअसल निष्क्रियता को लोगों ने अच्छाई का प्रमाण मान लिया है।<br />
दिल्ली में हाल ही में हुई एक धटना याद आ रही है।  उसमें कार में जा रहे एक दंपत्ति को भीड़ भरे बाजार में लुटेरों ने लूट लिया।  पत्नी कार से उतर कर ठेले वाले से सब्जी ले रही  थी-इसका मतलब वह भीड़ वाला इलाका था-उसी समय लुटेरों ने उसके पति पर हमला कर दिया।  पत्नी अपने पति को बचाने आई तो उस भी हमलावर टूट पड़े।  लोग खड़े देख रहे थे क्योंकि वह नायक नहीं बन सकते थे। खामोशी से सब देखने में उनको अच्छाई नजर आई।  वैसे भी फिल्मों में दिखाया जाता है कि खलनायकों से लड़ने वाले पुलिस अधिकारियों या अन्य पात्रों के परिवारों को ही साफ कर दिया जाता है।  शोले भले ही हिंदी फिल्मों की सबसे लोकप्रिय फिल्म रही हो पर उसने समाज में भले लोगों को निष्क्रियता का भाव अच्छाई के नाम पर भरने का जो काम किया उसे तो एक घृणित फिल्म कहना ही ठीक होगा।</p>
<p>पिछले कुछ दिनों में ऐसी अनेक वारदातें हो चुकी हैं जिसमें भीड़ ने अपराधियों को पीटकर मार डाला। इस विषय पर कभी आप फिल्म बनते नहीं देखेंगे क्योंकि इससे समाज में सक्रियता का संदेश जायेगा।   इन्हीं फिल्मों की आड़ में  पता नहीं कौन कौन अपना पैसा लगाकर अपने प्रायोजित संदेश दे रहा है यह अलग से चर्चा का विषय है।  समस्या यही नहीं है बल्कि फिल्म और टीवी वालों के इन अदृश्य प्रायोजकों को रेडियो और अखबारों से भी सहायता मिल रही है।  इस तरह के संदेशों से आदमी नायक या खलनायक ही  बनेगा। नायकों के लिये सुरक्षित स्थान हो गये हैं पर खलनायकों के लिये जगहें अधिक खाली रहती हैं।  इसलिये समाज के अनेक युवक युवतियों का रुझान खलपात्र की भूमिका अदा करने की ओर आकृष्ट होता हो तो आश्चर्य क्या है? खासतौर से जब पर्दे के  नायकों द्वारा  सामाजिक  खलनायकों की दरबार में नृत्य प्रस्तुति की जाती हो तब तो यही संदेश जाता है कि खलनायकों की समाज में असली भूमिका है। </p>
<p>बहरहाल इसका एक ही उपाय है कि हम अपने अध्ययन, श्रवण, और चिंतन में ऐसे लोगों पर भी विचार  करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन दें जो नाटकीयता से पृथक होकर समाज सेवा, रचनाकर्म, तथा वैज्ञानिक प्रस्तुति करते हों।  द्वंद्वपूर्ण नाटकीयता से परे नहीं रहा जा सकता पर उस पर चर्चा करने की बजाय ऐसे विषयों को महत्व दें, जो सकारात्मक विचार तथा सहज भाव पैदा करने वाले हों। इस समय समाज में अस्थिरता, भय और असुरक्षा का भाव है उसके लिये यह जरूरी है। </b><br />
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<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior</p>
<p>http://dpkraj.blogspot.com</b><br />
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		<title>मनुष्य बनाने की जरुरत-चिंतन आलेख (charitra aur manushya-chintan alekh)</title>
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		<comments>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/31/men-and-corrector-hindi-thiknking/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 31 Oct 2009 05:56:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p>ऐसा नहीं लगता कि निकट भविष्य में जाति पाति, धर्म, भाषा, और क्षेत्र के आधार पर बने समूहों के आपसी विवाद कोई थम जायेंगें।  सच बात तो यह है कि पहले की अपेक्षा यह विवाद बढे़ हैं और इसमें कमी की आशा करना ही व्यर्थ है। समस्या यह है कि लोग देश, समाज, और शहर बनाने की बात तो करते हैं पर व्यक्ति निर्माण की बात कोई नहीं करता।  बहसों में इस बात पर चर्चा अधिक होती है कि समाज कैसा है? इस प्रश्न से सभी लोग भागते हैं कि व्यक्ति कैसे हैं?<br />
इन विवादों की जड़ में व्यक्ति के अंदर स्थित असुरक्षा की भावना है जो न चाहते हुए भी अपने समाज का हर विषय पर अंध समर्थन करने को बाध्य करती है।  कई बार तो ऐसा होता है कि व्यक्ति सच जानते हुए  भी- कि उसके संचालक प्रमुख केवल दिखावे के लिये समूह का हितैषी होने का दावा करते है जिसमें उनका स्वयं का स्वार्थ होता है-अपने समूह का समर्थन करता है।  आजादी से पहले या बाद में जानबूझकर समूह बने रहने दिये गये ताकि उनके प्रमुख आपस में मिलकर अपने सदस्यों पर  नियंत्रण कर अपना काम चलाते रहें।  देश की हालत ऐसी बना दी गयी है कि हर आदमी अपने को असुरक्षित अनुभव करने लगा है और बाध्य होकर विपत्तिकाल में अपने समूह से सहयोग की आशा में उसके प्रमुख के नियंत्रणों को मान लेता है।    आधुनिक शिक्षा ने जाति, भाषा, धर्म और क्षेत्र की भावना को समाप्त करने की बजाय बढ़ाया है। पहले अशिक्षित व्यक्ति चुप रहते थे यह सोचकर कि बड़ लोग ही जाने। मगर अब हालत यह है कि शिक्षित व्यक्ति ही अब समूह के समर्थन में ऐसी गतिविधियां करने लगे हैं कि आश्चर्य होता है। नई तकनीकी का उपयोग करने वाले आतंकवादी इस बात का प्रमाण है।</p>
<p>सर्वजन हिताय की बजाय सर्व समाज हिताय करने की नीति ने आम आदमी को बेबस कर दिया है कि वह अपने समूहों से जुड़ा रहे।  अगर हम दैहिक जीवन के सत्यों को देखें तो यहां कोई किसी का नहीं है पर समूह प्रमुखों की प्रचार रणनीति यह है कि हम ही वह भगवान हैं जो तुम्हारा भला कर सकते हैं।<br />
देश में सामान्य व्यक्ति के लिये बहुत कठिनता का दौर है।  बेरोजगारी के साथ ही शोषण बढ़ रहा है।  शोषित और शोषक के बीच भारी आर्थिक अंतर है।  गरीब और आदमी के बीच अंतर की मीमांसा करना तो एक तरह से समय खराब करना है। आजादी के बाद देश की व्यवस्था संचालन  में मौलिक रूप से बदलाव की बजाय अंग्रेजों की ही पद्धति को अपनाया गया जिनका उद्देश्य ही समाज को बांटकर राज्य करना था।  मुश्किल यह है कि लोग इसी व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं बजाय बदलकर व्यवस्था चलाने के।  आम आदमी का चिंतन मुखर नहीं होता और जो जो मुखर हैं उनका आम आदमी से कोई लेना देना नहंी है। हर कोई अपना विचार लादना चाहता है पर सुनने को कोई तैयार नहीं।<br />
मुख्य विषय व्यक्ति का निर्माण होना चाहिये जबकि   लोग समाज का निर्माण करने की योजना बनाते हैं और उनके लिये  व्यक्ति निर्माण उनके लिये गौण हो जाता है।  कुछ विद्वान उपभोग की बढ़ती प्रवृत्तियों में कोई दोष नहंी देखते और उनके लिये योग तथा सत्साहित्य एक उपेक्षित विषय है।  कभी कभी निराशा होती है पर इसके बावजूद कुछ आशा के केंद्र बिन्दू बन जाते हैं जो उत्साह का संचार करते हैं।   इस समय धर्म के नाम पर विवाद अधिक चल रहा है जो कि एकदम प्रायोजित सा लगता है। ऐसे में   अगर हम भारतीय धर्म की रक्षा की बात करेें तो बाबा रामदेव जी ने अभी बिटेन में योग केंद्र स्थापित किया है। इसके अलावा भी भारतीय योग संस्थान भी विश्व भर में अपनी शाखायें चला रहा है। ऐसे में एक बात लगती है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान अक्षुण्ण रहेगा और धर्म का विस्तार अपने गुणों के कारण होगा।  सच बात तो यह है कि योग साधना और ध्यान ऐसी प्रद्धतियां हैं जो व्यक्ति का निर्माण करती हैं।  यह हमारे धर्म का मूल स्त्रोत भी है।  वह गैरजरूरी उपभोग की वस्तुओं के प्रति प्रवृत्त होने से रोकती हैं।  इस देश की समस्या अब यह नहीं है कि यहां गरीब अधिक हैं बल्कि पैसा अधिक आ गया है जो कि कुछ ही हाथों में बंद हैं।   यही हाथ अपनी रक्षा के लिये गरीबों में ऐसे लोगों को धन मुहैया कराकर समाज में वैमनस्य फैला रहे हैं ताकि गरीबों का ध्यान बंटा रहे।  हम इधर स्वदेशी की बात करते हैं उधर विदेशी वस्तुओं का उपभोग बढ़ रहा है।  व्यक्ति अब वस्तुओं का दास हो रहा है और यहींे से शुरुआत होती आदमी की चिंतन क्षमता के हृास की।  धीरे धीरे वह मानसिक रूप से कमजोर हो जाता है।  फिर उसके सामने दूसरो समूहोें का भय भी प्रस्तुत किया जाता है ताकि वह आजादी से सोच न सके।<br />
देखा जाये तो सारे समूह अप्रासंगिक हो चुके हैं।  मासूम लोग उनके खंडहरों में अपनी सुरक्षा इसलिये ढूंढ रहे हैं क्योंकि राज्य की सुरक्षा का अभाव उनके सामने प्रस्तुत किया जाता है।  जबकि आज के समय व्यक्ति स्वयं सक्षम हो तो राज्य से भी उसे वैसी ही सुरक्षा मिल सकती है पर प्रचार और शिक्षा के माध्यम से शीर्ष पुरुष ही ऐसा वातावरण बनाते हैं कि आदमी समर्थ होने की सोचे भी नहीं। ऐसे में उन्हीं लोगों को ईमानदार माना जा सकता है कि जो व्यक्ति निर्माण की बात करे।<br />
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<b>कवि,लेखक और संपादक, दीपक भारतदीप,ग्वालियर<br />
http://dpkraj.blogspot.com<br />
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		<title>दूसरी किताब-हास्य व्यंग्य  (doosri kitab- hindi hasya vyangya)</title>
		<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/26/second-book-hindo-comedy-satire/</link>
		<comments>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/26/second-book-hindo-comedy-satire/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 26 Oct 2009 16:25:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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		<description><![CDATA[बुद्धिजीवियों का सम्मेलन हो रहा था।  अनेक प्रकार के बुद्धिजीवियों को उसमें आमंत्रण दिया गया।  यह सम्मेलन एक ऐसे बुद्धिजीवी की देखरेख में हो रहा था जिन्होंने तमाम तरह की किताबें लिखी और जिनको अकादमिक संगठनों के पुस्तकालय खरीदकर अपने यहां सजाते रहे।  आम लोग उनका नाम समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=rajlekh.wordpress.com&blog=880918&post=782&subd=rajlekh&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><b>बुद्धिजीवियों का सम्मेलन हो रहा था।  अनेक प्रकार के बुद्धिजीवियों को उसमें आमंत्रण दिया गया।  यह सम्मेलन एक ऐसे बुद्धिजीवी की देखरेख में हो रहा था जिन्होंने तमाम तरह की किताबें लिखी और जिनको अकादमिक संगठनों के पुस्तकालय खरीदकर अपने यहां सजाते रहे।  आम लोग उनका नाम समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी के माध्यम से जानते थे कि कोई ऐसे लेखक हैं जो लिखते हैं।  इस सम्मेलन के आयोजन के लिये एक प्रकाशन संस्थान ने उनके प्रेरित किया जो अब ऐसे लेखक ढूंढ रहा था जिनको अपने बुद्धिजीवी होने का भ्रम हो और वह किताब छपवायें।<br />
प्रकाशक ने उस बुद्धिजीवी से कहा-‘कोई नये बकरे लाओ तो हम आपका कविता संग्रह बिना पैसे लिये  छाप देते हैं।’<br />
उस बुद्धिजीवी ने कहा-‘अब तो मैं बूढ़ा हो गया हूं। अब ऐसे बकरे नहीं मिलते जो छपास के लिये किताबें छपवायें।’<br />
प्रकाशक ने कहा-‘ठीक है! कोई दूसरा आदमी ढूंढता हूं।  हमें प्रकाशन के लिये ऐसे बकरे चाहिये जो आप जैसे बुद्धिजीवियों की महफिलों में भेड़ की तरह हांक कर लाये जाते हैं।’<br />
बुद्धिजीवी ने कहा-‘ठीक है! तुम कहते हो तो कोशिश करता हूं।’<br />
उसने अपने चेले चपाटों को बुलाया। एक चेले ने कहा-‘महाराज, हमारे झांसे में अब ऐसे भेड़नुमा लेखक कहां आयेंगे जिनको बकरा बनाकर उस प्रकाशक के पास ले जायें।’<br />
बुद्धिजीवी ने कहा-‘लानत! सारी शिक्षा बेकार गयी।  इतने वर्ष से क्या मेरे यहां झक मार रहे थे। अरे, कोई सम्मेलन करो।  इतने सारे लोग छद्म श्री, और अहम भूषण सम्मानों के लिये फिर रहे हैं।  उनको अपने वाक्जाल में फंसाकर लाओ।’</p>
<p>चेले अपने अभियान पर निकल पड़े।  एक महाबुद्धिजीवी सम्मेलन का आयोजन किया।  कुल जमा पहुंचे आठ लोग-जिनमें अधिकतर नये नये बुद्धिजीवी बने थे जिनको अपने बहुत बड़े लेखक होने का गुमान था। सम्मेलन संपन्न हो गया।  फोटो वगैरह भी खींच लिये गये।  बुद्धिजीवी के साथ उसके पच्चीस  चेले पांच पांच के समूह में बारी बारी से  ही  मंच पर विराजमान होते रहे।   एक एक कर बाहर ने आये नये  बुद्धिजीवियों को परिचय देने के लिये मंच पर बुलाया गया था।  बाद में उनको नीचे धकिया दिया जाता था। एक नये बुद्धिजीवी लेखक ने कहा-‘भई, हमें भी कुछ बोलने दो।’<br />
मंच पर उन महान बुद्धिजीवी ने अपने चेले को देखा तो वह उस पर बरस पड़ा-‘अबे, तेरी किताबें छपी हैं जो इतने बड़े मंच पर बोलने का अवसर चाहता है।’<br />
तब बुद्धिजीवी ने अपने चेले को डांटा-‘अरे, ऐसा बोला जाता है। यह नये लेखक हैं इनको प्रोत्साहन देना है।’<br />
फिर वह उस नये लेखक से बोले-‘भई, अब तो समय निकल गया है। अगली बार सम्मेलन में तुम्हारा लंबा भाषण रखेंगे। तब तक  ऐसे दो चार सम्मेलनों में बोलने का अभ्यास कर लो। हां, एक किताब जरूर छपवा लेना।’<br />
तब एक दूसरा बुद्धिजीवी बोला-‘पर महाशय, मैं तो तीस साल से लिख रहा हूं। कोई किताब नहीं छपी, पर अखबारों में कभी कभी जगह मिल जाती है।’<br />
बुद्धिजीवी महाशय ने कहा-‘अरे भई, अच्छा लिखोगे तो छपोगे।’<br />
इससे पहले कि वह मेहमान बुद्धिजीवी प्रतिवाद करता तब मंच पर बैठे उन महान बुद्धिजीवी के चेलों  ने तालियां बजा दी जैसे कि कोई रहस्यमय बात उन्होंने कही हो।’</p>
<p>कार्यक्रम समाप्त हो गया। अब सवाल यह था कि उनका प्रचार कैसे हो? बुद्धिजीवी ने समझाया-‘फोटो केवल मंच के ही देना। मेरा भाषण देते हुए जरूर देना।  अपने भी फोटो ऐसे देना जैसे कि सभी का आ जाये।  इसलिये ही मैंने तुम्हें पांच पांच में बांटकर बारी बारी से बैठने के लिये कहा था ताकि अधिक फोटो छप सकें।’<br />
एक चेले ने पूछा-‘महाराज, पर दर्शकों और श्रोताओं के फोटो भी तो छापने पड़ेंगे।’<br />
बुद्धिजीवी ने कहा-‘खाली कुर्सियों के फोटो छपवाओगे, मूर्ख कहीं के! फिर यह भेड़ की तरह लोग आये थे इनके फोटो अगर अखबार में छप गये तो यह शेर हो जायेंगे।  फिर नहीं आने वाले अपने जाल में। यहां आदमी को तब ऊंचा न उठाओ जब तक उससे कोई फायदा न हो।’<br />
चेले ने कहा-‘ठीक है।’<br />
बुद्धिजीवी ने कहा-‘और सुनो। नाश्ते, भोजन, और चाय के भी फोटो छाप देना।  अपने पिछले सम्मेलन की वह फोटो जो नहीं भेज पाये, उपयोग  में  लेना।  खाने की प्लेटों में बचे सामान, पन्नी में पड़े पानी के खाली ग्लास, और टेबलों पर बैठे तुम लोगों के जो फोटो बनवाये थे उनका उपयोग इस बार भी जरूर करना। लिखना कि शानदार भोजन हुआ।’<br />
चेले ने पूछा-‘अगर किसी ने जांच करने का प्रयास किया तो?’<br />
बुद्धिजीवी ने कहा-‘यह लोग तो बाहर के आये थे चले जायेंगे।  तुम लोगों से कोई पूछे तो बता देना।  हां, तुम लोगों ने चाय के ढाबे पर बैठकर जो फोटो खिंचवायी थी वह भी भेज देना।’<br />
एक चेले ने कहा-‘पिछली बार वह छपवा चुके हैं। दो साल पहले।<br />
बुद्धिजीवी ने कहा-‘अब कौन उसे याद रखता है? हां, एक बात याद रखना। मेरे कुछ बुद्धिजीवियों के बयान भी छाप देना। भले ही वह न आये। इससे यह महासम्मेलन लगेगा। कुछ छद्म नाम के विद्वान लोगों का आगमन भी दर्शा देना। इन आठों में लगे रहो। कम से कम दो जरूर बकरे बन जायेंगें।’<br />
नये बुद्धिजीवी रेल्वे स्टेशन पर   अपने ठिकाने लौटने के लिये आये तो उसमें दो गायब थे। एक ने दूसरे से पूछा-‘यह दो क्यों नहीं आये? यहां इसी स्टेशन पर मिलने का सभी ने वादा किया था।<br />
दूसरे ने कहा-‘वह अपनी किताब छपवाने के बाद ही यहां से जायेंगे।  बुद्धिजीवी  के एक चेले ने उनको पटा लिया है। एक ने मुझे मोबाइल पर यह बात बतायी।’<br />
इधर पता लगा कि उनकी ट्रेन आज नहीं जा रही है। दूसरे ट्रेन का इंतजार करने की बजाय उन्होंने वह शहर घूमने का निर्णय किया और पास में ही एक होटल में रुक गये।<br />
अगले दिन सुबह उन्होंने होटल के बाहर एक चाय के ढाबे पर ही अखबार देखा।  उसमें उस महासम्मेलन की खबर छपी थी। अपना नाम और फोटो न देखकर उनको गुस्सा आया। तब वह आपस में बात करने लगे। एक ने कहा-‘यार, हम काहे इतनी दूर आये थे। न खाना खाया न नाश्ता किया। यह खबर देखो। क्या बकवाद लगती है।’<br />
उनकी बातें पास ही बैठा चाय पीता हुआ एक आदमी सुन रहा था।  उसने उनसे पूछा-‘तो तुम भी सम्मेलन में आये हो? जरा सोच समझकर जाना। कहीं जेब कट गयी तो कहीं के नहीं रहोगे।’<br />
उन्होंने उस आदमी की तरफ देखा। वह एकदम मैला कुचला पायजामा पहने हुए था। उसकी दाढ़ी और बाल इतने बढ़े हुए थे कि उसकी तरफ देखना भी बुरा लगता था।<br />
एक बुद्धिजीवी ने उससे जवाब दिया-‘हां, एक बुद्धिजीवी सम्मेलन में आये हैं।’<br />
उसने कहा-‘मैं भी ऐसे ही फंस गया। अपने आपको बड़ा बुद्धिजीवी समझता था। रहने वाला तो यहीं का हूं।  अलबत्ता किताब छपवाने के चक्कर में इतना पैसा खर्च किया फिर उसका विमोचन कराया।  मुझसे कहा गया कि तुम बहुत बड़ बुद्धिजीवी बन जाओगे। छद्म श्री और अहम भूषण पुरस्कार भी मिल सकता है।  मगर उसके बाद कहीं का न रहा।  फिर मुझसे कहा गया कि दूसरी किताब छपवाओ।  उसके लिये बचे खुचे पैसे लेकर निकला तो जेब कट गयी। अरे, ऐसे सम्मेलनों के चक्कर में मत पड़ो।  यहां भेड़ बनाकर लाते हैं और बकरे बनाकर भेज देते हैं।’<br />
उसकी इस कहानी का उन नवबुद्धिजीवियो पर ऐसा असर हुआ कि वह चाय आधी छोड़ कर भाग निकले।<br />
स्टेशन पर एक ने दूसरे से कहा-‘यार, गनीमत है कि भेड़ की तरह आये पर बकरे नहीं बने।’</b><br />
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<b>कवि,लेखक और संपादक, दीपक भारतदीप,ग्वालियर<br />
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<p><strong></strong></p>
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		<item>
		<title>अन्न की तरह धन पचने का भी मंत्र हो तो अच्छा-हिंदी हास्य व्यंग्य (hasya vyangya in hindi)</title>
		<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/24/paisa-pachne-ka-mantra-hasya-vyangya/</link>
		<comments>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/24/paisa-pachne-ka-mantra-hasya-vyangya/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 24 Oct 2009 15:20:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><strong>उस दिन एक संत को हमने पेट में अन्न पचाने का मंत्र बताते हुए सुना। वह सुबह, दोपहर और रात को भोजन करने से पहले और बाद में जाप किये जाने मंत्र बता रहे थे।  हम भी बैठे प्रवचन सुन रहे थे। उसी समय हमारे दिमाग में एक प्रश्न आया कि ‘क्या धन कमाने से पहले  और बाद में पचाने के लिये भी कोई मंत्र होगा।’<br />
कुछ देर बाद उन्होंने लक्ष्मी को अपने घर बुलाने का मंत्र भी सुनाया। तब हमने सोचा कि जब धन को लाने का मंत्र बताया है तो उसे पचाने का मंत्र भी बतायेंगे। पूरे प्रवचन समाप्त हो गये पर ऐसा कोई मंत्र सुनाई नहीं दिया।  मन में उत्सुकता ओर जिज्ञासा का भाव बना रहा। जब कार्यक्रम समाप्त हुआ तो अपने एक सत्संगी से पूछा‘-भई, कोई धन पचाने का भी मंत्र होता है।’<br />
उन सत्संगी ने पहले तो हमें घूर कर देखा और फिर पूछा-‘तुम्हारा स्वास्थ्य कैसा है? इधर क्या सुबह पीकर  सत्संग सुनने आये हो? ऐसे उल्टे सीधे सवाल करने का मतलब तो यही है कि तुम्हें मजाक सूझता है। भला धन भी पचाने की चीज है। जिसके पास धन है वह हर तरह से समर्थ हो जाता है।’’<br />
इधर हमने भी तमाम तरह की किताबें छान मारी पर कहीं धन पचाने का मंत्र नहीं मिला।  ताज्जुब यह देखकर हुआ कि लोग धन को पचाने का कोई मंत्र चाहते भी नहीं  है।  इधर समाज की  जो हालत देखते हैं  तब लगता है कि इसका भी कोई मंत्र होना चाहिए।<br />
हमारे ताऊ कहते थे कि धन और अन्न हरेक को हजम नहीं होता। अधिक अन्न से आदमी बीमार पड़ता है  तो सभी देखते हैं पर अधिक धन जिसका दिमाग खराब कर दे उसको कोई कोई अनुभव करता है।  एक समय था जब सड़क पर निकलते थे तो ऐसा नहीं लगता कि किसी से डर है पर आजकल हालत दूसरे हैं।  साइकिल पर हों या स्कूटर पर यह भय रहता है कि किसी मोटर साइकिल या कार वाले से टक्कर हो तो चोट अपने को लगे या हमारी गाड़ी को तो ठीक है पर दूसरे का कुछ बिगड़ना नहीं चाहिए।  ऐसा कोई दिन नहीं होता जब मोटर साइकिलों और कार वालों का आपसी झगड़ा न देखने को मिलता हो।  आदमी के पास इतना अधिक धन  पास आ रहा है पर जमीन तो उतनी है इसलिये आदमी सड़कों पर अतिक्रमण कर रहा है।  चार पहिया वाली गाड़ियां बढ़ी पर सड़कें छोटी होती जा रही हैं।  ऐसे में टक्करें तो हंांगी।  ऊबड़ खाबड़ सड़कों पर कब तक आदमी गााड़ियां चलाते हुए अपना दिमागी संतुलन बनाये रख सकता है।  ऐसे में किसी की नयी कार है तो समझ लीजिये उसे थोड़ी भी टक्कर अपनी अमीरी पर दाग की तरह लगती है और वह दूसरे पर हाथ मारकर उसे साफ करने पार उतारु हो जाता है।  सड़कों और शहरों का सच सभी जानते हैं पर याद नहीं रखते।  देश के हर शहर का अखबार उठाकर देख लीजिये। सड़क, पानी बिजली और कानून व्यवस्था की शिकायतों से भरा पड़ा मिलेगा।  एक तरह से संक्रमण काल मान सकते हैं।  कहते हैं कि संक्रमण काल में धीरज रखना चाहिये पर लोग हैं कि आक्रामक हो रहे हैं। इतना धन है कि उनको लगता है कि हम चाहे जो खरीद सकते हैं।  इसलिये किसी की थोड़ी गलती पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किये बिना उन्हें चैन नहीं पड़ता।<br />
उस दिन का वाक्या भूले नहीं भूलता।  गैस के चूल्हे की मरम्मत करने वाला एक लड़का अपनी साइकिल पर साजोसामान के साथ जा रहा था। रेल्वे क्रासिंग पर फाटक बंद था। वहां एक कार साइकिल पर चल रहे लड़के के एकदम आगे रुकी। लड़का कोशिश करते हुए भी उसको पीछे से टक्कर मारने से नहीं बच सका।  टक्कर कोई जोरदार नहंी थी। लड़का साइकिल उठाकर कार से दूर खड़ा होकर फाटक का इंतजार करने लग गया। इधर कार वाला बाहर निकला। उसने इशारा कर लड़के को  अपने पास बुलाया और आराम से उसके गाल पर एक थप्पड़ मारी।  वह बिचारा मासूम देखता रह गया।  अमीर की गरीब के प्रति यह बदतमीजी इसी बात का प्रमाण था कि धन सभी को हजम नहीं होता।<br />
हम भी एक दिन साइकिल पर जा रहे थे। जिस शहर में हम पलकर बढ़े हुए  हैं उसी शहर के मुख्य चैराहे से कुछ दूर हमारी साइकिल के आगे एक कार निकल कर थोड़ी दूर रुकी। यह इतना अप्रत्याशित था कि हमारा संतुलन गड़बड़ा गया पर हमने अपनी साइकिल को रोक लिया और टक्कर नहीं हो पायी।   उसमें से कार वाला बाहर आया और अपनी कार को देखने लगा।  वह ऐसे पेश आ रहा था कि जैसे उसके बाप ने सड़क उसे खरीद कर दी हो।  फिर उसने हमें ऐसे जाने का इशारा किया जेसे कि किसी मामले में बाइज्जत बरी कर रहा हो। </p>
<p>कहने का तात्पर्य यह है कि धन को हजम करना भी एक वैसी कला है जैसे खाने को हजम करना।  अगर धन पचने वाली चीज होती तो हार्टअटैक,, डाइबिटीज, ओर उच्च रक्तचाप जैसे राजरोग नहीं फैलते। किसी गरीब या मजदूर को हमने इन बीमारियों का शिकार होते नहीं देखा।  आप कहेंगे कि यह तो भोजन के अपच होने के ही परिणाम है पर नहीं चिकित्सक तो यही कहते हैं कि यह राजरोग दिमागी तनाव से पैदा होते हैं।  स्पष्टतः यह धन पचाने से जुड़े हुऐ हैं। जब धन आता है तो आदमी अहंकार वश शारीरिक श्रम से परे रहते हुए हमेशा इस प्रयास में रहता है कि वह अपना पभाव किसी पर जमाये। मतलब धन उसे हजम नहीं होता।  इसका कोई मंत्र नहीं बताता।  हम जानते हैं पर बतायेंगे नहंी क्योंकि इसके लिये फीस हमको चाहिये।   इधर मुफ्त  सेवा में कोई न नाम मिलता है न नामा।  समस्या वही है कि आखिर धन पचाने का मंत्र चाहिये इस बात को मानते कितने लोग हैं?’<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</strong><br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior<br />
http://dpkraj.blogspot.com</b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
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	</item>
		<item>
		<title>गुलाम कर रहे राज़-त्रिपदम (gulam kar rahe raj-tripadam)</title>
		<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/23/gulam-raj-hindi-poem/</link>
		<comments>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/23/gulam-raj-hindi-poem/#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 23 Oct 2009 15:23:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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		<description><![CDATA[गुलाम राज
कर रहे हैं यहां
गुलाम पर।
कोई छोटा है
कोई  उससे बड़ा
यूं नाम भर।
हुक्म चले
नहीं पहुंचता है
मुकाम पर।
कागजी नाव
तैरती दिखती है
यूं काम पर।
बड़ा इलाज
महंगा मिलता है
जुकाम पर।
खोई जिंदगी
ढूंढ रहे हैं
लोग दुकान पर।
दर्द पराया
सस्ता बतलाते
जुबान पर।
शिक्षा के नाम
पट्टा बंध रहा है
गुलाम पर।
जड़ शब्द
कैसे तीर बनेंगे
कमान पर।
आजादी नारा
मूर्ति जैसे टांगे हैं
गुलाम घर।
जो खुद बंधे
आशा कैसे टिकायें
गुलाम पर।
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;
कवि,लेखक और [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=rajlekh.wordpress.com&blog=880918&post=778&subd=rajlekh&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><strong>गुलाम राज<br />
कर रहे हैं यहां<br />
गुलाम पर।</p>
<p>कोई छोटा है<br />
कोई  उससे बड़ा<br />
यूं नाम भर।</p>
<p>हुक्म चले<br />
नहीं पहुंचता है<br />
मुकाम पर।</p>
<p>कागजी नाव<br />
तैरती दिखती है<br />
यूं काम पर।</p>
<p>बड़ा इलाज<br />
महंगा मिलता है<br />
जुकाम पर।</p>
<p>खोई जिंदगी<br />
ढूंढ रहे हैं<br />
लोग दुकान पर।</p>
<p>दर्द पराया<br />
सस्ता बतलाते<br />
जुबान पर।</p>
<p>शिक्षा के नाम<br />
पट्टा बंध रहा है<br />
गुलाम पर।</p>
<p>जड़ शब्द<br />
कैसे तीर बनेंगे<br />
कमान पर।</p>
<p>आजादी नारा<br />
मूर्ति जैसे टांगे हैं<br />
गुलाम घर।</p>
<p>जो खुद बंधे<br />
आशा कैसे टिकायें<br />
गुलाम पर।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</strong><br />
<b>कवि,लेखक और संपादक, दीपक भारतदीप,ग्वालियर<br />
http://dpkraj.blogspot.com<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</b></p>
<blockquote><p><strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग<a href="http://deepkraj.blogspot.com/">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग<br />
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</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
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	</item>
		<item>
		<title>असली  नकली पुरस्कार-हिंदी हास्य व्यंग्य (hindi comedy satire on prize)</title>
		<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/22/puraskar-par-hindi-vyangya/</link>
		<comments>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/22/puraskar-par-hindi-vyangya/#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 22 Oct 2009 13:49:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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		<description><![CDATA[समाज सेवाध्यक्ष जी ने अपनी बाहें टेबल पर टिकाई अपना मूंह हथेलियों पर रखने को बाद अपने सात सभासदों की उपस्थिति देखकर गिनती की। आठवां सदस्य सचिव लेखपालक गायब था। उन्होंने कहा‘-यह सचिव लेखपालक हमेशा ही देर से आता है। सारा हिसाब किताब उसके पास है और उसके बिना यहां चर्चा नहीं हो सकती।’
सामने बैठे [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=rajlekh.wordpress.com&blog=880918&post=776&subd=rajlekh&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><b>समाज सेवाध्यक्ष जी ने अपनी बाहें टेबल पर टिकाई अपना मूंह हथेलियों पर रखने को बाद अपने सात सभासदों की उपस्थिति देखकर गिनती की। आठवां सदस्य सचिव लेखपालक गायब था। उन्होंने कहा‘-यह सचिव लेखपालक हमेशा ही देर से आता है। सारा हिसाब किताब उसके पास है और उसके बिना यहां चर्चा नहीं हो सकती।’<br />
सामने बैठे सभी सातों सदस्य एकटक उनकी तरफ देख रहे थे। समाज सेवाध्यक्ष जी उठे और बैठक कक्ष में ही टहलने लगे। फिर कुछ कहने लगे। मौजूद सदस्य यह नहीं समझ पा रहे थे कि वह अपने से बात कर रहे हैं या उनसे।  अलबत्ता उनके शब्द सभी को साफ सुनाई दे रहे थे।<br />
वह कह रहे थे कि ‘इस बार हमने सूखा राहत और बाढ़ बचाव  में अपना काम कर यह सिद्ध कर दिया है कि हमारी इस संस्था की भूमिका समाज सेवा के मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण है&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;’’<br />
इससे पहले वह कुछ आगे बोलें एक सदस्य ने यह सिद्ध करने के लिये कि वह भी बोलना जानते हैं, उनकी बात पूरी होने से पहले ही  अपनी बात कही-’पर साहब, यह तो पुरस्कार समिति की बैठक है!’<br />
इससे पहले कि समाज सेवाध्यक्ष कुछ कहते एक दूसरे सदस्य ने भी यह सिद्ध करने के लिये कि वह बहस भी कर सकता है, उस सदस्य को फटकारा-‘अरे, कैसी बेवकूफी वाली बात करते हो। चाहे बाढ़ हो या अकाल, काम तो अपनी समिति ही करती है जिसके सदस्य तो हम आठ और नौवें साहब हैं। हमारा काम क्या है, केवल चंदा उगाहना और अपनी समाज सेवा के रूप में  उसे बांटने में कलाकारी दिखाना। साहब को बोलने दो, बीच में बोलकर उनकी चिंतन प्रक्रिया को भंग मत करो।’<br />
समाज सेवाध्यक्ष ने दूसरे को डांटा-‘यह बांटने में कलाकारी वाली बात इतनी जोर से मत कहो। दीवारों के भी कान होते हैं।<br />
बैठक में सन्नाटा छा गया। थोड़ी देर बाद समाज सेवाध्यक्ष कुर्सी पर विराजे और बोले-‘‘इस बार हमनें खास ढंग के पुरस्कार बांटने की घोषणा की थी ताकि उसके लिये स्वप्रायोजक मिलें या फिर कोई प्रायोजक पकड़ कर इनाम लेने आयें।  लगता है कि बाढ़ और अकाल में काम का प्रचार ढंग से नहीं हुआ। वैसे अखबारों में धन और अन्न लेने वाले पीड़ितों के हमने इधर उधर से फोटो जुगाड़ने में बहुत मेहनत की। उनके प्रचार पर कुछ पैसा भी खर्च हुआ लगता है उसका परिणाम नहीं निकला।’<br />
तीसरा सदस्य बोला-‘आजकल लोगों में दया धर्म कम हो गया है। ढंग से चंदा भी नहीं देते। हिसाब मांगते हैं। हम तो कह देते हैं कि हम तो चंदा लेकर तुम्हें दान का पुण्य दे रहे हैं वरना खुद कर देख लो हमारे जैसी समाज सेवा।’<br />
एक अन्य सदस्य ने उसे फटकारा-‘कमबख्त, तुम कहां चंदा मांगने जाते हो? बस, प्रचार सचिव के नाम पर इधर उधर पर्चे बांटते हो। तुम्हारा काम इतना खराब है जिसकी वजह से लोगों को हमारी कार्य प्र्रगति की जानकारी नहीं मिल पाती।’<br />
एक अन्य सदस्य को उसकी बात समझ में नहीं आयी तो बोल पड़ा-‘हम काम कौनसा करते हैं जिसकी जानकारी लोगों को मिले। बस काम का प्रचार है, वह भी यह ढंग से नहीं करता।’<br />
समाज सेवाध्यक्ष ने कहा-‘खामोश हो जाओ, अपनी असलियत यहां क्यों बखान कर रहे हो। कोई सुन लेगा तो! फिर आजकल स्टिंग आपरेशन भी हो जाते हैं।  हमारी संस्था की कमाई देखकर बहुत से लोग हमारे पीछे पड़े हैं। इसलिये अब सोच समझकर बोला करो। यहां ही नहीं बाहर भी ऐसी आदत डाल दो।’<br />
इतने में सचिव लेखपालक आ गया। उसे देखते ही समाज सेवाध्यक्ष बोले-‘यह आने का समय है? कहां चले गये थे?’<br />
सचिव लेखपालक बोला-‘सारा काम तो मुझे ही करना पड़ता है, आप तो सभी केवल देखते हो। इस साल पुरस्कार देने के लिये जुगाड़ लगाना था। इसके लिये दो तीन लोगों से बात कर ली है।  कार्यक्रम का खर्च, उनको दिये जाने वाला उपहार और अपने लिये कमीशन का जुगाड़ लगाना था। फिर पुरस्कार के नाम पर चंदा भी लेना है। इसके लिये कुछ लोगों को ‘समाज सेवा’ के लिये सम्मान देना था।’<br />
एक सदस्य चिल्लाया-‘नहीं! समाज सेवा का पुरस्कार हम देंगे तो फिर हमारी समाज सेवा की क्या इज्जत रह जायेगी।’<br />
समाज सेवाध्यक्ष ने कहा-‘हम यहां समाज सेवा की बात नहीं कर रहे पुरस्कार देकर प्रोत्साहन देने वाला काम रहे हैं।  समाज सेवा के  लिये एक पुरस्कार अपने सचिव और प्रचार सचिव को भी देंगे। कौन रोकड़ा देना है? देंगे तो आयेगा तो अपने पास ही। आगे बोलो।’<br />
सचिव ने कहा-‘इस बार हथेली पर सरसों जमाने और बबूल बोकर आम उगाने के लिये अनोखे पुरस्कार दिये जायेंगे।’<br />
एक सदस्य के मूंह से चीख निकल गयी-‘पर यह तो कभी हो ही नहीं सकता। बरसों पुरानी कहावत है।’<br />
सचिव ने कहा-‘हमें क्या? वह लोग बड़ी संस्थाओं का प्रमाणपत्र ले आयेंगे जो यहां उपस्थित सभी दर्शकों को दिखाये जायेंगे।’<br />
एक अन्य सदस्य ने कहा-‘पर वह संस्थायें कौनसी होंगी। पता करना असली है कि नकली।’<br />
सचिव ने कहा-‘हमें क्या? अरे, जब हम किसी से हाथ में हजार का नोट लेते हैं तो क्या पहचान पाते हैं कि वह असली है या नकली!  यहां किसको फुर्सत रखी है कि यह जानने का प्रयास करे कि ऐसा प्रमाण पत्र देने वाली संस्थायें असली हैं या नकली।  बस, इतना पता है कि जिन लोगों ने इसके लिये पुरस्कार मांगे हैं उनमें एक स्व प्रयोजक है और दूसरे का प्रायोजन एक ऐसा आदमी कर रहा है जिसे पुरस्कार लेने वाले से भारी राशि कर्जे के रूप में लेनी है जिसे वह कभी चुकायेगा नहीं। समझे! बाकी पुरस्कार तो समाज सेवियों के हैं जो बिचारे अपने घर से बाहर कभी सोच भी नहीं पाते पर उनको अपने घर की महिलाओं पर रौब गालिब करना है।’<br />
सभी सोच में पड़ गये तक समाज सेवाध्यक्ष ने कहा-‘तुम सभी को संाप क्यों सूंघ गया। सचिव लेखपालक ने जो प्रस्ताव रखा है वह भी कम अनोखा नहीं है। बजाओ तालियां।’<br />
सभी लोगों ने सहमति में अपनी तालियां बजायीं।</b></p>
<p>&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;<br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior<br />
http://dpkraj.blogspot.com</b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<blockquote><p><strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
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	</item>
		<item>
		<title>तुम वह समंदर बनना-हिंदी कविता (tum samandar banna-hindi kavita)</title>
		<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/21/samandar-aur-aakash-hindi-kavita/</link>
		<comments>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/21/samandar-aur-aakash-hindi-kavita/#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 21 Oct 2009 14:29:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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		<description><![CDATA[सारे जहां की प्यास मिटा सको
तुम वह समंदर बनना.
भेजे जो आकाश में पानी भरकर मेघ
जहां लोग पानी को तरसे
वहीँ समन्दर से लाया अमृत बरसे
अपने किये का नाम कभी न करना.
गंगा पवित्र नदी कहलाती है,
पर अपने किनारे की ही प्यास बुझाती है,
देवी की तरह पुजती पर
लाशों से मैली भी की जाती है,
जब तक समन्दर तक पहुँचती
तब [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=rajlekh.wordpress.com&blog=880918&post=774&subd=rajlekh&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><b>सारे जहां की प्यास मिटा सको<br />
तुम वह समंदर बनना.<br />
भेजे जो आकाश में पानी भरकर मेघ<br />
जहां लोग पानी को तरसे<br />
वहीँ समन्दर से लाया अमृत बरसे<br />
अपने किये का नाम कभी न करना.</p>
<p>गंगा पवित्र नदी कहलाती है,<br />
पर अपने किनारे की ही प्यास बुझाती है,<br />
देवी की तरह पुजती पर<br />
लाशों से मैली भी की जाती है,<br />
जब तक समन्दर तक पहुँचती<br />
तब तक समेटती है दूसरों के पाप,<br />
जहां है इज्जत का वरदान<br />
वहां साथ लगा है बदनामी का शाप,<br />
तुम बने रहना हमेशा खारे<br />
किनारे आये प्यासों की प्यास बुझाने के लिए<br />
दिखावे के पुण्य की लालच में<br />
अपनी असलियत मत बदलना. </b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
<b>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, Gwalior<br />
http://zeedipak.blogspot.com<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-<br />
</b><br />
<b><a href="http://bharatdeep.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप की हिन्दी-पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
अन्य ब्लाग<br />
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<a href="http://dpkraj.blogspot.com/">2.दीपक भारतदीप का चिंतन</a><br />
<a href="http://zeedipak.blogspot.com/">3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a><br />
</b></p>
  <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gocomments/rajlekh.wordpress.com/774/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/comments/rajlekh.wordpress.com/774/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godelicious/rajlekh.wordpress.com/774/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/delicious/rajlekh.wordpress.com/774/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/gostumble/rajlekh.wordpress.com/774/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/stumble/rajlekh.wordpress.com/774/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/godigg/rajlekh.wordpress.com/774/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/digg/rajlekh.wordpress.com/774/" /></a> <a rel="nofollow" href="http://feeds.wordpress.com/1.0/goreddit/rajlekh.wordpress.com/774/"><img alt="" border="0" src="http://feeds.wordpress.com/1.0/reddit/rajlekh.wordpress.com/774/" /></a> <img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=rajlekh.wordpress.com&blog=880918&post=774&subd=rajlekh&ref=&feed=1" /></div>]]></content:encoded>
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			<media:title type="html">राजलेख</media:title>
		</media:content>
	</item>
		<item>
		<title>सब दिया उसने फिर भी हाथ फैलाते-व्यंग्य कविता</title>
		<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/19/god-and-man-hindi-satire-poem/</link>
		<comments>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/19/god-and-man-hindi-satire-poem/#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 19 Oct 2009 14:09:35 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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		<description><![CDATA[सर्वशक्तिमान के दरबार में
क्यों जाकर भीड़ लगाते हो,
जिसने दिए काम करने को हाथ
उसी के सामने कुछ मांगने के लिए
क्यों फैलाते हो.
जिसने दिए चलने के लिए पाँव
क्यों लौटकर जाते हो फिर &#160;उसके गाँव,
उसने दुनियाँ&#160;&#160;&#160;देखने के लिए दी है आँखें
टकटकी लगाए उसी की तरह क्यों देखते हो
जैसे&#160; कैद किये हों तुम्हें सलाखें,
विचार करने के लिए दिया है [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=rajlekh.wordpress.com&blog=880918&post=772&subd=rajlekh&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><b>सर्वशक्तिमान के दरबार में<br />
क्यों जाकर भीड़ लगाते हो,<br />
जिसने दिए काम करने को हाथ<br />
उसी के सामने कुछ मांगने के लिए<br />
क्यों फैलाते हो.<br />
जिसने दिए चलने के लिए पाँव<br />
क्यों लौटकर जाते हो फिर &nbsp;उसके गाँव,<br />
उसने दुनियाँ&nbsp;&nbsp;&nbsp;देखने के लिए दी है आँखें<br />
टकटकी लगाए उसी की तरह क्यों देखते हो<br />
जैसे&nbsp; कैद किये हों तुम्हें सलाखें,<br />
विचार करने के लिए दिया है दिमाग<br />
जिसका करते हो उपयोग&nbsp;&nbsp;केवल पांच प्रतिशत भाग,<br />
कितना ताकतवर तुम्हें उसने बनाया<br />
तुम लाचार होकर उसके सामने क्यों पहुँच जाते हो.<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</b><br />
<b>लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर<br />
http://dpkraj.blogspot.com<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</b><br />
यह आलेख/कविता पाठ इस ब्लाग <a href="http://anant-shabd.blogspot.com/">‘हिंद केसरी पत्रिका’</a> पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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<a href="http://anantraj.blogspot.com/">5.दीपक भारतदीप की अनंत शब्द योग पत्रिका</a></p>
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	</item>
		<item>
		<title>हिंदी अध्यात्म सन्देश-बुरे काम से दूर होकर ही अच्छाई समझना संभव (hindu adhyatm sandesh)</title>
		<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/18/vidru-niti-pap-se-pare-hon/</link>
		<comments>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/18/vidru-niti-pap-se-pare-hon/#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 18 Oct 2009 08:43:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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		<description><![CDATA[अर्थसिद्धि परामिच्छन् धर्ममेवादितश्चरेत्।
न हि धर्मदपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम्।।
हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिस मनुष्य के हृदय में अर्थ प्राप्त करने की इच्छा है उसे धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करना चाहिए। जिस तरह स्वर्ग से अमृत दूर नहीं होता उसी प्रकार धर्म से अर्थ को अलग नहीं किया जा सकता। 
यस्यात्मा विरतः पापाद कल्याणे च [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=rajlekh.wordpress.com&blog=880918&post=770&subd=rajlekh&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><strong>अर्थसिद्धि परामिच्छन् धर्ममेवादितश्चरेत्।<br />
न हि धर्मदपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम्।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिस मनुष्य के हृदय में अर्थ प्राप्त करने की इच्छा है उसे धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करना चाहिए। जिस तरह स्वर्ग से अमृत दूर नहीं होता उसी प्रकार धर्म से अर्थ को अलग नहीं किया जा सकता। </p>
<p><strong>यस्यात्मा विरतः पापाद कल्याणे च निवेशितः।<br />
तेन स्र्वमिदं बुद्धम् प्रकृतिर्विकृतिश्चय वा।।<br />
हिंदी में भावार्थ-</strong>नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिसकी बुद्धि पाप से परे होकर कल्याण के मार्ग पर आ जाये वह इस संसार में हर वस्तु कि प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह से जान लेता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong>यह कहना गलत है धर्म के मार्ग पर अर्थ की प्राप्ति नहीं हो सकती। धर्म-ईमानदारी, सहजता, परमार्थ, और अपने कर्तव्य से प्रतिबद्धता-का परिणाम ही अर्थ की प्राप्ति ही है। यह अलग बात है कि जल्दी अमीर बनने या आवश्यकता से अधिक धनार्जन के के लिये लोग अपने जीवन में आक्रामक और बेईमानी की प्रवृत्ति अपना लेते हैं। इस संसार में ऐसे लोग भी है जो बेईमानी से धन कमाकर कथित रूप से प्रतिष्ठा अर्जित करते हैं। ऐसे लोगों के व्यक्तित्व का आकर्षण समाज के युवाओं को आकर्षित करता है पर उनको यह समझ लेना चाहिये कि बेईमान और भ्रष्ट लोगों को धन, प्रतिष्ठा और बाहुबल की शक्ति की वजह से सामने कोई कुछ नहीं कहता पर पीठ पीछे सभी लोग उनके प्रति घृणा का भाव दिखाने से नहीं चूकते। फिर भ्रष्ट और बेईमान लोग का धन जिस तरह बर्बाद होता है उसे भी देखना चाहिये। </p>
<p>नीति विशारद विदुर जी के अनुसार जिस व्यक्ति ने ज्ञान प्राप्त कर लिया वह इस संसार में व्यक्तियों, वस्तुओं और स्थितियों की प्रकृतियों और विकृतियों को अच्छी तरह समझ जाते हैं। इस ज्ञान से वह विकृतियेां से परे रहने में सफल रहते हैं और प्रकृतियां उनका स्वतः ही मार्ग प्रशस्त करती हैं।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong>
</p></blockquote>
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	</item>
		<item>
		<title>शयों का रोज शक्ल बदलना-हिन्दी व्यंग्य  कविता (shayon ka roop-vyangya kavita)</title>
		<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/17/samanon-ka-chehra-hindi-satire-poem/</link>
		<comments>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/17/samanon-ka-chehra-hindi-satire-poem/#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 17 Oct 2009 06:22:39 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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		<description><![CDATA[
जरुरतों की शयों का रोज शक्ल बदलना
दौलत के पहाड़ पर
इंसानों की चाहतों का चढ़ना
तरक्की का यह पैमाना नहीं होता।
इंसानों के जज़्बातों की उम्र
समय के साथ न बदलती हो
ख्यालों का चैहरा भी
हालातों के साथ नया  नज़र न आये
तब यह तरक्की एक वहम होती है
चलती दुनियां तो दिखती
पर जमाना वहीं का वहीं होता है।
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;
घर में  [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=rajlekh.wordpress.com&blog=880918&post=768&subd=rajlekh&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><b><br />
जरुरतों की शयों का रोज शक्ल बदलना<br />
दौलत के पहाड़ पर<br />
इंसानों की चाहतों का चढ़ना<br />
तरक्की का यह पैमाना नहीं होता।<br />
इंसानों के जज़्बातों की उम्र<br />
समय के साथ न बदलती हो<br />
ख्यालों का चैहरा भी<br />
हालातों के साथ नया  नज़र न आये<br />
तब यह तरक्की एक वहम होती है<br />
चलती दुनियां तो दिखती<br />
पर जमाना वहीं का वहीं होता है।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;<br />
घर में  लाते जब कोई नया सामान<br />
उसकी जगह छोड़ता हुआ<br />
पुराना कबाड़ कहलाता है।<br />
कमरे में दिखती है तरक्की<br />
बुखारी में तबाही का मंजर नज़र आता है।<br />
फिर भी किसे फिक्र है<br />
तरक्की दिखाते है सभी को<br />
तबाही का मंजर तो पर्दे में छिपाया जाता है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</b><br />
<b>कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior<br />
http://dpkraj.blogspot.com</b><br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;-</p>
<blockquote><p>
<strong>यह आलेख इस ब्लाग <a href="http://dpkraj.blogspot.com/">‘दीपक भारतदीप का चिंतन’</a>पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।<br />
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</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
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	</item>
		<item>
		<title>नये जमाने में-हिन्दी शायरी</title>
		<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/16/cricket-and-jazbat-hindi-shayri/</link>
		<comments>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/16/cricket-and-jazbat-hindi-shayri/#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 16 Oct 2009 13:56:52 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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		<description><![CDATA[एक दोस्त ने फोन पर
दूसरे दोस्त से
‘क्या स्कोर चल रहा है
दूसरा बिना समझे तत्काल बोला
‘यार, ऐसा लगता है
मेरी जेब से आज फिर
दस हजार रुपया निकल रहा है।’
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..
इंसान के जज्ब़ात  शर्त से
और समाज के सट्टे के भाव से
समझे जाते हैं।
नये जमाने में
जज़्बात एक शय है
जो खेल में होता बाल
व्यापार में तौल का माल
नासमझी बन गयी [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=rajlekh.wordpress.com&blog=880918&post=766&subd=rajlekh&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><strong>एक दोस्त ने फोन पर<br />
दूसरे दोस्त से<br />
‘क्या स्कोर चल रहा है<br />
दूसरा बिना समझे तत्काल बोला<br />
‘यार, ऐसा लगता है<br />
मेरी जेब से आज फिर<br />
दस हजार रुपया निकल रहा है।’<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;..</strong><br />
<b>इंसान के जज्ब़ात  शर्त से<br />
और समाज के सट्टे के भाव से<br />
समझे जाते हैं।<br />
नये जमाने में<br />
जज़्बात एक शय है<br />
जो खेल में होता बाल<br />
व्यापार में तौल का माल<br />
नासमझी बन गयी है<br />
जज़्बात का सबूत<br />
जो नहीं फंसते जाल में<br />
वह समझदार शैतान समझे जाते हैं<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;.</b><br />
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप<strong></strong></p>
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	</item>
		<item>
		<title>कल्पना के महानायक-आलेख (kalpana ke nayak-hindi alekh)</title>
		<link>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/15/filmi-nayak-hindi-lekh/</link>
		<comments>http://rajlekh.wordpress.com/2009/10/15/filmi-nayak-hindi-lekh/#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 15 Oct 2009 13:58:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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		<description><![CDATA[किसी फिल्म अभिनेता को जब सदी का महानायक कहा जाता है तब उसके प्रशंसकों को बहुत अच्छा लगता है पर अगर थोड़ा चिंतन किया जाये तब इस बात का अहसास होता है कि वह एक काल्पनिक पात्र है।  यह ठीक है कि फिल्म अभिनेता बनने का सपना वह हर युवक देखता है जिसका  [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=rajlekh.wordpress.com&blog=880918&post=764&subd=rajlekh&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><b>किसी फिल्म अभिनेता को जब सदी का महानायक कहा जाता है तब उसके प्रशंसकों को बहुत अच्छा लगता है पर अगर थोड़ा चिंतन किया जाये तब इस बात का अहसास होता है कि वह एक काल्पनिक पात्र है।  यह ठीक है कि फिल्म अभिनेता बनने का सपना वह हर युवक देखता है जिसका  अत्यधिक शौक एक व्यसन बनकर उसके हृदय में स्थापित हो जाता है। अब समय बदल गया है या कहें ठहर गया है।  पहले अनेक ऐसे युवक युवतियां फिल्म अभिनेता अभिनेत्री बन कर सफल रहे जो मामूली घरों से थे या उनका स्वयं का स्तर कोई अधिक ऊंचा नहीं था।  अब वह समय नहीं है, पहले से ही स्थापित परिवारों के बच्चों को नायक बनने का अवसर मिलता है। जड़ हो चुके समाज में इस पर अधिक बहस करने का कोई मतलब नहीं है।<br />
हम तो उन फिल्मों की बात कर रहे हैं जिनकी कहानी, पटकथा और संवाद काल्पनिक होते हैं और जिनको अभिनीत करने का कौशल ही जमीन के कलाकार को आकाश का काल्पनिक सितारा बना देता है।<br />
ऐसे अनेक सितारे आये और गये। कुछ  लोग अविचल भाव से खड़े रहे और उनमें भी कुछ महानायक कहलाने लगे। उनकी उपलब्धियां उनकी निजी है और समाज के लिये उनका कोई महत्व केवल इसलिये ही है क्योंकि इस समय देश भर में सक्रिय प्रचार माध्यम उसे हर पल गाते हैं और यह संभव नहीं है कि कोई आम आदमी उसे देखने सुनने से बच पाये। इस प्रचार का कोई प्रभाव नहीं होता यह मानना गलत होगा।<br />
वैसे  आज के इस सदी के  मनोरंजन के महानायक को भी मानने से इंकार नहीं करते पर केवल हमारा आशय इतना ही है कि उनकी प्रशंसा की सीमा है। वह सदी के महानायक नहीं वरन् इस सदी के मनोरंजन के महानायक हैं।  ऐसे महानायक जिनकी फिल्मों ने  समाज को भीरु, चेतनाविहीन और मानसिक रूप से कमजोर बनाया।  यह कोई आक्षेप नहीं है बल्कि तमाम तरह के अनुभवों से उपजी एक राय है।<br />
एक तो हमारे समाज में पहले से ही आम आदमी में यह भावना घर कर चुकी है कि इस संसार में जब पाप बढ़ते हैं तब भगवान अवतार लेते हैं और तब तक उसको झेलना चाहिये।  ऐसे मेें मनोरंजन के महानायक की फिल्मों से भी यह संदेश निकला कि अगर आप शारीरिक दम खम में अजेय या धनी हैं तभी आप किसी से पंगा ले सकते हैं वरना आपका हाल बुरा होगा। पहले तो समाज दैहिक रूप दूसरों के दर्द को दूर करने के मामले  निष्क्रिय था पर महानायक की फिल्मों ने तो उसे मानसिक रूप से ऐसा जड़ बना दिया कि दूसरे को परेशान देखकर आदमी सोचता तक नहीं है।<br />
हम मनोरंजन के महानायक की फिल्मों का शुरुआती दौर देखें तों उसकी कहानियां में अतिरंजना और संवादों में अतिनाटकीयता रही है।   पहले फिल्मों में खलनायक को ही अमीर बनता दिखाया जाता था पर महानायक की फिल्मों में तो नायक को मजबूरीवश गलत रास्ते पर जाकर धन एवं यश अर्जित करते हुए दिखाया गया। एक मशहूर  फिल्म में एक तस्कर की भूमिका दिखाई गयी। कहा जाता है कि वह उस समय के कुख्यात तस्कर की वह वास्तविक कहानी थी। कुछ लोगों का मानना है कि इसी दौर से अपराध जगत का पैसा फिल्मों में लगना प्रारंभ हुआ क्योंकि खलनायकों का नायक के रूप में महिमा मंडन बिना धन के लालच के संभव नहीं है। बाद में यह प्रमाणिक भी हुआ कि न अपराधी केवल फिल्मों में पैसा लगा रहे थे बल्कि कहानियों में भी हस्तक्षेप करते थे। महानायक की फिल्म आयी जिसमें एक ईमानदार पुलिस इंस्पेक्टर की हाथ काटने का दृश्य था।  बाद में वह अपने दुश्मन से बदला लेता है। अगर आप किसी ईमानदार फिल्म इंस्पेक्टर का हाथ कटते हुए दिखायेंगे तो  बाद में फिल्म की कहानी क्या है यह चर्चा का विषय नहीं होता? इससे आदमी तो डर जाता है न!  हाथ कटा कर जीतना कौन चाहेगा? किसी फिल्म में नाजायज बच्चे की भूमिका इस तरह प्रस्तुत की गयी गोया कि हर नाजायज बच्चा इसी तरह होता है।<br />
ऐसा नहीं है कि महानायक की फिल्मों में ऐसी कहानियां थी। बल्कि उनकी फिल्मों से ऐसा दौर शुरु हुआ जिसमें अपराधी को महिमामंडित किया गया। हर तीसरी फिल्में बिछड़ा हुआ या नाजायज बच्चा नायक होता था।  कहने को तो फिल्म वाले दावा करते हैं समाज में जो दिख रहा है वही दिखाते हैं पर सच तो यह है कि इन फिल्म वालों ने  अनेक ऐसी कहानियों वाली फिल्में  बनाईं जिसमें ईमानदार, साहसी दयालु और परोपकारी व्यक्ति का अंग भंग करने के साथ ही उसका पूरा परिवार नेस्तानाबूद होते दिखाया गया। इन फिल्म वालों से यह पूछे तब कितने समाज में ऐसे किस्से थे जिनको वह दिखा रहे थे। इसी कारण यह हुआ कि कोई आदमी आज भला, मृदभाषी, दयालु और परोपकारी बनने की कोई सोच भी न पाता। साहस करने की तो कोई सोचता भी नहीं। कहने को कहा जाता है कि फिल्मों का प्रभाव समाज पर नहीं पड़ता पर मानसिकता पर पड़ता है। क्या जब हम राम रावण या अर्जुन कर्ण युद्ध का दृश्य मंच या पर्दे पर देखते हैं तब हमारे खून में तेजी नहीं आती? दृश्य और श्रवण का आदमी पर प्रभाव पड़ता है चाहे इसे कोई माने या नहीं। आंतरिक  इंद्रियां ग्रहण करती हैं वैसा ही बाह्य इंद्रियां विसर्जन करती हैं।  ऐसे में कई बरसों तक ऐसी फिल्में देखते रहना जिसमें सारा काम केवल एक नायक करता है वह समाज को जड़ न बनायेे यह संभव नहीं लगता।  एक मजे की बात महानायक की फिल्मों की रही है।  उसमें खलनायक तो गोलियों के दम पर सभी का नाश करता है पर नायक उसे केवल हाथ से ही मारता है।  आखिर इन कहानियां में ऐसे दृश्य क्यों नहीं दिखाये गये जिसमें नायक एक ही झटके में खलनायक का कत्ल करता है।  लंबे एक्शन दृश्य क्यों बनाये गये? इसलिये न कि कोई समाज के खलनायकों को उस तरह न मारे? स्पष्टतः फिल्म बनाने वाले जानते थे कि फिल्मों का प्रभाव जनता पर होता है और खलनायकों को गोली से एकदम मरवाने के दृश्य दिखाये गये तो समाज के खलनायकों की खैर नहीं होती-आखिर फिल्म वाले ऐसा करने से क्यों बचते रहे?<br />
किसी महिला की इज्जत सड़क पर लूटना पहले इतना आसान नहीं था।  राह चलते हुए कत्ल करने की भी हिम्मत किसी में नहीं होती थी। आज अपराधी इसलिये बेखौफ हैं क्योंकि उनको पता है कि सड़क की भीड़ में कोई ताकत नहीं है।  उस भीड़ में कोई वास्तविक नायक नहीं पैदा हो सकता।  अपराधियों की यह सोच कोई गलत नहीं है। काल्पनिक महानायक को देखते हुए वह भी कल्पना के नायक का इंतजार करती है।<br />
सच बात तो यह है कि फिल्मों में अगर काल्पनिक महानायक नहीं बनाया होता तो अपने देश में वास्तविक महानायकों का जमावड़ा होता पर स्थापित परिवारों को वर्चस्व इस तरह नहीं रहता।  अब एक काल्पनिक महानायक है पर वास्तविक खलनायकों की ऐसी भीड़ चारों तरफ बिखरी पड़ी है जिनका नाश करने के लिये शायद समय को खुद चलना पड़े।<br />
कुछ लोगों ने महानायक की फिल्मों को समाज के लिये बहुत महत्वपूर्ण बताया था। हमारा मकसद उनका उत्साह भंग करना नहीं बल्कि यह बताना है कि सच्चा महानायक वही है जिसकी उपलब्धि समाज के लिये महत्वपूर्ण होती है और जिसका यथार्थ धरती पर बहने वाले जीवन में सात्विक परिवर्तन लाता है। भारतीय फिल्मों का इस देश के युवाओं में शराबखोरी,जुआ और लड़कियों पर सार्वजनिक रूप से हमले करने की प्रेरणा देने के अलावा कुछ नहीं किया।  उन्होंने एक नहीं अनेक नायक खड़े किये और उनको देखते हुए यह समाज इतना जड़ हो गया कि यथार्थ में नायक मिलना ही मुश्किल हो गया। </b><br />
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		<title>महात्मा गांधी नोबल नहीं वरन् ग्लोबल थे-आलेख (mahatma gandhi and noble</title>
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		<pubDate>Mon, 12 Oct 2009 15:08:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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		<description><![CDATA[           नोबल पुरस्कार देने वालों ने वाकई हास्यास्पद स्थिति का निर्माण किया है।  उन्होंने अमेरिका के कट्टर विरोधियों को बहुत कुछ आरोप लगाने का अवसर दिया है जो  इस अवसर का खूब उपयोग कर रहे हैं। अमेरिका के कट्टर से कट्टर समर्थक भी [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=rajlekh.wordpress.com&blog=880918&post=762&subd=rajlekh&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><b>           नोबल पुरस्कार देने वालों ने वाकई हास्यास्पद स्थिति का निर्माण किया है।  उन्होंने अमेरिका के कट्टर विरोधियों को बहुत कुछ आरोप लगाने का अवसर दिया है जो  इस अवसर का खूब उपयोग कर रहे हैं। अमेरिका के कट्टर से कट्टर समर्थक भी इस विषय पर उनके सामने टिक नहीं सकता।<br />
आमतौर से भारतीय समाचार माध्यम अप्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से पश्चिम के पुरस्कारों का गुणगान करते हैं पर इस विषय पर वह व्यंग्य कस रहे हैं।  कहीं पढ़ने को मिला कि प्रत्येक वर्ष का नोबल उसी वर्ष की एक फरवरी तक के दर्ज नामों पर उसी दिन तक किये गये काम के लिये दिया जाता है। इसका आशय यह है कि उसके बाद किसी ने नोबल लायक कोई काम किया है तो उसे अगले वर्ष वह पुरस्कार दिया जा सकता है।   इस आधार पर वर्ष 2009 का शांति पुरस्कार 1 फरवरी 2009 तक के कार्यों के लिये दिया जा रहा है जबकि अमेरिका के राष्ट्रपति श्री बराक ओबामा ने 20 फरवरी 2009 का वहां के राष्ट्रपति पद का कार्यभार संभाला था। मतलब यह कि उन्होंने 11 दिन में ही नोबल पुरस्कार प्राप्त करने का काम कर लिया था।<br />
अगर यह तर्क दिया जाये कि उन्होंने विश्व शांति के लिये उससे पहले काम किया गया तो वह इसलिये भी हास्यस्पद होगा क्योंकि स्वयं नोबल देने वाले मानते हैं कि उनके राष्ट्रपति पद पर किये गये कार्यों के लिये ही यह शांति पुरस्कार दिया गया है। बराक ओबामा यकीनन बहुत प्रतिभाशाली हैं और उनकी नीयत पर संदेह का कोई कारण नहीं है। उनको पुरस्कार देना नोबल समिति की किसी भावी रणनीति का हिस्सा भी हो सकती है। हो सकता है कि वह सोच रहे हैं कि विश्वभर में फैली हिंसा रोकने के लिये शायद यह एक उपाय काम कर सकता है।<br />
हमें बाहरी मसलों से लेनादेना अधिक नहीं रखना चाहिये पर इधर लोग आधुनिक समाज में हिंसा का मंत्र स्थापित करने वाले महात्मा गांधी को नोबल पुरस्कार नहीं देने पर नाराज दिख रहे हैं।   दरअसल श्री बराक ओबामा को नोबल देने पर महात्मा गांधी का नाम लेना ही कृतघ्नता है।  इस दुनियां में एक बार ही परमाणु बम का प्रयोग किया गया है और उसका अपराध अमेरिका के नाम पर दर्ज है।  जब पश्चिम  अपनी विज्ञान की शक्ति पर हथियार बनाकर पूर्व को दबा रहा था तब उसकी बढ़त बनाने  का श्रेय उन महानुभावों को जाता है जो उसका हिंसक प्रतिरोध कर रहे थे।  दरअसल पश्चिमी देश तो चाहते थे कि कोई बंदूक उठाये तो हम उस पर तोप दागें।  इतना ही नहीं वह विरोधी को मारकर नायक भी बन रहे थे और सभ्य होने का प्रमाण पत्र भी जुटा लेते थे।  उस समय महात्मा गांधी ने अहिंसक आंदोलन चलाकर न उनको बल्कि चुनौती दी बल्कि उनको सभ्यता का मुखौटा पहने रखने  के लिये बाध्य किया।<br />
वैसे तो हमारे देश में अहिंसा का सिद्धांत बहुत पुराना है पर आधुनिक संदर्भ में जब पूरे विश्व में कथित रूप से सभ्य लोकतंत्र है-चाहे भले ही कहीं तानाशाही हो पर चुनाव का नाटक वहां भी होता है-तब महात्मा गांधी का अहिंसक आंदोलन करने वाला मंत्र बहुत काम का है।  सच तो यह है कि महात्मा गांधी का नाम विश्वव्यापी हो गया है।  जहां तक हमें जानकारी नोबल का अर्थ  अद्वितीय होता है। इसका मतलब यह है कि जिस क्षेत्र में नोबल पुरस्कार दिया जाता है उसमें कोई दूसरा नहीं होना चाहिये। जबकि यह पुरस्कार हर वर्ष दिया जाता है। इसे देखकर कहें तो यही निष्कर्ष निकलता है कि नोबल लेने के बाद भी कोई अद्वितीय नहीं हो जाता। अगले वर्ष कोई दूसरा आ जाता है।  अद्वितीय कहने में एक पैंच है वह यह कि उस समय वह व्यक्ति अद्वितीय है पर आगे कोई होगा इसकी संभावना नहीं जताई जा सकती। गांधी जी के बारे में अगर हम कहें तो अहिंसा का संदेश देने में वह अद्वितीय नहीं थे क्योंकि उसके पहले भी अनेक महापुरुष ऐसा संदेश दे चुके हैं। दूसरा सच यह भी है कि ‘उन जैसा व्यक्ति दूसरा पैदा होगा इसकी संभावना भी नहीं लगती। सीधा मतलब यह है कि वह अद्वितीय  थे नहीं और उन जैसा होगा नहीं। वह अलौकिक शक्ति के स्वामी थे।  इस लोक के सारे पुरस्कार उनके सामने छोटे थे।<br />
कुछ लोगों को इस बात का अफसोस है कि नोबल पुरस्कार मरणोपरांत नहीं दिये जाते। अगर ऐसा होता तो शायद महात्मा गांधी जी के नाम पर नोबल आ जाता।  ऐसा सोच लोगो की संकीर्ण मानसिकता का परिचायक है जो शायद सतही देशभक्ति भावना से से उपजा है।  ऐसा सतही देशभक्ति भाव रखने वालों ने गांधी जी का सही मूल्यांकन नहीं किया है।  वह अफसोस करते हैं कि मरणोपरांत नोबल नहीं दिया जाता और महात्मा गांधी को अपने हृदय में स्थान देने वाले इसे अपना भाग्य कहकर सराह रहे हैं कि उनका नाम कम से कम मरणोपरांत अपमानित होने से बच गया। यह पश्चिमी लोग उनको नोबल देकर स्वयं को ही सम्मािनत करते अगर उन्होंने ऐसा नियम नहीं बनाया होता।<br />
गांधी जी को मानने वाले दक्षिण अफ्रीका के नेता नेल्सन मंडेला को यह पुरस्कार मिला पर उनको गांधी के समकक्ष नहीं माना जाता क्योंकि गांधी जी का कृत्य एक कौम या देश की आजादी तक ही सीमित नहीं है वरन् आधुनिक सभ्यता को एक दिशा देने से जुड़ा है।  नोबल नार्वे की एक संस्था द्वारा दिया जाता है। जी हां, इस नार्वे के बारे में भी हम अखबार में पढ़ चुके हैं जो श्रीलंका में आतंकवादियों की बातचीत के लिये वहां की सरकार से बातचीत करता था। यही नहीं यही नार्वे ने भारत के नगा विद्रोही नेताओं को भी अपने यहां पनाह देता देता था। नार्वे के बारे में अधिक नहीं मालुम पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि वह अमेरिका का पिट्ठू हो सकता है और ऐसे वहां की नोबल बांटने वाली समिति कोई निर्णय अपने देश की नीतियों के प्रतिकूल लेती होगी यह संभव नहीं है।<br />
लब्बोलुआब यह है कि नोबल कोई ऐसा पुरस्कार नहीं रहा जिसे लेकर हम अपने देश के उन महान लोगों को हल्का समझें  जिनको यह नहीं मिला।  सच तो यह है कि अगर आप हमसे पूछेंगे कि इस विश्व का आधुनिक महान लेखक कौन है तो हम निसंकोच अपने हिंदी लेखक प्रेमचंद का नाम ले देंगे। जार्ज बर्नाड या शेक्सिपियर को यहां पढ़ने वाले कितने लोग हैं? इस देश के लिये किसकी नीतियां अनुकूल हैं? इस प्रश्न का जवाब इस व्यंग्य में नहीं दिया जा सकता।  वह अध्यात्म से जुड़ा है। याद रहे भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान न केवल व्यक्ति बल्कि समाज और राष्ट्र के संचालन के सिद्धांत भी प्रतिपादित करता है। बस, उसे समझने की जरुरत है।  इन सिद्धांतों को प्रतिपादित करने वालों को नोबल कोई क्या देगा? वह सभी पहले से ही ग्लोबल (विश्व व्यापी) हैं जिनमें हमारे महात्मा गांधी एक हैं।  गांधीजी के नाम पर युग चलता है कोई एक वर्ष नहीं।</b><br />
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		<title>नोबल और  ग्लोबल-व्यंग्य आलेख (noble and global-hindi satire)</title>
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		<pubDate>Sun, 11 Oct 2009 16:45:14 +0000</pubDate>
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			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><b>अमेरिका के राष्ट्रपति श्री बराक ओबामा को शांति के लिये नोबल पुरस्कार मिलने पर स्वयं उनको ही  बहुत बड़ा अचरज हुआ है।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि ओबामा निहायत सज्जन, विचारवान और सहज प्रवृत्ति के इंसान हैं और एक आम आदमी से राष्ट्रपति पद पर पहुंचने की उनकी यात्रा एक जीवंत कहानी जैसी है।  विश्व में शांति स्थापित हो, उनकी इस इच्छा पर संदेह का भी कोई कारण नहीं दिखता। अगर उनको शांति के लिये नोबल पुरस्कार भविष्य की संभावनाओं के मद्देनज़र दिया गया है तो उस भी किसी को आपत्ति नहीं होना चाहिये। मुख्य बात तो यह है कि नोबल पुरस्कार किसी किये गये काम पर दिया जाता है न कि भविष्य में  किये जाने वाले काम पर।<br />
सच तो यह है कि जिस तरह यह पुरस्कार दिया गया है उस पर हंसी अधिक आ रही है क्योंकि उनके पदभार संभालने के बाद विश्व में कहीं को उल्लेखनीय परिवर्तन हुआ है ऐसा कहीं प्रमाणित नहीं होता।  संभव है कि ओबामा के शासन में अमेरिका विश्व में शांति स्थापित करने में सफल हो-हालांकि इसकी संभावना नगण्य ही लगती है-तब यह नोबल पुरस्कार अपनी सार्थकता प्रमाणित करेगा पर इसका फिलहाल औचित्य क्या है? यह स्वयं श्री ओबामा के समझ में नहीं आई होगी।</p>
<p>वैसे आम भारतीयों को नोबल और ओबामा से क्या लेना?  अलबत्ता एक समस्या भारतीय बुद्धिजीवियों और प्रचार माध्यमों के सामने आने वाली है वह कम दिलचस्प नहीं है। अभी तक तो यह कहा जाता था कि नोबल दुनियां का सबसे बड़ा पुरस्कार है जिसे पूरी ईमानदारी के साथ दिया जाता है-हमारे यहां पश्चिम संस्थाओं के प्रति ऐसी ही भ्रांत धारणायें बनायी गयी हैं जो कि अब धीरे धीरे खंडित होती जा रही हैं।  बचपन में भी हमने पढ़ा था कि भारत के जगदीशचंद्र बसु को भी विज्ञान में कार्य करने पर नोबल पुरस्कार दिया गया। उन्होंने ही पूरे विश्व को बताया था कि वनस्पतियों में मनुष्य की तरह जीवन होता है। श्री रविंद्रनाथ टैगौर को भी साहित्य के लिये नेाबल पुरस्कार दिया गया।   तब हमारा मन में इन महानुभावों के लिये जो श्रद्धा पैदा होती थी वह अवर्णनीय है।<br />
समय के साथ जब बड़े हुए तो फिर अपने देश के पुरस्कारों और सम्मानों को भी देखा।  जब लिखना प्रारंभ किया तब यह नहीं जानते थे कि साहित्य में भी सम्मान होता है।  मगर लिखते लिखते यह ख्याल तो आ ही जाता था कि कभी हमें सम्मान या पुरस्कार मिल सकता है पर जैसे थोड़ा आगे बढ़े तो समझ में आ गया कि देश के सम्मान, पुरस्कार या कोई पदवी पाना हमारे जैसे आदमी के लिये सहज नहीं है क्योंकि अभी भी यहां स्वतंत्र रूप से सांस लेना एक अपराध ही है और जहां तक लिखने का सवाल है किसी की गुलामी हमारे बूते का नहीं था।  फिर भी पुरस्कारों के प्रति सम्मान था पर धीरे धीरे वह समाप्त हो गया।  अलबत्ता अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों के प्रति एक आदर का भाव था पर उसे भी धीरे धीरे क्रांतिकारी लेखकों ने समाप्त कर दिया यह बताकर कि वह केवल पश्चिम की अवधाराओं पर खरा उतरने पर ही मिलता है।<br />
माननीय जगदीश चंद्र बसु की याद आती है जिनके बारे में हमें बताया जाता है कि उन्होंने ही बताया था कि वनस्पितियां भी मनुष्य की तरह प्राणवान है। जब हमने  अपने अध्यात्मिक ग्रंथों को पढ़ा तो पाया कि यह कोई नया रहस्योद्घाटन नहीं था-इसलिये कहते हैं कि इन ग्रंथों के कुछ आवश्यक हिस्से आज भी शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाया जाना आवश्यक है।  यकीनन बसु साहब ने बृहद रूप से इस पर कुछ अनुसंधान कर प्रस्तुत किया होगा जो उनको नोबल पुरस्कार मिला होगा। वैसे वह अमेरिका में ही रहकर काम कर रहे थे, इसकी जानकारी भी बाद में हमें मिली।  कहने का मतलब यह है कि वह भारतीय मूल के थे पर अमेरिका में रहते हुए ही उनको पुरस्कार मिला।  तब से हम अनेक बार सुने चुके हैं कि भारतीय मूल के अमेरिकी को नोबल मिला या कोई बड़ा पद मिला आदि आदि।<br />
माननीय श्री रविद्रनाथ टैगौर के बारे में आज के ही एक प्रगतिशील लेखक के रचना में हमने पढ़ा था कि उनकी कहानियों में अंग्रेजों को काफी महत्व दिया गया इसलिये उनको सम्मानित किया गया। यहां तक ह िराष्ट्रीय गीत ‘जन गन मन’ भी एक अंग्रेज लार्ड के भारत आगमन पर उनके द्वारा लिखा गया जिसमें बाद में संशोधन कर प्रस्तुत किया गया-यह जानकारी इस देश के उसी लेखक ने लिखी थी जिसे आजकल जातिवाद के लिये कोसा जा रहा है। हम नहीं जानते कि सच क्या है? हां, इतना जरूर कह सकते हैं कि विदेशी पुरस्कारों के संबंध में अब यह धारणा बन गयी है कि उनका भारतीय संदर्भ में किये गये किसी कार्य से कोई संबंध नहीं होता।  उसके बाद भी हमारे देश से जुड़े अनेक लोगों को नोबल मिला पर उनके कार्य या व्यक्तित्व में पूर्ण भारतीय का अभाव था।<br />
इसके बावजूद हमारे देश के प्रचार माध्यम नोबल पुरस्कार के समाचार इस तरह देते हैं जैसे कि वह दिखा रहे हों कि देखो नालायकों तुम इसके लायक नहीं हो।  लोग भी बिचारे मन मसोस कर रह जाते थे। मुश्किल अब यह आ रही है कि लोगों के दिमाग में नोबल को लेकर पूर्व में बना आकर्षण समाप्त हो सकता है।  आजकल के आधुनिक प्रचार माध्यम अब नोबल जैसे फालतू खबर पर सनसनी नहीं बना सकते।  भारत में सामान्य जन तो यह देखकर ही हैरान है कि शांति का नोबल पुरस्कार ऐसे दिया गया है जैसे कि किसी हिंदी फिल्म के नये अभिनेता को ‘नये चेहरे’ का पुरस्कार दिया गया है।  एक ही झटके नोबल पुरस्कार का महत्व यहां खत्म हो सकता है।  अपने देश के ही जो संचार माध्यम पहले नोबल पुरस्कारों की सूची बहुत शोर के साथ सुनाते थे अब उसमें फिक्सिंग की बात कह रहे हैं।  हम तो सुनकर ही दंग रह गये जब किसी को यह कहते सुना कि ‘यह अमेरिका की ओबामा की प्रसिद्धि बनाये रखने के लिये किये गये प्रबंधकीय कौशल का  कमाल है’।<br />
सच तो यह है कि इस देश के कुछ लोग ऐसे हैं जो वाकई काबिल हैं पर उन्हें देश और विदेश में पुरस्कार नहीं मिले क्योंकि उन्होंने हिंदी या क्षेत्रीय भाषा मेें लिखा या अन्य सृजन किया।  उनका लिखा हुआ या अन्य सृजन इतना जोरदार है कि सदियों तक वह बना रहेगा जबकि भारत की गरीबी पर लिखकर कई ऐसे लेखक पुरस्कार ले आये जो अब पागलपन की बात करते हैं।  इनमें कुछ तो ऐसे हैं जो सीमावर्ती क्षेत्रों की गरीब और अनाचार देखकर उनको पाकिस्तान तथा चीन को देने की बात करते हैं।  मध्य की गरीबी के लिये वहां से आंतक के आयात का भी समर्थन करने लग जाते हैं।  कहने का तात्पर्य यह है कि भारत विरोधी संदर्भ में उनको कुछ ऐसे पुरस्कार मिले जो नोबल नहीं थे पर उसे जैसे लगते थे। </p>
<p>अब इन विदेशी पुरस्कारों से सम्मानित महानुभावों का बाजार भाव भी गिर सकता है।  राह चलते हुए कोई भी पूछ सकता है कि ‘भला, किससे और कैसे पुरस्कार की फिक्सिंग की थी। जरा बताओ। हम भी कर लेंगे।  वैसे आस्कर को लेकर भी कुछ दिल पहले लोगों का भ्रम टूटा था और अब नोबल ने भी तोड़ दिया।  स्पष्टतः यह पुरस्कार गुप्त ऐजेंडों पर दिये जाते हैं।  इन पर चर्चा करें तो बहुत लंबी बात हो जायेगी। </b><br />
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</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
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		<title>चाणक्य दर्शन-धर्म परिवर्तन करने से मनुष्य बाद में दु:खी हो जाता है(hindi sandesh-dharm parivaratan anuchit-chankya niti</title>
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		<pubDate>Sat, 10 Oct 2009 14:57:41 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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		<description><![CDATA[नीति विशारद चाणक्य कहते हैं
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;
आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः।
स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः।।
हिन्दी में भावार्थ कि अपना समूह,समुदाय वर्ग या धर्म त्याग कर दूसरे का सहारा लेने वाले राजा का नाश हो जाता है वैसे ही जो मनुष्य अपने समुदाय या धर्म त्यागकर दूसरे का आसरा लेता है वह भी जल्दी नष्ट हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=rajlekh.wordpress.com&blog=880918&post=754&subd=rajlekh&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><b>नीति विशारद चाणक्य कहते हैं<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</b><br />
<strong>आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः।<br />
स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः।।</strong><br />
<b>हिन्दी में भावार्थ</b> कि अपना समूह,समुदाय वर्ग या धर्म त्याग कर दूसरे का सहारा लेने वाले राजा का नाश हो जाता है वैसे ही जो मनुष्य अपने समुदाय या धर्म त्यागकर दूसरे का आसरा लेता है वह भी जल्दी नष्ट हो जाता है।</p>
<p><strong>वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-</strong> अक्सर लोग धर्म की व्याख्या अपने ढंग से करते हैं। अनेक लोग निराशा, लालच या आकर्षण के वशीभूत होकर धर्म में परिवर्तन कर दूसरा अपना लेते हैं-यह अज्ञान का प्रतीक है। दरअसल मनुष्य के मन में जो विश्वास बचपन में उसके माता पिता द्वारा स्थापित किया जाता है उसी को मानकर वह आगे बढ़ता जाता है। कहा भी जाता है कि माता पिता प्रथम गुरू होते हैं। उनके द्वारा मन में स्थापित संस्कार,आस्था तथा इष्ट के स्वरूप में बदलाव नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि बचपन से ही मन में स्थापित संस्कार और आस्थाओं से आदमी आसानी से नहीं छूट पाता-एक तरह से कहा जाये कि पूरी जिंदगी वह उनसे परे नहीं हो पाता।<br />
कहा भी जाता है कि आदमी में संस्कार,नैतिकता और आस्था स्थापित करने का समय बाल्यकाल ही होता है। ऐसे में कुछ लोग निराशा, लालच,भय या आकर्षण की वजह से से अपने धर्म या आस्था में बदलाव लाते हैं पर बहुत जल्दी ही उनमें अपने पुराने संस्कार, आस्थाऐं और इष्ट के स्वरूप का प्रभाव अपना रंग दिखाने लगता है पर तब उनको यह डर लगता है कि हमने जो नया विश्वास, धर्म या इष्ट के स्वरूप को अपनाया है उसको मानने वाले दूसरे लोग क्या कहेंगे? एक तरफ अपने पुराने संस्कार और आस्थाओं की खींचने वाला मानसिक विचार और दूसरे का दबाव आदमी को तनाव में डाल देता है। धीरे धीरे यह तनाव आदमी की देह और मन में विकार पैदा कर देता है। इसलिये अपने अंदर बचपन से स्थापित संस्कार,आस्था और इष्ट के स्वरूप में में कभी बदलाव नहीं करना चाहिये बल्कि अपने धर्म के साथ ही चलते हुए सांसरिक कर्मों में निष्काम भाव से लिप्त होना चाहिये। भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीगीता में कहा भी है कि अपना धर्म गुणहीन क्यों न हो पर उसका त्याग नहीं करें क्योंकि दूसरे का धर्म कितना भी गुणवान हो अपने लिये डरावना ही होता है। धर्म परिवर्तन करने वाले कभी सुखी नहीं रहते है और आस्था बदलने वालों का भटकाव कभी ख़त्म नहीं होता यह&nbsp; अंतिम सत्य है।<br />
&nbsp;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
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<strong>यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग <a href="http://deepkraj.blogspot.com/">‘शब्दलेख सारथी’</a> पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग<br />
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप</strong>
</p></blockquote>
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		<title>शिशुओं का क्रीड़ाश्रम और मिठाई-हिन्दीहास्य व्यंग (child story and sweats-hindi vyanga</title>
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		<pubDate>Tue, 06 Oct 2009 14:53:18 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><b>सुबह दीपक बापू सड़कों पर पानी से भरे गड्ढों में गिरने से बचते हुए जल्दी जल्दी ही आलोचक महाराज के घर पहुंचे। उस दिन बरसात होने से  उनको आशा थी कि आलोचक महाराज प्रसन्न मुद्रा में होंगे। इधर उमस के मारे सभी परेशान थे तो आलोचक महाराज भी भला कहां बच सकते थे। ऐसे में दीपक बापू को यह आशंका थी उनकी कविताओं पर आलोचक महाराज कुछ अधिक ही निंदा स्तुति कर देंगे। वैसे भी दीपक बापू की कविताओं पर आलोचक महाराज ने कभी कोई अच्छी मुहर नहीं लगायी  पर दीपक बापू आदत से  मजबूर थे कि उनको दिखाये बगैर अपनी कवितायें कहीं भेजते ही नहीं थे। </p>
<p>सड़क से उतरकर जब उनके दरवाजे तक पहुंचे तो दीपक बापू के मन में ऐसे आत्मविश्वास आया जैसे कि मैराथन जीत कर आये हों।  इधर मौसम ने भी कुछ ऐसा आत्मविश्वास उनके अंदर पैदा हुआ कि उनको लगा कि ‘वाह वाह’ के रूप में उनको एक कप मिल ही जायेगा।  उन्होंने दरवाजे के अंदर झांका तो देखा आलोचक महाराज सोफे पर जमे हुए सामने टीवी देख रहे थे। वहां से बच्चे के रोने की आवाज आ रही थी। उन्होंने आलोचक महाराज<br />
को हाथ जोड़कर नमस्ते की भी और मुख से उच्चारण कर उनका ध्यान आकर्षित करने का  भी प्रयास किया-यह करना ही पड़ता है जब आदमी आपकी तरफ ध्यान नहीं दे रहा हो।<br />
आलोचक महाराज ने उनकी तरफ ध्यान ही नहीं दिया। दीपक बापू ने जरा गौर से देखा तो पाया कि उनकी आंखों से आंसु निकल रहे थे। दीपक बापू सहम गये। क्या सोचा था क्या हो गया। कहां सोचा था कि मौसम अच्छा है आलोचक महाराज का मूड भी  अच्छा होगा। पहली बार अपनी कविताओं पर ‘वाह वाह रूपी कविताओं का कप’ ले जायेंगे। कहां यह पहले से भी बुरी हालत में देख रहे हैं। वैसे दीपक बापू ने आलोचक महाराज को कभी हंसते हुए नहीं देखा था-तब भी जब उनका सम्मान हुआ था। आज इस तरह रोना!<br />
‘क्या बात है आलोचक महाराज! मौसम इतना सुहाना है और आप है कि रुंआसे हो रहे हैं।‘दीपक बापू बोले।<br />
आलोचक महाराज ने कहा-‘देखो सामने! टीवी पर बच्चा रो रहा है। इसके माता पिता ने इसको खुद ऐसे लोगों को सौंपा है जो इस वास्तविक शो में नकली माता पिता की भूमिका निभा रहे हैं। वह लोग इतने नासमझ हैं कि उनको पता ही नहीं कि बच्चा अपनी माता के बिना कभी खुश नहीं रह सकता।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘महाराज! यह तो सीन ही नकली है! आप कहां चक्कर में पड़ गये। अब यह टीवी बंद कर दीजिये। हम अपने साथ मिठाई का डिब्बा साथ में ले आयें हैं ताकि आप उनको खाते हुए हमारी यह दो कविताओं पर अपना विचार व्यक्त कर सकें।’<br />
आलोचक महाराज ने कहा-‘बेवकूफ आदमी! समाज में कैसी कैसी घटनायें हो रही हैं उस पर तुम कभी सोचते ही नहीं हो।  अरे, देखो इन बच्चों की चीत्कार हमारा हृदय विदीर्ण किये दे रही है। अरे, हमें इसके माता पिता मिल जायें तो उनको ऐसी सुनायें जैसी कभी तुम्हारी घटिया कविताओं पर भी नहीं सुनाई होगी।’<br />
दीपक बापू ने कहा-‘महाराज हमारी कविताओं पर हमें क्या मिलता है? उनको तो इस बच्चे के अभिनय पर पैसा मिला होगा। ऐसे कार्यक्रमों में पहुंचना भी भाग्य समझा जाता है। इन शिशुओं ने जरूर अपने पूर्व जन्म में कोई पुण्य किया होगा कि पैदा होते ही यह कार्यक्रम उनको मिल गया। बिना कहीं प्रशिक्षण लिये ही अभिनय करने का अवसर मिलना कोई आजकल के जमाने में आसान नहीं है। खासतौर से जब आपके माता पिता ने भी यह नहीं किया हो।’<br />
दीपक बापू की इस से आलोचक महाराज को इतना गुस्सा आया कि  दुःख अब हवा हो गया और इधर बिजली भी चली गयी। इसने उनका क्रोध अधिक बढ़ा दिया। वह दीपक बापू से बोले-‘रहना तुम ढेर के ही ढेर! यह पूर्व जन्म का किस्सा कहां से लाये। तुम्हें पता है कि अपने देश में बाल श्रम अपराध है।’<br />
दीपक बापू ने स्वीकृति में यह सोचकर हिलाया कि हो सकता है कि आलोचक महाराज की प्रसन्नता प्राप्त हो। फिर आलोचक महाराज ने कहा-‘अरे, इस पर कुछ लिखो। यह बाल श्रम कानून के हिसाब से  गलत है। इस पर कुछ जोरदार लिखो।’<br />
दीपक बापू बोले-महाराज, आपके अनेक शिष्य इस पर लिख रहे हैं। हमारे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा है।  यह शिशु, बालक, नवयुवक, युवक, अधेड़ और वृद्ध का संकट अलग अलग प्रस्तुत किया है जबकि हमें सभी का संकट एक दूसरे से जुड़ा दिखाई देता है।  फिर इसमें भी भेद है स्त्री और पुरुष का। हम यह विभाजन कर नहीं पाते।  हमने तो देखा है कि एक का संकट दूसरे का बनता ही है।  वैसे आपने कहा कि यह बालश्रम कानून के विरुद्ध है पर यह तो शिशु श्रम है। इस विषय पर आप अपने स्थाई शिष्यों से कहें तो वह अधिक प्रकाश डाल सकेंगे। वैसे तो शिशु रोते ही हैं हालांकि उनको इसमें श्रम होता है और इससे उनके अंग खुलते हैं।’<br />
आलोचक महाराज उनको घूरते हुए बोले-‘मतलब तुम्हारे हिसाब से यह ठीक हो रहा है। इस तरह बच्चों के रोने का दृश्य दिखाकर लोगों के हृदय विदीर्ण करना तुम्हें अच्छा लगता है।  यह बालश्रम की परिधि में नहीं आता! क्या तुम्हारा दिमाग है कि इसे स्वाभाविक शिशु श्रम कह रहे हो?’<br />
दीपक बापू बोले-‘महाराज, हमने कहां इसे जायज कहा? हम तो आपके शिष्यों के मुताबिक इसका एक विभाजन बता रहे हैं। हम तो कानून भी नहीं जानते इसलिये बालश्रम और शिशुश्रम में अंतर लग रहा है। वैसे माता पिता अपने बच्चे को इस तरह दूसरों को  देकर पैसा कमाते होंगे। हालांकि वह भद्र लोग हैं पर इतना तो कर ही सकते हैं कि पैसा मिलने पर बच्चा कुछ देर रोए तो क्या? वैसे आपको तो यह पता ही होगा कि इस देश में इतनी गरीबी है कि लोग अपना बच्चा बेच देते हैं। कई औरतें किराये पर कोख भी देती हैं।  यह अलग बता है कि ऐसे मामले पहले गरीबों में पाये जाते थे पर अब तो पैसे की खातिर पढ़े लिखे लोग भी यह करने लगे हैं। अरे, आप कहां इन वास्तविक धारावाहिकों की अवास्तविकताओं में फंस गये। आप तो हमारी कविता पढ़िये जो उमस और बरसात पर लिखी गयी हैं बिल्कुल आज ही!’<br />
आलोचक महाराज ने कागज हाथ में लिये और उसे फाड़ दिये फिर कहा-‘वैसे भी तुम श्रृंगार रस में कभी नहीं लिख पाते। जाओ, इस कथित शिशुश्रम पर कुछ लिखकर लाओ। और हां, हास्य व्यंग्य कविता मत लिख देना। इस पर बीभत्स रस की चाशनी में डुबोकर कुछ लिखना और मुझे पंसद आया तो उसे कहीं छपवा भी दूंगा।’<br />
दीपक बापू बोले-‘महाराज, आपके चेलों का असर आप पर भी हो गया है। यह तो गलत है कि आपके शिष्य बालश्रम, नारी अत्याचार, युवा बेरोजगारी पर लिखते हैं पर शिशु श्रम पर हम लिखें।’<br />
आलोचक महाराज ने घूरकर पूछा-यह बालश्रम और शिशुश्रम अलग अलग कब से हो गये?’<br />
दीपक बापू बोले-‘हमें पता नहीं! पर हां, आपके शिष्यों को पढ़ते पढ़ते हम कभी इस विभाजन की तरफ निकल ही आते हैं। लिखते इसलिये नहीं कि हमें लिखना नहीं आता। वैसे आप कह रहे हो तो लिखकर आते हैं।’<br />
दीपक बापू मिठाई का डिब्बा हाथ में वापस लेकर जाने लगे तो आलोचक महाराज बोले-‘यह मिठाई का डिब्बा वापस कहां लेकर जा रहे हो।’<br />
दीपक बापू बोले-‘अभी आपके कथानुसार दूसरी रचना लिखकर ला रहा हूं। तब यहां खाली हाथ आना अच्छा नहीं लगेगा। इसलिये साथ लेकर जा रहा हूं।’<br />
ऐसा कहते ही दीपक बापू कमरे से बाहर निकल गये क्योंकि उनको आशंका थी कि कहीं वह छीनकर वापस न लें। बाहर निकल कर वह इस बात से खुश हुए कि उनकी कवितायें सुरक्षित थी क्योंकि उनकी कार्बन कापी वह घर पर रख आये थे, वरना तो शिशुश्रम विषय पर उनके साथ ही मिठाई का डिब्बा भी भेंट चढ़ जाने वाला था। </b><br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong></p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
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		<title>द्युतक्रीड़ा से पूरा विश्व शिकार-हास्य व्यंग्य (jua ke shikar duniyan</title>
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		<pubDate>Mon, 05 Oct 2009 04:04:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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		<description><![CDATA[राजा नल ने जुआ खेली और उसमें हारने पर राज्य और परिवार त्यागकर वन में जाकर दूसरे की सेवा करनी पड़ी। अति सुंदर रुक्मी इंद्र जैसा बलशाली और महान धनुर्धर था पर जुए में खेलने के कारण ही बलराम जी के हाथ से मारा गया। कौशिक राजा मंदबुद्धि दंतवक्र जुए की सभा में बैठने के [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=rajlekh.wordpress.com&blog=880918&post=748&subd=rajlekh&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><b>राजा नल ने जुआ खेली और उसमें हारने पर राज्य और परिवार त्यागकर वन में जाकर दूसरे की सेवा करनी पड़ी। अति सुंदर रुक्मी इंद्र जैसा बलशाली और महान धनुर्धर था पर जुए में खेलने के कारण ही बलराम जी के हाथ से मारा गया। कौशिक राजा मंदबुद्धि दंतवक्र जुए की सभा में बैठने के कारण ही बलराम जी पर हंसने के कारण अपना दांत तुड़ा बैठा। धर्मराज युद्धिष्ठर ने भी हुआ खेला ओर उसके बाद जो उन्होंने और उनके परिवार ने कष्ट झेले उसे सभी जानते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि द्यूत या जुआ कभी भी फलदायी नहीं होता पर आदमी है कि उसके पीछे ही पड़ा रहता है। इधर आजकल तो लग रहा है कि लोगों को जुए का मतलब ही नहीं मालुम। टीवी चैनलों के धारावाहिक हों या दूसरे खेल सट्टे के आगोश में फंसे हैं पर लोग उसे मजे लेकर देख रहे हैं।<br />
जुआ या द्यूत यानि क्या? समझाना पड़ेगा वरना लगता नहीं कि लोग इसका मतलब अधिक जानते है। वरना लोग तो जुआ केवल ताश या पांसा खेलना ही समझते हैं। बहुत कम लोगों को मालुम होगा कि आज भी अनेक लोग यह खेल मुफ्त में खेलकर जीवन गुजार रहे हैं। जुआ का पूरा आशय जान लेंगे तो समझ में आयेगा कि आज तो पूरा वातावरण ही द्यूतमय हो रहा है। पहले तो कभी कभार ही जुए होते थे-वह भी बड़े लोगों के बीच- इसलिये इतिहास में दर्ज हो गये। दर्ज तो आज भी होते हैं पर जुए का स्वरूप सामने नहीं आता। कोई ताश मे हारा या पांसों में पता नहीं लगता। वैसे आज एक अंक का दूसरा क्रिकेट का सट्टा अधिक खेला जाता है। अनेक बार सुनने में आता है कि अमुक आदमी ने अपनी पत्नी को मारा, पिता को मारा या मां को मारा क्योंकि वह सट्टा खेलता था समाचार देने वाले चालाक हैं यह नहीं बताते कि वह कथित अपराधी क्रिकेट के पर सट्टा लगाकर बरबाद हुआ जिस कारण उसने यह जघन्य अपराध किया, क्योंकि इस खेल से भी उनको विज्ञापन और पैसा मिलता है फिर वह जिन नायकों के सहारे पैसा कमा रहे हैं उनकी खलनायकी कैसे दिखा सकते हैं </b></p>
<blockquote><p>
<span style="background-color:lime;color:magenta;">&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</span><br />
<span style="background-color:lime;color:magenta;">कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार</span><br />
<span style="background-color:lime;color:magenta;">अर्थ का नाश, धर्मक्रिया का लोप, कर्मों में अप्रवृत्ति,सत्पुरुषों के समागम से विरक्ति, दुष्टों के साथ उठना बैठना,</span><br />
<span style="background-color:lime;color:magenta;">हर समय क्रोध, हर्ष और संताप होना और क्लेख करना</span><br />
<span style="background-color:lime;color:magenta;">स्नानादि शरीर संस्कार और उसके भोग में अनादर, व्यायाम न करना, अंगों की दुर्बलता,शास्त्र के अर्थ को देखना</span><br />
<span style="background-color:lime;color:magenta;">मूत्रपूरीध के वेग को रोकना, भूख प्यास से अपने को ही पीड़ा देना </span><br />
<span style="background-color:lime;color:magenta;">यह सभी प्रमाण द्यूत या जुए के लक्षण हैं</span><br />
<span style="background-color:lime;">&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</span>.
</p></blockquote>
<p>पहले तो लोग भला नित प्रतिदिन अपने ग्रंथों का अध्ययन करते थे तब कुछ ज्ञान तो उनमें आ ही जाता था पर आज की पीढ़ी ने तो बस ग्रंथों के नाम ही सुने हैं बाकी तो उनके सामने हैं क्रिकेट या फिर टीवी चैनलों के वास्तविक शो जो किसी भी तरह से द्यूत जैसे नहीं दिखते पर उनसे कम नहीं हैं। इधर अंग्रेजी शिक्षा पद्धति और फिर बाद में वैसा ही रहन सहन जड़ बुद्धि ही बनाता है। कहने को तो अपने देश के बुद्धिजीवियों ने अच्छे अच्छे नारे गड़ रखे हैं पर पर आसमान में हवा की तरह उड़ते दिखते हैं जमीन पर उनका प्रभाव कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। समाज सुधारक बुद्धिजीवियों को आज के समय के ऐसे खेल जुए की तरह नहीं लगते जिनमें पैसा का व्यय हो रहा है। हो सकता है यह विज्ञापन या चंदे का परिणाम हो कि हमारे समाज सुधारकों के समूह की दृष्टि उन पर वैसी न जाती हो जैसे ताश या पांसे के जूए पर जाती है।<br />
जुए का आशय यही है कि किसी खेल में परिणाम पर धन का लेन देन उसके जुआ होने का प्रमाण है। कोई किसी भी प्रकार के खेल में हिस्सेदारी करे पर उसके परिणाम पर अगर धन का लेनदेन करता है तो वह द्यूतक्रीड़ा में लिप्त है। सीधी बात कहें तो खेल में धन खर्च करना या लेना द्यूतक्रीड़ा या जुआ है। जुआ खेलना ही नहीं देखना भी विषप्रद है। हम अपनी इंद्रियों से जो ग्रहण करते हैं वैसा ही बाहर अभिव्यक्त भी होते हैं। वह चाहे हाथों से ग्रहण करें या नाक, कान, या आंख से। अगर कोई जुआ खेल रहा है और हम देख रहे हैं तो यकीन मानिए उसका दुष्परिणाम हमें भी कहीं न कहीं भोगना है। याद रखिये हमारी घर गतिविध का हम पर मानसिक प्रभाव पड़ता है। अरे यार, यह उपदेश नहीं है। यह सच है। सोचो जब कहीं भयानक आवाज होती है हमारे कान फटते हैं कि नहीं। कहीं से निकल रहे हैं और बदबू नाक में प्रवेश करती है तो कैसा लगता है? वही हाल विचार का भी है। जुआ देखोगे तो विचारों में कलुषिता तो आयेगी तब हम भले ही जूआ न खेलें किसी अन्य रूप में अवश्य प्रकट होगी। क्रिकेट के सट्टे पर कितने लोग बरबाद हो चुके हैं कोई नहीं बता सकता।<br />
क्रिकेट का हाल तो सभी जानते हैं। एक प्रतियोगिता होती है उसमें कोई टीम बहुत अच्छा खेली। उसे ठीक अगली प्रतियोगिता में वह नाकाम होती है। विशेषज्ञ इसे इंगित कर आश्चर्य व्यक्त करते हैं। दूनियां भर की टीमों पर मैच को पूर्वनिर्धारित करने का आरोप लग चुका है। कोई सामान्य आदमी कह भी क्या सकता है जब इसी नये प्रकार के जुआ के बारे में उन्हीं प्रचार माध्यमों में आता है जो इसका प्रचार भी करते हुए विज्ञापन भी पाते हैं। अभी कुछ दिनों पहले टैनिस में भी ऐसी ही बातें आयीं थीं। फुटबाल पर भी संशय किया जाने लगा है। इन सबकी कभी पूरी सच्चाई सामने न आती है न आयेगी क्योंकि पूरा विश्व ही द्यूतमय हो रहा है। कई लोगों को तो यह पता ही नहीं कि जुआ होता क्या है?<br />
इधर टीवी चैनलों पर वास्वविक धारावाहिक प्रदर्शित होते हैं। कई लोग तो उन पर भी पूर्वनिर्धारित होने का आरोप लगाते हैं। लिपपुते चेहरे और आकर्षक दृश्यों की चकाचैंध हमारे कौटिल्य महाराज का यह संदेश नहीं बदल सकती कि द्यूत अनर्थकारी होता है। आप बताईये आखिर हर मैच पर सटोरिये पकड़ जा रहे हैं इसका मतलब यह है कि अभी भी इस पर दांव लगाने वाले बहुत लोग हैं। इधर टीवी चैनलों पर वास्तविक धारावाहिकों के प्रसारण में लोगों से फोन पर संदेश और वोट मांगा जाता है उस पर क्या उनके फोन पर पैसे नहीं खर्च करते। वह मुफ्त में तो नहीं होता। अब यह तो हो गया टीवी चैनल वालों का व्यवसाय पर मनोरंजन करने पर वह भी प्रतिस्पर्धियों के बीच निर्णय कराने के लिये पैसा खर्च करना द्यूत हुआ कि नहीं। कहने को तो हम फिल्म पर भी पैसा खर्च करते हैं पर वहां कोई प्रतिस्पर्धी नहीं होता। सीधा आशय यह है कि मनोरंजन के लिये खेल पर पैसा खर्च करना या लेना द्यूतमय है और देखें तो आज पूरा विश्व उसमे लिप्त हो रहा है। ताश से जुआ खेलने वाले पकड़े जाते हैं क्योंकि उनका अपराध दिखता है पर प्रतिस्पर्धा खेल में पर्दे के पीछे क्या हो रहा है कौन देखने जाता है।<br />
&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;&#8230;</p>
<blockquote><p>
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप</strong>
</p></blockquote>
<p><strong></strong></p>
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		<title>महात्मा गांधी जयती-विशेष हिंदी लेख (special hinti article on gandhi jayanti)</title>
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		<pubDate>Sun, 04 Oct 2009 10:27:22 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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		<description><![CDATA[महात्मा गांधी के दर्शन की प्रासंगिकता आज भी है। इसमें संदेह नहीं है। अगर कहें आज अधिक है तो भी कोई बुरा नहीं है। पूरे विश्व में महात्मा गांधी को अहिंसा के पुजारी के रूप में याद किया जाता है या कहें कराया जाता है पर उस पर चलना कौन चाहता है।
पूरे विश्व में हिंसा [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=rajlekh.wordpress.com&blog=880918&post=746&subd=rajlekh&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p>महात्मा गांधी के दर्शन की प्रासंगिकता आज भी है। इसमें संदेह नहीं है। अगर कहें आज अधिक है तो भी कोई बुरा नहीं है। पूरे विश्व में महात्मा गांधी को अहिंसा के पुजारी के रूप में याद किया जाता है या कहें कराया जाता है पर उस पर चलना कौन चाहता है।<br />
पूरे विश्व में हिंसा का दौर बढ़ता जा रहा और जितना यह बढ़ेगा उतनी ही बढ़ेगी गांधी जी की अहिंसा सिद्धांत की प्रासंगिकता। महात्मा गांधी ने भारत को आजादी दिलाई यह कहना कुछ अतिश्योक्ति मानते हैं तो कुछ लोग महात्मा गांधी को अप्रासंगिक सिद्ध करने के लिये हिंसा का समर्थन भी करते हैं। मगर यह दोनों ही प्रकार के लोग घूमते उसी आजादी के आंदोलन के घेरे में ही हैं जिसका शीर्षक महात्मा गांधी के नाम से लिखा जाता है।  इसी आंदोलन के कुछ नेताओं और शहीदों के नाम से कुछ अन्य लोग विचारधारायें चला रहे हैं। कहने का मतलब यह है कि वह भारत की आयु साठ वर्ष की ही मानते हैं और उनके लिये भारतीय भाषाओं और संस्कृति की आयु भी इतनी ही हैं। इतना ही नहीं भारतीय अध्यात्म ज्ञान तो उनके लिये पुराना पड़ चुका है और उसका अब कोई महत्व नहीं है।<br />
अगर सही आंकलन करें तो आज के समाज में गरीबी, भ्रष्टाचार, भय, और अपराध के विरुद्ध चलने वाले आंदोलनों को इसी अहिंसा के मार्ग पर चलना चाहिये क्योंकि महात्मा गांधी आज के लोकतांत्रिक समाज में राज्य का विरोध करने के लिये हिंसा के पुराने तरीके हिंसक तख्ता पलट की जगह इसे सही मानते थे।  आपने इतिहास में देखा होगा कि अनेक प्रकार के राजा जनता की नाराजगी के कारण हिंसा का शिकार हुए या उनका तख्ता पल्टा गया।  भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय का अवलोकन करें तो उस समय कार्लमाक्र्स का प्रभाव बढ़ रहा था और उसके चेले व्यवस्था का बदलाव हिंसा के सहारे कर रहे थे जबकि लगभग उसी समय महात्मा गांधी ने आंदोलनों को अहिंसा का मार्ग दिखाया। यही पश्चिम के गोरे लोग चाहते थे पर अंततः उनको भी यह देश छोड़ना पड़ा पर वह छोड़ते हुए इस देश में हिंसा का ऐसा इतिहास छोड़ गये जिससे आज तक यहां के निवासी  भुगत रहे है।<br />
मूल बात यही है कि महात्मा गांधी आधुनिक समाज के संघर्षों में हिंसक की बजाय अहिंसक आंदोलन के प्रणेता थे। उनकी याद भले ही सब करते हों पर हथियारों के पश्चिमी सौदागर और विचारों के पूर्वी विक्रेता उनसे खौफ खाते हैं। गनीमत है पश्चिम वाले एक दिन महात्मा को याद कर अपने पाप का प्रायश्चित करते हैं पर पूर्व के लोग तो हिंसावाद को ही समाज में परिवर्तन का मार्ग मानते हैं।  यहां यह भी बता दें कि महात्मा गांधी राज्य चलाने के किसी सिद्धांत के प्रवर्तक नहीं थे क्योंकि उसके लिये आपको सत्ता की राजनीति करनी पड़ती है जिसका आंदोलन की राजनीति से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं होता।  इसलिये ही सारी दुनियां की सरकारें महात्मा गांधी को याद करती है ताकि उनके विरुद्ध चलने वाले आंदोलन हिंसक न हों।<br />
यह देश हजारों वर्ष पुराना है।  भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान तो जीवन जीने की ऐसी कला सिखाता है कि पूर्व और पश्चिम दोनों ही उसे नहीं जानते पर अपने ही देश के लोग उसे भूल रहे हैं। दक्षिण एशिया जहां एक नहीं बल्कि तीन तीन अहिंसा के पूजारी और प्रवर्तक हुए वहां हिंसा का ऐसा बोलबाला है जिसकी चर्चा पूरे विश्व में हैं। पाकिस्तान के कबाइली इलाके हों या हमारे पूर्वी हिस्से। धार्मिक और राजनीतिक क्रूर सिद्धांतों की जकड़ में हैं। एक बात यकीनी तौर से मानिए कि आज के संदर्भ में कोई भी आंदोलन गरीबों और शोषकों के नाम पर सफल होता है पर किसी का भला हो यह नहीं दिखता। हकीकत तो यह है कि इन आंदोलनों को पैसा भी मिलता है। अब यह पैसा कौन देता है यह अलग से चर्चा का विषय है। इसी पैसे के लिये व्यसायिक आंदोलनकारी किसी विचाराधारा या नारे को गढ़ लेते हैं।  अगर वह हिंसा का समर्थन न करें तो शायद उनको वह पैसा न मिले। साफ बात कहें तो इन हिंसक आंदोलनों की आड़ में पैसा देने वाले कुछ न कुछ आर्थिक लाभ उठाते हैं।  ऐसे में उनके लिये गांधी  का अहिंसा सिद्धांत का धोखे की टट्टी है।  तब भी वह अधिक दूर नहीं जाते। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान शहीद हुए गरमपंथी महापुरुषों की तस्वीरें लगाकर उनका प्रचार करते हैं। साथ ही गांधी जी की आलोचना करने से उनको कोई गुरेज नहीं है।<br />
सबसे बड़ी बात यह है कि इस देश का इतिहास साठ साल पुराना नहीं है। अब एक दूसरी बात यह है कि हम आजादी की बात करते हैं पर आज जब उस आजादी पर चर्चा होती है तो अनेक प्रकार के सवाल भी आते हैं। आखिर गांधी जी किससे आजादी चाहते थे? केवल गोरी चमड़ी से या उनके राज्य से।  याद रखिये आज भी इस देश में अंग्रेजों के बनाये हुए कानून चल रहे हैं। इनमें से तो कई ऐसे हैं जो इस समाज को निंयत्रित करने के लिये यहीं के लोगों ने उनको सुझाये होंगे। इनमें एक वैश्यावृत्ति कानून भी है जिसे लोग हटाने की मांग करते हैं। दूसरा जूआ का भी कानून है। कुछ लोग कहते हैं कि यह रोकना सरकार का काम नहीं है बल्कि यह समाज का स्वयं का दायित्व है।  कहने का मतलब है कि लोग यही मानते हैं कि समाज स्वयं पर नियंत्रण करे न करे तो वही दायी है। जो आदमी व्यसन या बुरा काम करता है तो अपनी हानि करता हैै। हां जहां वह दूसरे की हानि करता है तो बहुत सारे कानून है जो लगाये जा सकते हैं।    लोग तो सतीप्रथा वाले कानून पर सवाल उठाते हैं और पूछते हैं कि उस समय या उससे पहले कितनी स्त्रियां इस देश में सती होती थीं। जिनको होना है तो अब भी इक्का दुक्का तो अब भी घटनायें होती है।  वैसे ही अगर किसी स्त्री को जबरन सती कर दिया जाता है तो हत्या का अपराध या वह स्वयं होने के लिये तत्पर होती है तो आत्महत्या का कानून उस पर लग सकता है तब सती प्रथा रोकने के लिये अलग से कानून की  जरूरत क्या थी?<br />
सीधा मतलब यह है कि अंग्रेज चले गये पर अंग्रेजियत छोड़ गये। वह भी इसलिये कि महात्मा गांधी यहां प्रासगिक नहीं रहें।  वैसे भी अपने देश में उनको किस प्रसंग में याद किया जाये? हां, इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज के युग में अपनी अभिव्यक्ति या आंदोलन के लिये उनका सिद्धांत अति प्रासंगिक हैं। उनको इसलिये नमन करने का मन करता है।<br />
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		<title>भर्तृहरि नीति शतक-पैसा खत्म होने पर आदमी में जोश नहीं रहता (heat in money-hindi massege)</title>
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		<pubDate>Sat, 03 Oct 2009 05:03:56 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दीपक भारतदीप</dc:creator>
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तानींद्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव।
अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः क्षपोन सोऽष्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत्।।
हिंदी में भावार्थ-मनुष्य की इंद्रिया नाम,बुद्धि तथा अन्य सभी गुण वही होते हैं पर धन की उष्मा से रहित हो जाने पर पुरुष क्षणमात्र में क्या रह जाता है? धन की महिमा विचित्र है।
वर्तमान&#160;सन्दर्भ&#160;&#160;में संपादकीय व्याख्या- इस सृष्टि [...]<img alt="" border="0" src="http://stats.wordpress.com/b.gif?host=rajlekh.wordpress.com&blog=880918&post=744&subd=rajlekh&ref=&feed=1" />]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class='snap_preview'><br /><p><strong><strong>भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि&nbsp;</strong></strong><br />
<strong>&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</strong></p>
<p><strong><strong>तानींद्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव।<br />
अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः क्षपोन सोऽष्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत्।।</strong></strong></p>
<p><strong>हिंदी में भावार्थ-</strong>मनुष्य की इंद्रिया नाम,बुद्धि तथा अन्य सभी गुण वही होते हैं पर धन की उष्मा से रहित हो जाने पर पुरुष क्षणमात्र में क्या रह जाता है? धन की महिमा विचित्र है।<br />
<strong><strong>वर्तमान&nbsp;सन्दर्भ&nbsp;&nbsp;में संपादकीय व्याख्या-</strong></strong> इस सृष्टि को परमात्मा ने बनाया है पर माया की भी अपनी लीला है जिस पर शायद किसी का भी बस नहीं है। माया या धन के पीछे सामान्य मनुष्य हमेशा पड़ा रहता है। चाहे कितना भी किसी के पास आध्यत्मिक ज्ञान या कोई दूसरा कौशल हो पर पंच तत्वों से बनी इस देह को पालने के लिये रोटी कपड़ा और मकान की आवश्यकता होती है। अब तो वैसे ही वस्तु विनिमय का समय नहीं रहा। सारा लेनदेन धन के रूप में ही होता है इसलिये साधु हो या गृहस्थ दोनों को ही धन तो चाहिये वरना किसी का काम नहीं चल सकता। हालांकि आदमी का गुणों की वजह से सम्मान होता है पर तब तक ही जब तक वह किसी से उसकी कीमत नहीं मांगता। वह सम्मान भी उसको तब तक ही मिलता है जब तक उसके पास अपनी रोजी रोटी होती है वरना अगर वह किसी से अपना पेट भरने के लिये धन भिक्षा या उधार के रूप में मांगे तो फिर वह समाप्त हो जाता है।<br />
वैसे भी सामान्य लोग धनी आदमी का ही सम्मान करते है। कुछ धनी लोगों को यह भ्रम हो जाता है कि वह अपने गुणों की वजह से पुज रहे हैं। इसी चक्कर में कुछ लोग दान और धर्म का दिखावा भी करते हैं। अगर धनी आदमी हो तो उसकी कला,लेखन तथा आध्यात्मिक ज्ञान-भले ही वह केवल सुनाने के लिये हो-की प्रशंसा सभी करते हैं। मगर जैसे ही उनके पास से धन चला जाये उनका सम्मान खत्म होते होते क्षीण हो जाता है। </p>
<p>इसके बावजूद यह नहीं समझना चाहिये कि धन ही सभी कुछ है। अगर अपने पास धन अल्प मात्रा में है तो अपने अंदर कुंठा नहीं पालना चाहिये। बस मन में शांति होना चाहिये। दूसरे लोगों का समाज में सम्मान देखकर अपने अंदर कोई कुंठा नहीं पालना चाहिये। यह स्वीकार करना चाहिये कि यह धन की महिमा है कि दूसरे को सम्मान मिल रहा है उसके गुणों के कारण नहीं। इसलिये अपने गुणों का संरक्षण करना चाहिये। वैसे यह सच है कि धन का कोई महत्व नहीं है पर वह इंसान में आत्मविश्वास बनाये रखने वाला एक बहुत बड़ा स्त्रोत है। सच<br />
&nbsp;तो यह है कि खेलती माया है हम सोचते हैं कि हम खेल रहे हैं।<br />
&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;&nbsp;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8211;</p>
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप </strong>
</p></blockquote>
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