Author Archives: दीपक भारतदीप

मेरा परिचय
प्रात: योग साधना करना एव गीता का पाठ करना। इसके अलावा लेखन के द्वारा मित्र बनाना । अर्थाजन में अधिक रूचि नहीं । मेरी मान्यता है कि आदमी की देह शाश्वत नहीं है पर जीवन शाश्वत है,लिखने के साथ उसका मजा भी लेता हूँ। देश के अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन। इन्टरनेट पर पिछले साल ही लिखना शुरू किया। ग्वालियर में निवास है
इसके अलावा मेरे दूसरे ब्लोग की सूची मुख्य पृष्ठ पर अंकित है।
दीपक भारतदीप, ग्वालियर मेरे दूसरे ब्लोग की सूची मुख्य पृष्ठ पर अंकित है।
दीपक भारतदीप, ग्वालियर

प्रजातंत्र में ब्लॉग की महत्वपूर्ण भूमिका-हिंदी लेख (democracy and hindi blog-hindi article)

भारत में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या सात करोड़ से ऊपर है-इसका सही अनुमान कोई नहीं दे रहा। कई लोग इसे साढ़े बारह करोड़ बताते हैं। इन प्रयोक्ताओं को यह अनुमान नहीं है कि उनके पास एक बहुत बड़ा अस्त्र है जो उनके पास अपने अनुसार समाज बनाने और चलाने की शक्ति प्रदान करता है-बशर्ते उसके [...]

समाज को नकली नायकों के महिमा मंडन बचना होगा-चिंत्तन आलेख (nakali naykon ka mahim mandan-hindi lekh)

भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान में व्यक्ति को सदैव सकारात्मक सोच की प्रेरणा दी जाती है। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि मनुष्य का मन उसे अपने सुख सुविधायें पाने के लिये हमेशा विचलित किये रहता है। ऐसे में मनुष्य या तो दिमागी रूप से आलसी होकर रह जाता है या फिर उसके अंदर नकारात्मक [...]

मनुष्य बनाने की जरुरत-चिंतन आलेख (charitra aur manushya-chintan alekh)

ऐसा नहीं लगता कि निकट भविष्य में जाति पाति, धर्म, भाषा, और क्षेत्र के आधार पर बने समूहों के आपसी विवाद कोई थम जायेंगें। सच बात तो यह है कि पहले की अपेक्षा यह विवाद बढे़ हैं और इसमें कमी की आशा करना ही व्यर्थ है। समस्या यह है कि लोग देश, समाज, और [...]

दूसरी किताब-हास्य व्यंग्य (doosri kitab- hindi hasya vyangya)

बुद्धिजीवियों का सम्मेलन हो रहा था। अनेक प्रकार के बुद्धिजीवियों को उसमें आमंत्रण दिया गया। यह सम्मेलन एक ऐसे बुद्धिजीवी की देखरेख में हो रहा था जिन्होंने तमाम तरह की किताबें लिखी और जिनको अकादमिक संगठनों के पुस्तकालय खरीदकर अपने यहां सजाते रहे। आम लोग उनका नाम समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी [...]

अन्न की तरह धन पचने का भी मंत्र हो तो अच्छा-हिंदी हास्य व्यंग्य (hasya vyangya in hindi)

उस दिन एक संत को हमने पेट में अन्न पचाने का मंत्र बताते हुए सुना। वह सुबह, दोपहर और रात को भोजन करने से पहले और बाद में जाप किये जाने मंत्र बता रहे थे। हम भी बैठे प्रवचन सुन रहे थे। उसी समय हमारे दिमाग में एक प्रश्न आया कि ‘क्या धन कमाने [...]

गुलाम कर रहे राज़-त्रिपदम (gulam kar rahe raj-tripadam)

गुलाम राज
कर रहे हैं यहां
गुलाम पर।
कोई छोटा है
कोई उससे बड़ा
यूं नाम भर।
हुक्म चले
नहीं पहुंचता है
मुकाम पर।
कागजी नाव
तैरती दिखती है
यूं काम पर।
बड़ा इलाज
महंगा मिलता है
जुकाम पर।
खोई जिंदगी
ढूंढ रहे हैं
लोग दुकान पर।
दर्द पराया
सस्ता बतलाते
जुबान पर।
शिक्षा के नाम
पट्टा बंध रहा है
गुलाम पर।
जड़ शब्द
कैसे तीर बनेंगे
कमान पर।
आजादी नारा
मूर्ति जैसे टांगे हैं
गुलाम घर।
जो खुद बंधे
आशा कैसे टिकायें
गुलाम पर।
—————————
कवि,लेखक और [...]

असली नकली पुरस्कार-हिंदी हास्य व्यंग्य (hindi comedy satire on prize)

समाज सेवाध्यक्ष जी ने अपनी बाहें टेबल पर टिकाई अपना मूंह हथेलियों पर रखने को बाद अपने सात सभासदों की उपस्थिति देखकर गिनती की। आठवां सदस्य सचिव लेखपालक गायब था। उन्होंने कहा‘-यह सचिव लेखपालक हमेशा ही देर से आता है। सारा हिसाब किताब उसके पास है और उसके बिना यहां चर्चा नहीं हो सकती।’
सामने बैठे [...]

तुम वह समंदर बनना-हिंदी कविता (tum samandar banna-hindi kavita)

सारे जहां की प्यास मिटा सको
तुम वह समंदर बनना.
भेजे जो आकाश में पानी भरकर मेघ
जहां लोग पानी को तरसे
वहीँ समन्दर से लाया अमृत बरसे
अपने किये का नाम कभी न करना.
गंगा पवित्र नदी कहलाती है,
पर अपने किनारे की ही प्यास बुझाती है,
देवी की तरह पुजती पर
लाशों से मैली भी की जाती है,
जब तक समन्दर तक पहुँचती
तब [...]

सब दिया उसने फिर भी हाथ फैलाते-व्यंग्य कविता

सर्वशक्तिमान के दरबार में
क्यों जाकर भीड़ लगाते हो,
जिसने दिए काम करने को हाथ
उसी के सामने कुछ मांगने के लिए
क्यों फैलाते हो.
जिसने दिए चलने के लिए पाँव
क्यों लौटकर जाते हो फिर  उसके गाँव,
उसने दुनियाँ   देखने के लिए दी है आँखें
टकटकी लगाए उसी की तरह क्यों देखते हो
जैसे  कैद किये हों तुम्हें सलाखें,
विचार करने के लिए दिया है [...]

हिंदी अध्यात्म सन्देश-बुरे काम से दूर होकर ही अच्छाई समझना संभव (hindu adhyatm sandesh)

अर्थसिद्धि परामिच्छन् धर्ममेवादितश्चरेत्।
न हि धर्मदपैत्यर्थः स्वर्गलोकादिवामृतम्।।
हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद विदुर कहते हैं कि जिस मनुष्य के हृदय में अर्थ प्राप्त करने की इच्छा है उसे धर्म का दृढ़तापूर्वक पालन करना चाहिए। जिस तरह स्वर्ग से अमृत दूर नहीं होता उसी प्रकार धर्म से अर्थ को अलग नहीं किया जा सकता।
यस्यात्मा विरतः पापाद कल्याणे च [...]

शयों का रोज शक्ल बदलना-हिन्दी व्यंग्य कविता (shayon ka roop-vyangya kavita)

जरुरतों की शयों का रोज शक्ल बदलना
दौलत के पहाड़ पर
इंसानों की चाहतों का चढ़ना
तरक्की का यह पैमाना नहीं होता।
इंसानों के जज़्बातों की उम्र
समय के साथ न बदलती हो
ख्यालों का चैहरा भी
हालातों के साथ नया नज़र न आये
तब यह तरक्की एक वहम होती है
चलती दुनियां तो दिखती
पर जमाना वहीं का वहीं होता है।
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घर में [...]

नये जमाने में-हिन्दी शायरी

एक दोस्त ने फोन पर
दूसरे दोस्त से
‘क्या स्कोर चल रहा है
दूसरा बिना समझे तत्काल बोला
‘यार, ऐसा लगता है
मेरी जेब से आज फिर
दस हजार रुपया निकल रहा है।’
……………………………..
इंसान के जज्ब़ात शर्त से
और समाज के सट्टे के भाव से
समझे जाते हैं।
नये जमाने में
जज़्बात एक शय है
जो खेल में होता बाल
व्यापार में तौल का माल
नासमझी बन गयी [...]

कल्पना के महानायक-आलेख (kalpana ke nayak-hindi alekh)

किसी फिल्म अभिनेता को जब सदी का महानायक कहा जाता है तब उसके प्रशंसकों को बहुत अच्छा लगता है पर अगर थोड़ा चिंतन किया जाये तब इस बात का अहसास होता है कि वह एक काल्पनिक पात्र है। यह ठीक है कि फिल्म अभिनेता बनने का सपना वह हर युवक देखता है जिसका [...]

महात्मा गांधी नोबल नहीं वरन् ग्लोबल थे-आलेख (mahatma gandhi and noble

नोबल पुरस्कार देने वालों ने वाकई हास्यास्पद स्थिति का निर्माण किया है। उन्होंने अमेरिका के कट्टर विरोधियों को बहुत कुछ आरोप लगाने का अवसर दिया है जो इस अवसर का खूब उपयोग कर रहे हैं। अमेरिका के कट्टर से कट्टर समर्थक भी [...]

नोबल और ग्लोबल-व्यंग्य आलेख (noble and global-hindi satire)

अमेरिका के राष्ट्रपति श्री बराक ओबामा को शांति के लिये नोबल पुरस्कार मिलने पर स्वयं उनको ही बहुत बड़ा अचरज हुआ है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ओबामा निहायत सज्जन, विचारवान और सहज प्रवृत्ति के इंसान हैं और एक आम आदमी से राष्ट्रपति पद पर पहुंचने की उनकी यात्रा एक जीवंत कहानी [...]

चाणक्य दर्शन-धर्म परिवर्तन करने से मनुष्य बाद में दु:खी हो जाता है(hindi sandesh-dharm parivaratan anuchit-chankya niti

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं
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आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः।
स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः।।
हिन्दी में भावार्थ कि अपना समूह,समुदाय वर्ग या धर्म त्याग कर दूसरे का सहारा लेने वाले राजा का नाश हो जाता है वैसे ही जो मनुष्य अपने समुदाय या धर्म त्यागकर दूसरे का आसरा लेता है वह भी जल्दी नष्ट हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ [...]

शिशुओं का क्रीड़ाश्रम और मिठाई-हिन्दीहास्य व्यंग (child story and sweats-hindi vyanga

सुबह दीपक बापू सड़कों पर पानी से भरे गड्ढों में गिरने से बचते हुए जल्दी जल्दी ही आलोचक महाराज के घर पहुंचे। उस दिन बरसात होने से उनको आशा थी कि आलोचक महाराज प्रसन्न मुद्रा में होंगे। इधर उमस के मारे सभी परेशान थे तो आलोचक महाराज भी भला कहां बच सकते थे। ऐसे [...]

द्युतक्रीड़ा से पूरा विश्व शिकार-हास्य व्यंग्य (jua ke shikar duniyan

राजा नल ने जुआ खेली और उसमें हारने पर राज्य और परिवार त्यागकर वन में जाकर दूसरे की सेवा करनी पड़ी। अति सुंदर रुक्मी इंद्र जैसा बलशाली और महान धनुर्धर था पर जुए में खेलने के कारण ही बलराम जी के हाथ से मारा गया। कौशिक राजा मंदबुद्धि दंतवक्र जुए की सभा में बैठने के [...]

महात्मा गांधी जयती-विशेष हिंदी लेख (special hinti article on gandhi jayanti)

महात्मा गांधी के दर्शन की प्रासंगिकता आज भी है। इसमें संदेह नहीं है। अगर कहें आज अधिक है तो भी कोई बुरा नहीं है। पूरे विश्व में महात्मा गांधी को अहिंसा के पुजारी के रूप में याद किया जाता है या कहें कराया जाता है पर उस पर चलना कौन चाहता है।
पूरे विश्व में हिंसा [...]

भर्तृहरि नीति शतक-पैसा खत्म होने पर आदमी में जोश नहीं रहता (heat in money-hindi massege)

भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि 
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तानींद्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिरप्रतिहता वचनं तदेव।
अर्थोष्मणा विरहितः पुरुषः क्षपोन सोऽष्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत्।।
हिंदी में भावार्थ-मनुष्य की इंद्रिया नाम,बुद्धि तथा अन्य सभी गुण वही होते हैं पर धन की उष्मा से रहित हो जाने पर पुरुष क्षणमात्र में क्या रह जाता है? धन की महिमा विचित्र है।
वर्तमान सन्दर्भ  में संपादकीय व्याख्या- इस सृष्टि [...]