कन्या भ्रुण हत्या से मध्ययुगीन स्थिति की तरफ बढ़ता समाज-हिन्दी लेख (kanya bhrun hatya aur madhya yugin samaj-hindi lekh


              हो सकता है कि कुछ लोग हमारी बुद्धि पर ही संशय करें, पर इतना तय है कि जब देश के बुद्धिजीवी किसी समस्या को लेकर चीखते हैं तब उसे हम समस्या नहीं बल्कि समस्याओं या सामाजिक विकारों का परिणाम मानते हैं। टीवी और समाचार पत्रों के समाचारों में लड़कियों के विरुद्ध अपराधों की बाढ़ आ गयी है और कुछ बुद्धिमान लोग इसे समस्या मानकर इसे रोकने के लिये सरकार की नाकामी मानकर हो हल्ला मचाते हैं। उन लोगों से हमारी बहस की गुंजायश यूं भी कम हो जाती हैं क्योंकि हम तो इसे कन्या भ्रुण हत्या के फैशन के चलते समाज में लिंग असंतुलन की समस्या से उपजा परिणाम मानते है। लड़की की एकतरफ प्यार में हत्या हो या बलात्कार कर उसे तबाह करने की घटना, समाज में लड़कियों की खतरनाक होती जा रही स्थिति को दर्शाती हैं। इस पर चिंता करने वाले कन्या भ्रूण हत्या के परिणामों को अनदेखा करते हैं।
        इस देश में गर्भ में कन्या की हत्या करने का फैशन करीब बीस-तीस साल पुराना हो गया है। यह सिलसिला तब प्रारंभ हुआ जब देश के गर्भ में भ्रुण की पहचान कर सकने वाली ‘अल्ट्रासाउंड मशीन’ का चिकित्सकीय उपयोग प्रारंभ हुआ। दरअसल पश्चिम के वैज्ञानिकों ने इसका अविष्कार गर्भ में पल रहे बच्चे तथा अन्य लोगों पेट के दोषों की पहचान कर उसका इलाज करने की नीयत से किया था। भारत के भी निजी चिकित्सकालयों में भी यही उद्देश्य कहते हुए इस मशीन की स्थापना की गयी। यह बुरा नहीं था पर जिस तरह इसका दुरुपयोग गर्भ में बच्चे का लिंग परीक्षण कराकर कन्या भ्रुण हत्या का फैशन प्रारंभ हुआ उसने समाज में लिंग अनुपात की  स्थिति को बहुत बिगाड़ दिया। फैशन शब्द से शायद कुछ लोगों को आपत्ति हो पर सच यह है कि हम अपने धर्म और संस्कृति में माता, पिता तथा संतानों के मधुर रिश्तों की बात भले ही करें पर कहीं न कहीं भौतिक तथा सामाजिक आवश्यकताओं की वजह से उनमें जो कृत्रिमता है उसे भी देखा जाना चाहिए। अनेक ज्ञानी लोग तो अपने समाज के बारे में साफ कहते हैं कि लोग अपने बच्चों को हथियार की तरह उपयोग करना चाहते हैं जैसे कि स्वयं अपने माता पिता के हाथों हुए। मतलब दैहिक रिश्तों में धर्म या संस्कृति का तत्व देखना अपने आपको धोखा देना है। जिन लोगों को इसमें आपत्ति हो वह पहले कन्या भ्रुण हत्या के लिये तर्कसंगत विचार प्रस्तुत करते हुए उस उचित ठहरायें वरना यह स्वीकार करें कि कहीं न कहीं अपने समाज के लेकर हम आत्ममुग्धता की स्थिति में जी रहे हैं।
           जब कन्या भ्रुण हत्या का फैशन की शुरुआत हुई तब समाज के विशेषज्ञों ने चेताया था कि अंततः यह नारी के प्रति अपराध बढ़ाने वाला साबित होगा क्योंकि समाज में लड़कियों की संख्या कम हो जायेगी तो उनके दावेदार लड़कों की संख्या अधिक होगी नतीजे में न केवल लड़कियों के प्रति बल्कि लड़कों में आपसी विवाद में हिंसा होगी। इस चेतावनी की अनदेखी की गयी। दरअसल हमारे देश में व्याप्त दहेज प्रथा की वजह से लोग परेशान रहे हैं। कुछ आम लोग तो बड़े आशावादी ढंग से कह रहे थे कि ‘लड़कियों की संख्या कम होगी तो दहेज प्रथा स्वतः समाप्त हो जायेगी।’
                  कुछ लोगों के यहां पहले लड़की हुई तो वह यह सोचकर बेफिक्र हो गये कि कोई बात नहीं तब तक कन्या भ्रुण हत्या की वजह से दहेज प्रथा कम हो जायेगी। अलबत्ता वही दूसरे गर्भ में परीक्षण के दौरान लड़की होने का पता चलता तो उसे नष्ट करा देते थे। कथित सभ्य तथा मध्यम वर्गीय समाज में कितनी कन्या भ्रुण हत्यायें हुईं इसकी कोई जानकारी नहीं दे सकता। सब दंपतियों के बारे में तो यह बात नहीं कहा जाना चाहिए पर जिनको पहली संतान के रूप में लड़की है और दूसरी के रूप में लड़का और दोनों के जन्म के बीच अंतर अधिक है तो समझ लीजिये कि कहीं न कहंी कन्या भ्रुण हत्या हुई है-ऐसा एक सामाजिक विशेषज्ञ ने अपने लेख में लिखा था। अब तो कई लड़किया जवान भी हो गयी होंगी जो पहली संतान के रूप में उस दौर में जन्मी थी जब कन्या भ्रुण हत्या के चलते दहेज प्रथा कम होने की आशा की जा रही थी। मतलब यह कि यह पच्चीस से तीस साल पूर्व से प्रारंभ  सिलसिला है और दहेज प्रथा खत्म होने का नाम नहीं ले रही। हम दहेज प्रथा समाप्ति की आशा भी कुछ इस तरह कर रहे थे कि शादी का संस्कार बाज़ार के नियम पर आधारित है यानि धर्म और संस्कार की बात एक दिखावे के लिये करते हैं। अगर लड़कियां कम होंगी तो अपने आप यह प्रथा कम हो जायेगी, पर यह हुआ नहीं।
            इसका कारण यह है कि देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ी है। मध्यम वर्ग के लोग अब निम्न मध्यम वर्ग में और निम्न मध्यम वर्ग के गरीब वर्ग में आ गये हैं पर सच कोई स्वीकार नहीं कर रहा। इस कारण लड़कों से रोजगार के अवसरों में भी आकर्षण शब्द गायब हो गया है। लड़कियों के लिये वर ढूंढना इसलिये भी कठिन है क्योंकि रोजगार के आकर्षक स्तर में कमी आई है। अपनी बेटी के लिये आकर्षक जीवन की तलाश करते पिता को अब भी भारी दहेज प्रथा में कोई राहत नहीं है। उल्टे शराब, अश्लील नृत्य तथा विवाहों में बिना मतलब के व्यय ने लड़कियों की शादी कराना एक मुसीबत बना दिया है। इसलिये योग्य वर और वधु का मेल कराना मुश्किल हो रहा है।
           फिर पहले किसी क्षेत्र में लड़कियां अधिक होती थी तो दीवाने लड़के एक नहीं  तो दूसरी को देखकर दिल बहला लेते थे। दूसरी नहीं तो तीसरी भी चल जाती। अब स्थिति यह है कि एक लड़की है तो दूसरी दिखती नहीं, सो मनचले और दीवाने लड़कों की नज़र उस पर लगी रहती है और कभी न कभी सब्र का बांध टूट जाता है और पुरुषत्व का अहंकार उनको हिंसक बना देता है। लड़कियों के प्रति बढ़ते अपराध कानून व्यवस्था या सरकार की नाकामी मानना एक सुविधाजनक स्थिति है और समाज के अपराध को दरकिनार करना एक गंभीर बहस से बचने का सरल उपाय भी है।

हम जब स्त्री को अपने परिवार के पुरुष सदस्य से संरक्षित होकर राह पर चलने की बात करते हैं तो नारीवादी बुद्धिमान लोग उखड़ जाते हैं। उनको लगता है कि अकेली घूमना नारी का जन्मसिद्ध अधिकार है और राज्य व्यवस्था उसको हर कदम पर सुरक्षा दे तो यह एक काल्पनिक स्वर्ग की स्थिति है। यह नारीवादी बुद्धिमान नारियों पर हमले होने पर रो सकते हैं पर समाज का सच वह नहीं देखना चाहते। हकीकत यह है कि समाज अब नारियों के मामले में मध्ययुगीन स्थिति में पहुंच रहा है। हम भी चुप नहीं  बैठ सकते क्योंकि जब नारियों के प्रति अपराध होता है तो मन द्रवित हो उठता है और लगता है कि समाज अपना अस्तित्व खोने को आतुर है।

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कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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टिप्पणियाँ

    • neha  On अगस्त 1, 2012 at 8:19 अपराह्न

      what have you written.i can’t understand your concept.

      • neha  On अगस्त 1, 2012 at 8:23 अपराह्न

        it”s a very exellent ,inspiring blog .girl’s are best from boys.

      • pihudhupia  On सितम्बर 23, 2012 at 9:57 पूर्वाह्न

        what have you written. i can’t understand your concept.

  • Gaikwad Dipali  On दिसम्बर 22, 2011 at 4:13 अपराह्न

    its really nice.writer told us real condition of girl &misunderstanding of peoples.i like it very muchhhh……i am proud to be a girl.GIRL can do everthing.

  • aayush kumawat  On जनवरी 13, 2012 at 8:15 अपराह्न

    this is a inspiring and motivaing blog

  • harish  On जनवरी 19, 2012 at 5:45 पूर्वाह्न

    i like very much.

  • shobha jha  On जनवरी 29, 2012 at 4:25 अपराह्न

    Dipak g apke lekh se kaphi jankari mili.mai social activies hu. kanya bhrun hatya par logo k bich kaphi awareness program ki lekin meri anubhav nikala ki kanya bhrun hatya middle aur upper class me jyada hoti hai. log bebajah gramin logo ko badnam karte hai.

  • Bhupendra  On फ़रवरी 22, 2012 at 1:42 पूर्वाह्न

    Aapki Yeh Abhivyakti Samaj Mai JAGRUKTA Lane ke liye Upyogi hai.

  • keerti  On मई 10, 2012 at 10:49 पूर्वाह्न

    jo kanyayen hai nahi unki hatya ko rokne ke liye hangama kia ja raha hai!!!!!!!!!!!!
    jo astitva me hai unki suraksha, unko bachane ke liye kya nahi sochana chahiye ???

    daily rape, revenge me murder, dahej ke liye na jane kitani kanyaye/mahilayen mari jati hai tab kyo nahi koi unke parents ke liye aage aata hai………..

    aise parivesh me kaun mata-pita chahege ki unke ghar me bacchi aaye……………moreover……women ko hi beta na hone ke liye pratadit kia jata hai…tab sabhi kyo soye rahte hai………us samai kyo nahi koi bolta hai………….mother ke liye beta-beti dono hi ek saman hote hai isliye ma ko dosh nahi dena chahiye………….

    Anathalayo me rah rahi chhoti-2 bachhiyon ka shoshan hota hai tab sare samaj sudharak kaha chale jate hai……………..

    sachmuch kanyaye bachana hai to jo live hai unko bachao pahle, unki suraksha kro. nahi to kanya bhrun hatya ko rokne ke nam par sab natak band kar dena chahiye

  • Dev gadade  On जून 27, 2012 at 8:37 अपराह्न

    Stri brun hatya rokni jaruri hai qki stri ko dhoka ho saktahay.
    Stri brun hatya rokna apna farz hai ……….!
    Jai maharashtra

  • suman  On अगस्त 21, 2012 at 7:25 अपराह्न

    mai kirti ji ki baat se poori tarah sahmat hoo aise samaz me laa kar apni beti ko jeevan bhar dookhi koi mata pita nhi dekhna chahenge jab tak stree ko smanta ka darja srmaz nhi dega bhroon hatya nhi roki ja sakti

  • deep rawat  On सितम्बर 17, 2012 at 10:52 पूर्वाह्न

    mujhe lagta hai hai aaj k time me ladko se jyada ladki ka hona acha hai ladka shadi k baad ma baap ko chud k alag rahne lagta hai or ladki shadi k baad alag rahti to hai par apne se jyada apne ma baap k liye sochti hai ,,

  • Bini Jain  On नवम्बर 19, 2012 at 9:22 अपराह्न

    purane zamane me log ladako ka janam lena shub maante the but ab longo ko pata chal gaya hai ki ladakiya bhi ladakon se kam nai hai

  • devi  On दिसम्बर 20, 2012 at 1:32 अपराह्न

    kashi sewa sadan samity beti baccho abhiyan 2012-2017
    chandauli

  • deepti nair  On दिसम्बर 25, 2012 at 2:39 अपराह्न

    yaaa…its true,corect,,,we should take acton,,on this…

  • ishu sood  On जनवरी 2, 2013 at 4:04 अपराह्न

    i am nt fully agree with the matter…. thr is 10 and half yr gap in my both child and my second child is son it does tn mean that i aborted my child

  • sonu chhaparwal  On जनवरी 17, 2013 at 11:56 अपराह्न

    i like it kash ki puri bhart ko ye samajme aaye

  • devi prasad sharma  On फ़रवरी 19, 2013 at 6:59 पूर्वाह्न

    kashi samity

  • Dhammaraj  On मार्च 12, 2013 at 7:18 अपराह्न

    verry nice speech…
    beacause women clear concept of doing clear.

  • avinash  On मार्च 21, 2013 at 8:36 अपराह्न

    भ्रुण हत्या बन्द करे हम तुम्हारे साथ है

  • Renu  On मई 22, 2013 at 11:12 अपराह्न

    bhrun hatya amanviya vyaharhai

  • shilpi agarwal ,agra  On जून 21, 2013 at 1:48 अपराह्न

    kanaya brun hatya ek baut bada aprad hai.kise panci ke biluft prani ki tarah batio ki prajati bhi biluft ho jaege…

  • abhi taliyan  On जून 24, 2013 at 9:22 पूर्वाह्न

    i like him beti bachao.

  • tushar joshi  On जुलाई 8, 2013 at 4:11 अपराह्न

    aapki kanya bhrun hatya ke bare me audio ho jo aapki awaz me ho wo me sabko sunana chahta hu taki 100% me 10% bhi is baat ko samje ke kanya bhrun hatya ham bandh kare to samaj or is duniya ka sabse bada labh honga aur samaj me ladki ka jo sthan hai wo majboot ho…………ye aasha rakhta hu ki sab log jaldi se is baat ko samjle warna malik sab dekh raha hai….. baaki to in sab bewkoofo ko kya salah mashoora karenge bas kosshish karenge himmat nahi haarenge……… thanks about ur written thanks a lot … tushar -morbi (guj.)india

  • sushant yadav  On अगस्त 29, 2013 at 4:16 अपराह्न

    Mujhe y bhut pasnd aaya… Is se mujhe mere decelamation me help milegi. .

  • yashsharma  On फ़रवरी 2, 2014 at 11:39 अपराह्न

    save girl child please

  • Renu Sharma  On मार्च 24, 2014 at 3:53 अपराह्न

    really good artical .

  • GULSHAN VARSHNEY  On अप्रैल 24, 2014 at 9:34 पूर्वाह्न

    http://www.youtube.com/watch?v=juzXnmfdkgE (choti si jaan)
    link dekhien aur repely kaein.es soch ko aage barhne me madad karien

  • GULSHAN VARSHNEY  On मई 5, 2014 at 8:54 पूर्वाह्न

  • GULSHAN VARSHNEY  On मई 5, 2014 at 8:56 पूर्वाह्न

    yeh is vishay par humari pahli koshish hai.!ise aage barhane mein sahyog kare.kisi bhi help ke liye call karein .9837156351,7417314925,reply must!

  • suhanashaikh  On अगस्त 24, 2014 at 2:53 अपराह्न

    beti hu me beti me tara banungi ,
    tara banungi me sahara banungi,
    gagan pe chamke chanda me dharti pe chamkungi,
    dharti pe chamkungi me ujyara karungi………..

  • janhvi  On नवम्बर 14, 2014 at 9:31 अपराह्न

    janhvi
    plase kehne se ya ek kone me baith ke apni kismet pe rone se sirf kuch nahi milega ab sympathy mangne se kuch nahi hoga apne aap abla mat bnao come on get up n fight for yourself

  • janvi  On नवम्बर 17, 2014 at 2:40 अपराह्न

    now female foeticide,chid marriageand many other things is not practise in cities and in most of the villages but yea that is also true that it is practise in rarely villages whose villagers asr narrow minded
    so,plzz who is practising ya they have seen that
    plzz take a action against it
    and if we will try then the other will try so frist we have to take a part in it
    soooo save girls the futrue willl be bright

  • lucky  On दिसम्बर 8, 2014 at 5:30 अपराह्न

    buron hatya

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