महंगाई में भलाई-हास्य कविताएँ (mehangai men bhalai-hasya kavieaen


महंगाई को सस्ता समझ लिया,
विकास का उसे बस्ता समझ लिया,
अक्ल लेकर उधार की
चला रहे है भलाई करने की दुकान,
अपने घर आ रही दौलत का
बस, केवल एक रस्ता समझ लिया।
———-
जिनके पेट भरे हैं पकवानों से,
सजी हैं घर की महफिलें धनवानों से,
वह महंगाई से टूट रहे
लोगों का क्या दर्द समझेंगे।
बाज़ार से खरीदकर हथियार
करते हैं अल्मारी में बंद
वह पहरेदार
हिफाजत के लिये क्या लड़ेंगे।
जुबां से निकल रहे गरजते हुए बयान,
दिल में है बस,
अपनी दौलत, शौहरत और ताकत का ध्यान,
अपनी वातानुकूलित कारों का आराम छोड़कर
आम इंसान की तकलीफ का सच समझने के लिए
उबड़ खाबड़ सड़कों पर क्या पांव धरेंगे।
————

कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com

यह आलेख इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप का चिंतन’पर मूल रूप से लिखा गया है। इसके अन्य कहीं भी प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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टिप्पणियाँ

  • sciencedarshan  On अगस्त 9, 2010 at 8:02 अपराह्न

    बहुत अच्छी है धन्यवाद

  • Manas Khatri  On अगस्त 14, 2010 at 5:31 अपराह्न

    bahut hi badhiyan likha hai…shubhkamnayein…

  • kenith  On अगस्त 16, 2010 at 7:52 अपराह्न

    ye kya ha yucksssssss:((((

  • bharti  On फ़रवरी 11, 2011 at 6:13 अपराह्न

    महंगाई को सस्ता समझ लिया,
    विकास का उसे बस्ता समझ लिया,
    अक्ल लेकर उधार की
    चला रहे है भलाई करने की दुकान,
    अपने घर आ रही दौलत का
    बस, केवल एक रस्ता समझ लिया।
    ———-
    जिनके पेट भरे हैं पकवानों से,
    सजी हैं घर की महफिलें धनवानों से,
    वह महंगाई से टूट रहे
    लोगों का क्या दर्द समझेंगे।
    बाज़ार से खरीदकर हथियार
    करते हैं अल्मारी में बंद
    वह पहरेदार
    हिफाजत के लिये क्या लड़ेंगे।
    जुबां से निकल रहे गरजते हुए बयान,
    दिल में है बस,
    अपनी दौलत, शौहरत और ताकत का ध्यान,
    अपनी वातानुकूलित कारों का आराम छोड़कर
    आम इंसान की तकलीफ का सच समझने के लिए
    उबड़ खाबड़ सड़कों पर क्या पांव धरेंगे।
    ————
    कवि,लेखक,संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior

  • rajiv  On अप्रैल 25, 2011 at 1:43 अपराह्न

    aap jinke liye ye likhe hai se isase bhi nahi sudhrenge.

  • nishant  On मई 31, 2011 at 8:34 अपराह्न

    you are exellenttttttttttttttttt.!

  • tanmay  On नवम्बर 20, 2011 at 10:39 अपराह्न

    nice

  • preemalagarwal  On फ़रवरी 7, 2012 at 5:58 अपराह्न

    excellent!!!!!!!!!

  • preemalagarwal  On फ़रवरी 7, 2012 at 5:59 अपराह्न

    excellent!!!!!!!!!!!

  • Preemal Agarwal  On फ़रवरी 7, 2012 at 6:00 अपराह्न

    nice

  • Bhagwat Saran Gupta  On फ़रवरी 21, 2012 at 6:05 अपराह्न

    Mehgae musebat hai garibo ki Mehgae se paresha to garib he hai

  • abhai  On जुलाई 27, 2012 at 10:38 अपराह्न

    kya sochate hai ……………………….
    jabarjast likhate………………………
    mahagayi khatam ho ya na lekin …..
    Bharat mata ki jai

  • Monark taunk  On अगस्त 26, 2012 at 9:29 अपराह्न

    wonderful

  • sudhakar shankar wayadande  On सितम्बर 9, 2012 at 2:42 अपराह्न

    Really it is a truth of the present society

  • tikeshwar sahu  On सितम्बर 14, 2012 at 12:24 अपराह्न

    bahut accha likh gaya hai.wakai me yahi duniya ki sachhai hai.

  • meenu roi  On सितम्बर 24, 2012 at 5:16 अपराह्न

    kab vah door aaye ga ki…2
    jab ham mahangai se …
    ajazdi payenge…….
    ham kerange intazaar…2
    kya pata ye door ham dekh payenge….
    ya uhi chood jainge………

  • apoorva  On अक्टूबर 9, 2012 at 8:13 अपराह्न

    sir u are best and awesome writer

  • Bhaskar suyal  On दिसम्बर 5, 2012 at 2:00 अपराह्न

    Bharat mata ke tum jai bolo jai bolo re !

  • gaurav  On जनवरी 1, 2013 at 2:44 अपराह्न

    nice one

  • kritika  On मार्च 5, 2013 at 9:17 अपराह्न

    its really good…
    {phle pyaz chatne me aasu ate the..:),,, ab kharidne me aate hai…:(:(

  • shailja mishra  On दिसम्बर 13, 2013 at 4:27 अपराह्न

    very nice

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