सब दिया उसने फिर भी हाथ फैलाते-व्यंग्य कविता

सर्वशक्तिमान के दरबार में
क्यों जाकर भीड़ लगाते हो,
जिसने दिए काम करने को हाथ
उसी के सामने कुछ मांगने के लिए
क्यों फैलाते हो.
जिसने दिए चलने के लिए पाँव
क्यों लौटकर जाते हो फिर  उसके गाँव,
उसने दुनियाँ   देखने के लिए दी है आँखें
टकटकी लगाए उसी की तरह क्यों देखते हो
जैसे  कैद किये हों तुम्हें सलाखें,
विचार करने के लिए दिया है दिमाग
जिसका करते हो उपयोग  केवल पांच प्रतिशत भाग,
कितना ताकतवर तुम्हें उसने बनाया
तुम लाचार होकर उसके सामने क्यों पहुँच जाते हो.
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लेखक संपादक-दीपक भारतदीप, ग्वालियर
http://dpkraj.blogspot.com
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