शयों का रोज शक्ल बदलना-हिन्दी व्यंग्य कविता (shayon ka roop-vyangya kavita)


जरुरतों की शयों का रोज शक्ल बदलना
दौलत के पहाड़ पर
इंसानों की चाहतों का चढ़ना
तरक्की का यह पैमाना नहीं होता।
इंसानों के जज़्बातों की उम्र
समय के साथ न बदलती हो
ख्यालों का चैहरा भी
हालातों के साथ नया नज़र न आये
तब यह तरक्की एक वहम होती है
चलती दुनियां तो दिखती
पर जमाना वहीं का वहीं होता है।
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घर में लाते जब कोई नया सामान
उसकी जगह छोड़ता हुआ
पुराना कबाड़ कहलाता है।
कमरे में दिखती है तरक्की
बुखारी में तबाही का मंजर नज़र आता है।
फिर भी किसे फिक्र है
तरक्की दिखाते है सभी को
तबाही का मंजर तो पर्दे में छिपाया जाता है।
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कवि, लेखक और संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior

http://dpkraj.blogspot.com

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