बुरी नज़र से डरें कि हाय से-हास्य व्यंग्य


भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान एक तरह से स्वर्णिम शब्द रहस्यों से भरा एक समूह है बस इसका एक ही दोष है कि आपको शब्दों के अर्थ के साथ उनका भाव भी ग्रहण करना पड़ता है। आधुनिक शिक्षा प्रणाली ने हमारे समाज की चिंतन क्षमताओं का कम कर दिया है इसलिये शब्द ज्ञान का अर्थ तो हम जानते हैं पर भाव के लिये हमें विद्वान चाहिये हैं और यह काम आजकल व्यवसायिक हो गया है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान कोई एक महापुरुष की देन नहीं है बल्कि समय समय पर वह इस पावन धरा पर वह प्रकट होते रहे हैं और अपनी तपस्या, निष्काम कर्म और निष्प्रयोजन दया के प्रभाव से इस समाज को वह शब्द ज्ञान देते रहे जो विश्व में कहीं अन्य नहीं है। यही कारण है कि विदेशी संस्कृतियों और विचारों के लोग भी आजकल इसकी कदर करने लगे है। सच बात तो यह है कि यह ज्ञान की खान अनेक लोगों के लिये धन कमाने का साधन बन गयी है इस चक्कर में अनेक कथित विद्वान इसे थोड़ा बहुत रटकर अपनी दुकान जमाने लगते हैं।
वैसे ज्योतिष का अध्यात्मिक ज्ञान से कोई अधिक लेना देना नहीं है पर अनेक ज्योतिषी अपने को ज्ञानी साबित करने के लिये महापुरुषों के संदेशों के साथ अपने आपको प्रस्तुत करते हैं ताकि वह अध्यात्मिक गुरु भी दिख सकें।
यह विचार हमारे दिल में पैदा क्यों हुआ? हुआ यूं कि उस दिन एक ज्योतिषी शायद कोई अपना मंत्र,यंत्र या तंत्र बेचने के लिये एक चैनल पर अपना कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे थे। हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं थी पर उन्होंने संत प्रवर कबीर का दोहे का सहारा जिस तरह लिया वह हमें तो अर्थ का अनर्थ लगा।
यहां यह भी बता दें कि अपने शतप्रतिशत सही होने का दावा हम कभी नहीं करते। इसका कारण यह है कि एक मित्र ने बताया था कि जब हम अपने को सही और दूसरों को गलत समझने लगें तो इसका आशय यह है कि हम मनोरोग से ग्रसित हैं। वह एक मानसिक चिकित्सालय में किसी से मिलने गया था। वहां उसे एक बोर्ड पर दस ऐसे लक्षण पढ़े जो आदमी के मनोरोगी होने का प्रमाण देते है। उनमें एक यह भी था कि ‘क्या आप समझते हैं कि आप हमेशा सही होते हैं दूसरे गलत‘।
तब से हमने यह बात गांठ बांध ली कि कभी अपने आपको सही बताने की जिद्द पर नहीं अड़ेंगे। यह बात भले ही किसी अन्य को नही मालुम पर हमें तो मालुम है इसलिये ऐसी स्थिति में स्वयं को ही मनोरोगी प्रतीत हों इससे अच्छा है कि अपने को एकदम सही तो मानो ही नहीं । भले ही मनोरोगी हों पर कम से कम अपने को तो न लगें।
बहरहाल वह ज्योतिषी लोगों को ‘बुरी नजरों’ से बचने का उपाय बता रहे थे। यह भी अच्छी बात है। मगर उन्होंने कबीर दास जी का एक दोहा सुनाया जिसका आशय यह था कि आप अगर गरीब, निरीह, या परेशानहाल आदमी को सताते हैं तो आपको उसकी हाय लग सकती है। जहां तक हमारा ज्ञान कहता है कि बुरी नजर और बद्ददुआ में अंतर होता है। एक बार बुरी नजर से आदमी बच जाये पर बद्ददुआ से नहीं बच सकता। वह ज्योतिष यही कह रहे थे कि‘ बुरी नजर से बचने का यह उपाय है’। बुरी नजर का प्रभाव होता है और हमारे महान संत कबीरदास जी ने भी कहा है कि’…………….उन्होंने अपना दोहा सुनाया और फिर उसके अर्थ में भी कहीं बुरी नजर शब्द का उपयोग न कर हाय शब्द ही बताया।
हम तो मानते हैं कि बुरी नजर वाले का मूंह काला पर कबीरदास जी ने जिस दोहे में गरीब, निरीह और परेशान हाल आदमी की हाय न लेने का संदेश दिया है उसका उपयोग ‘बुरी नजर’ के प्रभाव बताने वाली बात समझ में नहीं आयी। फिर हमने सोचा कि उनका भी क्या दोष?
रहीम, कबीर, तुलसी और सूर ने जीवन भर संघर्ष कर अपनी रचनायें कीं। किसी से कोई महल, रथ या सोने का दान नहीं लिया क्योंकि यह महापुरुष दान हमेशा सुपात्र को देने का संदेश देते रहे। उनकी रचनाओं में जो सुगंध है उससे सुनकर अच्छे खासे ऐसे लोग भी बेहोश हो जाते हैं जो इनको अपनी शैक्षणिक पुस्तकों में पढ़ चुके हैं। इसी बेहोशी का फायदा वह लोग उठाते हैं जो ज्ञान का व्यापार करते हैं। कबीरदास जी का दोहा सुना दिया तो लोगों ने ताली बजा दी। सुनाने वाला हिट हो गया। अब वह उसका किस संदर्भ में क्या अर्थ सुना रहा है कोई समझने वाला नहीं है। सो अनेक संत, साधु, कथावाचक और ज्योतिषी हिट होते जा रहे हैं। संत कबीर और रहीम के संदेशों में जो जिंदगी के रहस्य शाब्दिक सौंदर्य में सजा कर कहे गये हैं उनकी चकाचैंध से भला कौन बच सकता है पर उसका अर्थ समझकर ही उनको ग्रहण करना चाहिये। अगर संत कबीरदास जी के समय कोई ज्योतिषी उनके दोहे के सहारे अपनी इस तरह दुकान चलाता तो शायद उस पर दो चार दोहे रचकर उसकी हालत खस्ता कर देते।
पता नहीं ज्योतिषियों के पास ‘बुरी नजर’ से बचाने वाला जो मंत्र, यंत्र और तंत्र है उसका प्रभाव होता है कि नहीं पर जिस तरह वह ‘लोगों की हाय’ से बचाने के लिये उसका उपयोग बता रहे थे। उससे तो दो ही बातें सिद्ध होती हैं कि वह अल्प ज्ञानी थे और बोलने के लिये बोले जा रहे थे या चतुर व्यवसायी थे और वह सोच रहे थे कि आजकल सभी की नजरें तो बुरी हैं इसलिये भला उससे कौन डरता है, सभी तो एक दूसरे की टांग खींचने के पाप में लिप्त हैं सो ‘हाय’ लगने की बात कहकर उनका डराया जाये। उनकी माया वह जाने पर हम इतना जानते हैं कि किसी गरीब, निरीह और परेशान हाल आदमी की ‘हाय’ से बचाने का उपाय किसी महापुरुष ने नहीं बताया-कम से कम जहां तक हमारी जानकारी है।
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कवि,लेखक संपादक-दीपक भारतदीप

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