किसी भी राष्ट्र का सम्मान न तब तक नहीं बढ़ सकता जब तक वह दूसरों से मदद लेता है और जब वह दान लेने लगे तो समझ लेना चाहिये कि वह पतन के गर्त में गिर चुका है। पाकिस्तान की स्थिति भी कुछ वैसे ही है पर लगता है कि वह मदद और दान एक तरह हफ्ता वसूली की तरह ले रहा है।
आजकल पाकिस्तान पर दानदाता देशों का विशेष अनुग्रह हो गया है। वैसे तो पाकिस्तान को अनेक देश घोषित अघोषित रूप से सहायता देते रहे हैं पर उस पर किसी का ध्यान नहीं जाता था। मुंबई पर हमले के पश्चात् पूरे विश्व में उसकी कड़ी प्रतिक्रिया हुूई और उसके लिये पूरी दुनियां ने पाकिस्तान को जिम्मेदार माना। इससे उसको सहायता देने वाले देशों के लिये उसको बड़ी राशियां देना कठिन हो गया। फिर यह भी सभी जानते हैं कि पाकिस्तान को मिली ऐसी सहायता आतंकवादियों तक ही पहुंच जाती है। पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति करीब छःह महीने से खराब है और उसे बीच में चीन ने राहत देकर दिवालिया होने से बचाया था। अब अमेरिका आगे आया है और उसके मित्र देश अब उसकी मदद कर रहे हैं पर अब इसे दान का नाम दिया जा रहा है। हुआ यह है कि पाकिस्तान की मदद को लालायित यह देश पिछले कुछ दिनों से अपना खजाना उसके लिये खोल नहंीं पा रहे थे क्योंकि इससे उनके कर्णधारों की अपने देश में जनता की नजरों में छबि खराब हो जाती। फिर भारतीय जनता की नजरें भी सभी पर लगी हुई हैं। मगर विश्व में अमीर देशों को तो बस पाकिस्तान की मदद का नशा है सो अब इस मदद को नाम दिया गया है ‘दान’। यानि अपने देश और विश्व के लोगों को भ्रमित करना। मदद से थोड़ी संवेदना कम हो जाती है और अब तो पाकिस्तान का नाम जिस तरह से विश्व में जाने लगा है उससे हर जगह आम आदमी उससे घृणा करता है। ऐसे में दान शब्द से आदमी की भावनायें थोड़ा अलग हो जाती हैं कि क्योंकि ‘दान’ करना एक अच्छा काम माना जाता है। फिर ‘दान’ देने वाले देशों के लोग शायद विश्व में अपनी ‘दानदाता’ वाली छबि से शायद खुश होंगे। फिर भारत के लोग भी ‘दान’ को लेकर शायद ही गुस्से का इजहार करें-ऐसा अनुमान किया जा रहा होगा।
आखिर यह क्या हो रहा है? एक तरफ पाकिस्तान के नाकाम राष्ट्र होने का भय सभी को सता रहा है। पाकिस्तान के पास जो परमाणु बम हैं उसका वह अब भावनात्मक रूप से उपयोग कर रहा है। हालत यह है कि सर्वाधिक परमाणू बम रखने वाल अमेरिका तक उसके बमों से घबड़ाया हुआ है। अब जापान ने भी पाकिस्तान को दान देने का फैसला किया। यह आश्चर्य की बात है कि विश्व का हर बड़ा देश पाकिस्तान को दान देने के लिये तैयार बैठा है। वैसे एक बात मजे की है कि पाकिस्तान के कर्णधारों ने विश्व से कोई ऐसी अपील नहंी की है कि उसे दान दिया जाये। हो सकता है कि ऐसे में भारतीय जनता भी कुछ विचार कर सकती।
सच बात तो यह है कि पाकिस्तान के रणनीतिकारों ने पूरे विश्व के देशों को चक्करघिन्नी बना दिया है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हो गया है कि पाकिस्तान को दान पर दान दिया जा रहा है। एक अखबार में यह विश्लेषण छपा था कि अमेरिका अब केवल अपना ध्यान अलकायदा से संघर्ष पर केंद्रित करना चाहता है। तालिबान को उसने अपने लक्ष्य से परे कर दिया है। इसलिये संभव है यह दान कथित रूप से तालिबान को अलकायदा से अलग करने के काम आ सकता है। तालिबान से केवल अफगानिस्तान और भारत को परेशानी है और अभी तक आतंकवाद पर साझे संघर्ष करने के दावे करने वाले विश्व के अमीर और बड़े राष्ट्रों ने अब अपनी नीति बदल ली हैं। वह तालिबान और अलकायदा को अलग करना चाहते हैं। अब यह कहना कठिन है पर अभी तक समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों पर जो विश्लेषण हमने देखें हैं उससे नहीं लगता कि इसमें कोई बहुत जल्दी सफलता मिल पायेगी। तालिबान के पास जो मानवीय शक्ति है उसका उपयोग अलकायदा अपने धन और तकनीकी कौशल के कारण अपने सहायक के रूप में करता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि तालिबान से जुड़े अधिकतर लोग धन के कारण उसमेंे हैं पर दूसरा सच यह भी कि लड़ना उनकी प्रवृत्ति है। पाकिस्तान के जिन इलाकों में तालिबान सक्रिय है उसकी उपस्थिति का कारण यह है कि वहां लोगों की अशिक्षा और गरीबी के कारण उनका उपयोग करने के सुविधा होती है। इसके अलावा वह इलाके बहुत सुंदर और उपजाऊ हैं जहां सूखे मेवे पैदा होता है। अलकायदा के लोग मध्य एशिया से आकर वहां ऐश की जिंदगी जीते हैं और तालिबान को आर्थिक सहायता देकर उसे अपनी सुरक्षा के लिये उपयोग करते है। दरअसल अलकायदा और तालिबान तो बस नाम भर है वहां के स्थानीय निवासियों की जुझारु प्रवृति विश्व विख्यात है जो अपने विरोधी पर कभी हिंसा के रूप में प्रकट होती है। आपने डूरंड लाईन का नाम सुना होगा। उसे कभी अंग्रेज पार नहीं कर पाये और इसलिये अफगानिस्तान कभी उनके हाथ नहीं आया। जब तालिबान और अलकायदा नहीं थे तब भी वहां पाकिस्तान का संविधान नहीं चलता था और आगे भी चलेगा इसकी संभावना नहीं है। इन जुझारु जातियों का खौफ पाकिस्तान के हर शहर में रहता है। आजादी से पहले भी अनेक नृशंस हत्यााओं का जिक्र अनेक बुजुर्ग करते रहे हैं। आदमी को काट देना वहां कोई कठिन काम नहीं माना जाता। अलकायदा और तालिबान ने तो वहां के लोगो की अशिक्षा,गरीबी और जुझारु प्रवृति को भुनाया है न कि बनाया है-कम से विद्वानों की अभी तक जो विश्लेषण हैं वह तो यही बताते हैं।
बहरहाल अब पाकिस्तान अपने हालत बनाने के लिये दान ले रहा है और वह यही दान अब उन लोगों तक पहुंचेगा जो हिंसा में लिप्त हैं। यह पैसा लेने वालों को दान और मदद की अंतर से कोई मतलब नहंीं हैं। वह भी जानते हैं पड़ौसी देश भारत के दबाव की वजह से यह हो रहा है। आतंकवाद के विरुद्ध संयुक्त संघर्ष की बात करने वाले देशों के चरित्र की यही असलियत है कि वह उसी आतंकवादी समूह को अपने विरुद्ध मानते हैं जिसकी गतिविधियां उनको त्रस्त करती हैं और दूसरे के विरुद्ध सक्रिय आतंकवादी गिरोह उनको मित्र लगते हैं या वह उसकी उपेक्षा कर देते हैं। जबकि यह सभी को पता है इन आतंकवादियों के गिरोह आपस में मिले हुए हैं। मदद हो या दान, मजे में रहेगा पाकिस्तान। उसे अपने मनोमुताबिक धन मिल रहा है तो वह क्यों आतंकवाद को समाप्त करना चाहेगा।
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