अमेरिका में राष्ट्रपति के उम्मीदवार श्री ओबामा ने भारत के चंद्रयान भेजने पर चिंता जाहिर की और इसे अपने नासा संस्थान के लिये चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि वह विजय प्राप्त कर नासा की प्रगति के लिये काम करेंगे। यह खबर दो दिन पुरानी है पर आज नयी खबर यह पढ़ने को मिली कि अमेरिका का चैदहवां बैंक दिवालिया हो गया। अमेरिका अभी तक आतंकवाद से परेशान था पर आर्थिक मंदी भी उसके लिये संकट बन गयी है ऐसे में भारत का चंद्रयान भेजने का दर्द वह उस तरह व्यक्त नहीं की जैसे कर सकता था।
कुछ लोगों को ओबामा साहब की यह चिंता कोई अधिक महत्वपूर्ण नहीं लगती होगी पर जिन लोगों ने खबरे पढ़ते हुए अपनी जिंदगी गुजार दी वह इस बात को बहुत महत्व दे रहे हैं यह अलग बात है कि उनके दिल की बात लिखने वाला कोई बुद्धिजीवी नहीं है। सच तो यह है कि आर्थिक विशेषज्ञ स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि वर्तमान मंदी से उबरने के लिये अमेरिका को कम से कम पांच वर्ष लग जायेंगे। अमेरिकी सरकार अपने यहां की मंदी से जूझ रही है और उसे इसके लिये बहुत कुछ करना है।
भारतीय बुद्धिजीवी इस समय आंतकवाद को लेकर इस बहस में उलझे है कि कौनसा भाषाई,धार्मिक या वैचारिक समूह अच्छा है और कौन खराब। उन्हें यह सब दिखाई नहीं दे रहा कि जिस अमेरिका की उदारीकरण की वह प्रशंसा करते थे वहां की सरकार आखिर अब अपना धन क्यों लगा रही है? इधर भारत के सार्वजनिक बैंक सुरक्षित हैं तो यहां को लेकर आर्थिक विशेषज्ञ चिंतित नहीं हैंं।
कहा जाता था कि भारत की सरकार की नियंत्रित प्रणाली के कारण विकास नहीं हो पा रहा है पर चंद्रयान-1 क प्रक्षेपण से यह स्पष्ट हो गया है कि यह केवल एक भ्रांत धारणा थी। इसने भारत की प्रतिष्ठा में चार चांद लगा दिये और उसकी बढ़ती वैज्ञानिक शक्ति से इस बात की संभावना बन रही है कि विश्व के अनेक गरीब और विकासशील राष्ट्र भारत की तरफ झुक सकते हैं ताकि उन्हें अपने लिये सस्ते में तकनीकी मदद मिल सके। देने को तो अमेरिका भी ऐसी सहायता देता है पर न केवल पूरा पैसा वसूल करता है बल्कि अपनी अनेक ऐसी शर्तें भी मनवाता है जो किसी सार्वभौमिक राष्ट्र के लिये तकलीफदेह होती हैं। अमेरिका के अलावा अन्य विकसित राष्ट्र भी अब भारत को बराबरी का दर्जा दे सकते हैं-इसके लिये संयुक्त राष्ट्रसंघ में स्थाई सीट होने की जरूरत अब कम ही लोग मानते हैंंं।
भारत ने नियंत्रित प्रणाली होते आर्थिक विकास किया और साथ विज्ञान में भी वह स्थान प्राप्त कर लिया जो अभी चीन के लिये भी थोड़ा दूर है-हालांकि वह भी जल्द ही अपना चंद्रयान अंतरिक्ष में भेजने वाला है। ऐसे में अमेरिका के लिये उस क्षेत्र में चुनौती मिल रही है जिस पर उसका एकाधिकार था। निजी क्षेत्र की हमेशा वकालत करने वाले भारत के बुद्धिजीवी यह सोचकर हैरान होंगे कि कुछ लोगों ने वहां दबे स्वर में भारत की तरह मिश्रित अर्थ व्यवस्था अपनाने की आवाज उठाई है। मिश्रित अर्थव्यवस्था का अगर संक्षिप्त मतलब यह है कि जनहित के कुछ व्यवसाय और सेवायें सीधे सरकार के नियंत्रण में रहें ताकि उससे देश की आम जनता के जनजीवन को कभी पटरी से न उतारा जा सके। भारत में वैसे अधिकतर लोग इसी तरह की अर्थव्यवस्था के ही समर्थक हैं, पर सरकार की नियंत्रण की सीमाओं पर क्षेत्रों की संख्या पर मतभेद रहे हैं। हालांकि कुछ बुद्धिजीवी इसके कड़े विरोधी है और यह तय बात है कि वह पूंजीपतियों के लिये लिखने और पढ़ने वाले हैं।
बहरहाल भारत के बुद्धिजीवियों को अब यह समझ लेना चाहिये कि तमाम तरह के विवादों के बावजूद भारत अब विश्व महाशक्ति बनने की तरफ बढ़ रहा है और इस समय इस पर पर विराजमान अमेरिका और अन्य पश्चिमी राष्ट्र अपनी अर्थव्यवस्थाओं को लेकर जूझ रहे हैं। वैसे भारत के विश्व में सर्वशक्तिमान होने की बात का पहले भी अनेक लोग मखौल उड़ाते रहे हैं पर जिस तरह अमेरिका की मंदी ने वहां के हालात बिगाड़े हैं उससे ऐसा लगता है कि तमाम तरह के परिवर्तन इस विश्व में आ सकते हैं। अधिकतर लोगों को लगता है कि अमेरिका केवल हथियारों की वजह से ताकतवर है पर यह केवल अद्र्धसत्य है। अमेरिका के शक्तिशाली होने का कारण यह भी है कि अंतरिक्ष तकनीकी पर एकाधिकार होने के कारण अनेक देश उस निर्भर हैं और यही कारण है कि अपनी पूंजी भी वहीं लगाते हैं। यही कारण है कि अमेरिकी बैंक निजी होते हुए भी बहुत सारी पूंजी अर्जित कर लेते थे।
अब जिस तरह वहां बैंक दिवालिया हो रहे हैं उससे अमेरिका की साख पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है क्योंकि अमेरिका सरकार कब तक इन बैंकों को बचायेगी। इसके विपरीत भारतीय बैंकों पर सरकार का नियंत्रण है। हालांकि भारत में भी निजी बैंक अस्तित्व में आ गये हैं पर इस मंदी के कारण उनकी अभी कोई बृहद भूमिका नहीं है। यही कारण है कि भारत के आर्थिक विशेषज्ञ यहां की अर्थव्यवस्था को चिंतित नहीं है। अमेरिका में आर्थिक मंदी का प्रकोप है और ऐसे में अगर भारत से तकनीकी, विज्ञान और अंतरिक्ष के क्षेत्र में चुनौती मिलने वाली खबर मिलती है तो उस पर श्री ओबामा का चिंतित होना स्वाभाविक है।
———————————-
<blockquote><strong>यह आलेख मूल रूप से इस ब्लाग <a href=”http://anantraj.blogspot.com”>‘अनंत शब्दयोग’</a>पर लिखा गया है । इसके अन्य कहीं प्रकाशन के लिये अनुमति नहीं हैं। इस लेखक के अन्य ब्लाग।
<a href=”http://dpkraj.blogspot.com”>1.दीपक भारतदीप का चिंतन</a>
<a href=”http://dpkraj.wordpress.com”>2.दीपक भारतदीप की हिंदी-पत्रिका</a>
<a href=”http://zeedipak.blogspot.com”>3.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका</a>
<a href=”http://teradipak.blogspot.com”>4.दीपक भारतदीप शब्दज्ञान-पत्रिका</a> </strong></blockquote>
One Comment
agar vyavastha ka yahi haal raha to mujhe bharat ke mahashakti banne me poora dar hai.