भारतीय भाषा दिवसः एक फ्लाप लेखक का विशेष संपादकीय

लोग आज इसे हिंदी दिवस कह रहे हैं पर एक हिंदी विद्वान का मत है कि इसे भारतीय भाषा दिवस के रूप में मनाना चाहिये क्योंकि हिंदी का अर्थ बहुत व्यापक है। ऐसी कई क्षेत्रीय भाषायें है जिनका लिखा साहित्य हिंदी का ही भाग माना जाता है। यह एक अलग विषय है पर हम यहां हिंदी के अंतर्जाल पर भावी स्वरूप पर विचार करें तो कई ऐसी संभावनायें दिखायीं देंगी जो दिलचस्पी पैदा करती है।

इस समय हिंदी के ब्लाग लेखकों को आम पाठक नहीं मिल रहे हैं पर इस बात की संभावना पूरी है कि जब रुचिकर लेखन होगा तो पाठक यहां आयेंगे और लेखक अपने स्वंतत्र अस्तित्व के साथ उनसे जुड़ेंगे जो अभी तक नहीं हुआ। ब्लाग पर लिखने के लिये थोड़ा हिंदी अंग्रेजी टाइपिंग का ज्ञान होना जरूरी है जो कि अधिकतर लेखकों को है। शेष कोई ऐसी बात नहीं है कि कोई सीख न सके। पाठकोें का रुझान देखकर तो लग रहा है कि अपनी भाषा में पढ़नें की उनकी उत्कंठा बढ़ती जा रही है। प्रश्न है कि उनकी रुचियों के अनुरूप लिखा जाना चाहिये और फिर उसकी जानकारी भी वहां तक पहुंचना चाहिये।

वैसे अंतर्जाल पर कई बात पूरी तरह दावे से नहीं कही जा सकती क्योंकि अभी किसी ब्लाग लेखक को किसी के मुकाबले गुणात्मक बढ़त नहीं मिली यानि कोई ऐसा लेखक नहीं दिख रहा जिसने आम पाठक में अपनी पैठ अपने स्वतंत्र और मौलिक लेखन के जरिये बनाई हो। मेरे कुल बीस ब्लाग हैं पर मैं 12 ब्लाग को ही अपना अधिकृत ब्लाग मानता हूं और उन पर पाठकों की आवक सात सौ से आठ सौ के बीच है। हिंदी पत्रिका और ईपत्रिका प्रतिदिन डेढ़ सौ के ऊपर तक पहुंच जाती है। चार ऐसे ब्लाग है जिन पर सौ से अधिक पाठक आते हैं। वर्डप्रेस के ब्लाग तेजी से पाठक जुटाते हैं पर ब्लाग स्पाट के ब्लाग एकदम सुस्त हैं। पता नहीं इसके पीछे क्या वजह है? बहरहाल पाठकों की संख्या जिस तरह बढ़ रही है उससे एक बात तो लगती है कि मेरा अधिक से अधिक आम लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का प्रयास आज नहीं तो कल सफल होगा।
एक खास बात जो अब तक के अनुभव लग रही है कि अंतर्जाल पर हिंदी कई रंग बदलती हुई ऊंचाई पर आयेगी। हो सकता है कुछ लोग इस बात से सहमत न हों पर कुछ ऐसा है जिसे अभी तक अनदेखा किया जाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि आम लेखक को कहीं किसी प्रकार का समर्थन नहीं मिला पर ब्लाग पर उसे केवल पाठकों का ही समर्थन बहुत ताकत देगा। ब्लाग अपने आप में बहुत बड़ी ताकत रखता है यह बात मैंने तमाम प्रयोगों से जान ली है। अगर कोई ब्लाग लेखक पाठकों की अभिरुचि के अनुसार लिखने में सफल रहा और लोेग उसका आपसी बातचीत के जरिये ही प्रचार करने लगे तो वह किसी का मोहताज नहीं होगाा। यहां अपने प्रसिद्धि के लिये किसी की चिरौरियां करने की आवश्यकता नहीं हैं जैसा कि बाहर करना पड़ती है। यह अलग बात है कि यहां पहले से स्थापित कुछ लोगों का व्यवहार अब प्रकाशकों की तरह हो रहा है पर वह यह भूल रहे हैं कि ब्लाग का एक स्वतंत्र अस्तित्व है। हिंदी के ब्लागों को सर्वाधिक पाठक दिलवाने एक फोरम पर अंपजीकृत होने के बावजूद मेरे कुछ ब्लाग पर्याप्त संख्या में पाठक जुटा रहे हैं जो इस बात का प्रमाण है हिंदी का पाठक अपने लिये यहां कुछ ढूंढ रहा है। अभी महामशीन पर लिखा और अंपंजीकृत ब्लाग पर प्रकाशित एक पाठ अपने लिये एक दिन में पचास पाठक जुटा ले गया। उससे मुझे खुद आश्चर्य हुआ।

अभी अंतर्जाल पर पर सक्रिय लोगों में अधिकतरी केवल फोटो या यौन साहित्य में अधिक दिलचस्पी ले रहे हैं क्योंकि उनको यह पता ही नहीं है कि यहां सत् साहित्य लिखा जा रहा है। दूसरी जो महत्वपूर्ण बात है कि इन दोनों आधारों पर अधिक समय तक अंतर्जाल पर उनकी सक्रियता नहीं रहेगी और हो सकता है कि लोग टीवी और अखबारों की तरह इससे भी विरक्त हो जायें। स्वयं मैं भी कई बार विरक्त होकर इंटरनेट कनेक्शन कटवाने की सोचता हूं क्योंकि मैंने इस उद्देश्य से लिया था वह निकट भविष्य में पूरा होता नहीं दिख रहा। अगर हिंदी के पाठक अधिक होते तो शायद मैं ऐसा विचार नहीं करता। ऐसे में हिंदी में सत् साहित्य लिखते रहने का विचार इसलिये मन मेंे रहता है क्योंकि उसके दम पर ही अंतर्जाल का प्रयोग एक आदत के रूप में लोगों स्थापित किया जा सकता है जो कि दीर्घकालीन अवधि के लिये होगा। इसके लिये सवाल यह है कि लिखेगा कौन और पढ़ेगा कौन? पहले सत् साहित्य लिखा जाये कि पहले पढ़ने वाले जुटाये जायें। ऐसे में एक ही बात सही लगती है कि सत्साहित्य लिखो और फिर शांति से बैठ जाओ।

यहां सत् साहित्य लिखते जायें पर पाठक मिलें नहीं इससे कभी कभी मन ऊबने लगता है। पैसा तो यहां मिलने का प्रश्न ही नहीं है। फिर जो सक्रिय समूह हैं वह केवल आत्मप्रचार तक ही सीमित हैं और ब्लाग लेखकों को वह अपने साथ ऐसे जोड़े हुए हैं जैसे कि वह उनके अंतर्गत काम करने वाले व्यक्ति हों। यह सच है कि यही लोग अभी तक स्वतंत्र मौलिक लेखकों को प्रोत्साहित किये हुए हैं पर पाठकों का समर्थन अधिक न होने से इन पर निर्भर भी रहने से कई बार मानसिक संताप भी होता है। ऐसे में एक ही उपाय है कि अपने ब्लाग पर लिखते जायें और किसी की परवाह न करें। कम से कम टिप्पणियों का मोह छोड़ दें। वैसे मैं तो केवल स्वांत सुखाय ही यहां आया था पर टिप्पणियों के चक्कर में वह सब भूल गया। आज से यही सोचकर लिखना शुरू कर रहा हूं कि मुझे अब अकेले ही अपने रास्ते पर चलना चाहिये। इसलिये एक ब्लाग बना रहा हूं जहां सभी ब्लाग से चुनींदा रचनायें उठाकर वहां प्रकाशित करूंगा। इस ब्लाग को कहीं भी लिंक करने की अनुमति नहीं होगी। जिन लोगों को चुनींदा रचनायें पढ़नी हों वह वहीं आकर पढ़ें। अन्य ब्लाग पर भी नियमित लेखन में अब आम पाठकों के लिये रुचिकर लिखने का प्रयास जारी रहेगा। इस ब्लाग के तीस हजार पाठक पूरा होने पर यह दूसरा संपादकीय इसलिये लिख रहा हूं क्योंकि आज हिंदी दिवस है और मैंने यहां ब्लाग लिखने से पहले एक लेख में पढ़ी यह बात गांठ बांध ली है कि अपने ब्लाग पर कुछ न कुछ लिखते रहो। अभी फ्लाप है तो क्या कभी तो हिट होंगे। इस हिंदी दिवस-जिसे मै भारतीय भाषा दिवस भी कह रहा हूं-पर सभी ब्लाग लेखक मित्रों और पाठकों को बधाई।

यह मूल पाठ इस ब्लाग ‘दीपक भारतदीप की शब्द- पत्रिका’ पर लिखा गया। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति नहीं है।
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1.दीपक भारतदीप की ई-पत्रिका
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2 Comments

  1. Posted September 14, 2008 at 7:58 AM | Permalink

    सचमुच अधिक से अधिक आम लोगों तक अपनी बात पहुंचाने का प्रयास आज नहीं तो कल सफल होगा। अंतर्जाल पर हिंदी कई रंग बदलती हुई ऊंचाई पर आयेगी। मेरी शुभकामनाएं। अच्छा लिखा है आपने।
    हिंदी दिवस पर मैंने भी एक पोस्ट
    http://medianarad.blogspot.com/
    पर डाली है। आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।

  2. Posted September 14, 2008 at 9:17 AM | Permalink

    अच्छा विश्लेषण! वर्ड प्रेस कभी ट्राई नहीं किया.

    हिन्दी दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.


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