अच्छा स्वास्थ्य भी धन है, छिपा कर रखें:हास्य-व्यंग्य

स्वास्थ्य भी एक धन होता है और जिस तरह लोगों से धन छिपाया जाता है उसी तरह अपना अच्छा स्वास्थ्य भी अब छिपाना चाहिए। आजकल धन तो कई लोगों के पास मिल जाता है पर अच्छा स्वास्थ्य सभी के पास नहीं होता। अगर आप कार्यालय या परिवार में किसी काम से पीछा छुड़ाना चाहते हैं तो खराब स्वास्थ्य का बहाना बना दीजिये।

समय ने करवट ली है। कहां तो लोग अपने आपको स्वस्थ साबित करने के लिए अपनी बीमारी छिपाते थे और कहां आजकल अपने को समस्याओं से बचने के लिए बीमार घोषित कर देते हैं।

आम तौर से मैं कभी भी बीमार होते हुए भी बीमारी का बहाना नहीं करता। कारण यह है कि कुछ बीमारियां तो काम करने से स्वतः ही दूर हो जातीं है। आलस्य से सोने या कम न करने से कई बीमारियां बिना बुलाये आ जातीं है। हालांकि मैं देखता आ रहा हूं कई लोग मेरी इस प्रवृत्ति का लाभ उठाते हुए मुझे कई ऐसे काम देते हैं जो वह स्वयं कर सकते हैं। कहते हैं-‘तुम जरा यह कर देना। मैं आज ठीक नहीं हूं। मेरे घर में शादी है तुम मेरे लिए सब्जी ले आना।’ या कहते हैं कि ‘तुम अपने काम से जाते हो, उससे थोड़ा दूर हमारी दवा मिलती हैं, थोड़ा चलकर हमारी दवा ले आना। हम तो चल नहीं सकते’
आशय यह है कि तुम ठीक हो तो हमारा काम कर दो। कार, मोटर सायकिल और स्कूटर की सुविधा होते हुए भी लोग चलने से लाचार हैं। एक बार एक शादी में शामिल होने हम सुबह ही एक निजी व्यक्ति के घर पहुंचे। उसके पास कार स्कूटर और मोटर सायकिल सब हैं। मुझे देखते ही वह बोला-‘‘यार अच्छा हुआ तुम आये। मेरे घर मेहमान हैं। कहीं काम से नहीं जा पा रहा हूं। तुम तो एकदम निजी आदमी हो, मेरे लिए किराये का सामान ले आओ।’
हमने अपनी पत्नी को वहीं छोड़ा और उसके किराये का सामान लाने के लिए स्कूटर चालू किया तो वह बोला-‘‘तुम अपना स्कूटर यहीं छोड़ जाओ। मैं अपने बेटे के साथ कुछ रिश्तेदारों के पास जा रहा हूूं। तुम भले ही आटो या टेम्पो से चले जाओ। हमारी कार, स्कूटर और मोटरसायकिल खराब पड़ी हैं। फिर तुम्हें पता है कि बीमार रहता हूं। आटो में चल नहीं सकता। तुम तो स्वस्थ हो चले जाओगे।’

मैंने उसकी बात मान ली। रात को शादी में वह सज्जन अपने बेटे की बारात में नाच रहे थे। हमने उसे भी नजरंदाज किया। हमारी पत्नी ने बताया कि-‘वह झूठ बोल रहे थे कि उनकी कार, स्कूटर और मोटर साइकिल खराब पड़ी है। उनकी घर की औरतों से ही पता चला कि बाहर से आए रिश्तदेार शहर घूमने के लिए वाहन न मांगे इसलिए इनको दो दिन के लिए बीमार घोषित किया गया है।’
हमने इस पर भी अनदेखा कर दिया। रात को दो बजे घर लौटते समय हमारा स्कूटर चलते-चलते बंद हो गया तो हमारा माथा ठनका। मेरे स्कूटर का सुरक्षित भंंडार (रिजर्व) का सूचक यंत्र ढंग से काम नहीं कर रहा था। मैंने अपनी जेब से टार्च निकाली तो टंकी को खाली पाया जबकि मैं सुबह ही उनके घर जाते हूए तीन लीटर पैट्रोल भरवाकर ले गये था। तब हम अपने स्कूटर को दो किलोमीटर घसीटते हुए पैट्रोल पंप तक ले आये। हांफते हुए हम इस बात के लिए अपने को कोस रहे थे कि हम क्यों दूसरों के सामने इतने फिट बने रहते है।

उस दिन हमें दूसरे शहर से एक संदेश मिला कि आप हमारी लड़की को आज ही अमुक सामान खरीद कर पहुंचा आओ। उसके ससुराल वालों की यह मांग है कि पहले बच्चे के जन्म दिन पर अमुक-अमुक चीज बहु के मायके से आती हैं। अगली मुलाकात मेंं पैसे का भुगतान कर देंगे।
अपने काम की हानि कर मैं पत्नी को गर्मी में वह सामान बाजार से खरीदकर उनकी लड़की के घर पहुंचा आया। दो दिन बाद वह फोन नाराज हो रहे थे कि आप लोगों ने कितना घटिया सामान वहां पहुंचा दिया। क्या हम पैसा नहीं दे रहे थे।
मैं और पत्नी एक दूसरे का मूंह देखते रहे। कुछ दिन पहले एक सज्जन घर आये और बोले-‘‘सुना है आप दूसरे शहर जा रहे हैं। वहां मेरी बेटी का सामान पहुंचा आयें तो अच्छा रहेगा। मैं तो बीमार होने की वजह से कहीं बाहर जा नहीं पाता।’
पत्नी ने इशारा किया पर हम समझे नहीं और सहमति दे दी। थोड़ी देर बाद वह अपनी कार से चार फलो के टोकरे और दो बड़े थैले निकाल कर लाये तो हमारी सांस रुकती लगी। मैंने उनसे कहा-‘पर हम कोई खुशी में नहीं जा रहे। किसी बीमार का हालचाल जानने जा रहे हैं। वह उस शहर में बहुत दूर है और पहले हमें उनके घर ही जाना हैं। फिर मेरे तो हाथ और पांव में इतना दर्द है कि अपना सामान उठाते ही डर लग रहा है। हां मेरी तुम्हारी भाभी (मेरी पत्नी) इसके लिए सक्षम हो तो पूछ लो। सामान देने भी इनके रिश्तेदार ही जायेंगे। मेरा जाना वहां संभव नहीं होगा।’
मेरी पत्नी ने कहा-‘‘कोई छोटा पैकेट होता तो ठीक है। मैं तो वैसे भी इतना वजन नहीं उठा सकती। रास्ते में भी इसका ध्यान रखना संभव नहीं है।वैसे भी मैं भी आजकल स्वस्थ कहां हूं। वह तो मजबूरी मेें जाना है।
वह सज्जन बोले-‘अगर ऐसा है तो मैं आपको सूची देता हूं उस सामान की खरीद कर हमारी बेटी को देना।’
पिछला अनुभव मैं भूला नहीं था और उससे कहा-‘आजकल मेरे हाथ पांव मौसम की वजह से दर्द कर रहे है। मैं चल ही कहां पाता हूं। कोई छोटा सामान दो तो हम किसी के हाथ से भिजवा देंगे। हम बीमार आदमी को देखने जा रहे हैं और इस तरह किसी का काम करेंगे तो उनको लगेगा कि हम वहां पिकनिक मनाने आये है।
वह चले गये तब हमारी समझ में आया कि लोग अपने को बीमार किसी से काम निकालने के लिए ही धोषित करते हैं। हमें बाद में पता चला कि वह सज्जन पंद्रह दिन में तीन बड़े शहर घूमकर आ चुके हैं। जहां चार लोग मिलते हैं अपने को बीमार साबित कर एक दूसरे से हमदर्दी बटोरते हैं। हम चुपचाप सुनते हैं अपनी बीमारी का इस तरह सार्वजनिक घोषणा करना हमें नहीं आता। एक तरह से अच्छा भी है। कई बार मैंने देखा कि किसी बीमारी को याद करो तो वह आयी ही जाती है। उच्च रक्तचाप तो ऐसा है कि सोचो है तो वह होना ही है। कभी-कभी अपना पाठ लिखने के बाद मैं सोचता हूं कि थक गया हूं तो थकावट लगने लगती है।
अब यह पता नहीं है कि लोग अपने को बीमार घोषित कर लोगों की हमदर्दी जुटाने का सोचते हुए बीमार होते हैं या वाकई बीमार होते हैं। हां, इतना जरूर समझ गया हूं कि अच्छा स्वास्थ्य भी धन है जिसे दूसरों से छिपा कर रखना ही ठीक है।

3 Comments

  1. Posted May 29, 2008 at 6:36 PM | Permalink

    अच्छा स्वास्थ्य भी धन है जिसे दूसरों से छिपा कर रखना ही ठीक है।

    –ऐसा छिपा कर रख दिया कि अब मिल ही नहीं रहा. परेशान हो गया हूँ खोजते खोजते. :)

    -बहुत सही बात कह रहे हैं वैसे.

  2. Posted September 5, 2008 at 4:50 PM | Permalink

    aaj or kal ko mat k

  3. Posted September 5, 2008 at 4:52 PM | Permalink

    main kafi paresan ho gaya hu kiyuki meri moukri nahi lagarahi hai diploma bhi aisa kiya ki pucha nahi health and sanitary inspector ka jis main job lagigi to sirf mcd mai


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