मन के रोग का इलाज तो मन ही में है-आलेख


आयु में वह मुझसे चार वर्ष बड़ा है पर फिर भी उसकी मेरे से मित्रता बरसों पुरानी है। वह आर्केस्टा चलाता है। मैं कई बार विद्यालयों, महाविद्यालयों और सार्वजनिक स्थानों पर उसका कार्यक्रम सुन चुका हूं। उसने कभी मुझे स्वयं इस तरह के कार्यक्रमों में आमंत्रण नहीं दिया क्योंकि उसकी और मेरी मित्रता ऐसी भी नहीं रही। वह जब कहीं मिलता है तो उससे बड़ी आत्मीयता से बातचीत हेाती हैं। इस तरह मेरे चार मित्र हैं जो रास्ते पर मिलते हैं और आत्मीय रूप से बातचीत कर अलग हो जाते हैं। यह आर्केस्ट्रा चलाने वाला मेरा मित्र कैसे बना यह तो मै भी नहीं जानता। हां, इतना याद है कि कुछ वर्ष पहले मैं अपनी एक रचना देने अखबार में गया तो वह वहीं काम से खड़ा था तब उसकी और मेरी बातचीत शुरू हुई। बाद में तो वह उस अखबार के दफ्तर में भी आता रहा जहां मैं काम करता था।

एक हिंदी फिल्म का गाना है। शायद पड़ौसन का! इक चतुर नार, बड़ी होशियार………………..उस गाने को वह जिस तरह मंत्रमुग्ध ढंग से गाता है वह मन को छू लेता है। वह जब भी कहीं जाता है लोग इस गाने की फरमाइश अवश्य करते है।

उस दिन रास्ते चलते हुए उससे मुलाकात हुई। मुझसे कहने लगा-‘यार आजकल तो ऐसा लगता है कि अधिकतर लोगों को साइकिटिस (मनोचिकित्सक)की आवश्यकता हैं। आजकल लोग क्या बात करते हैं समझ में नहीं आता।’
मनोचिकित्सक शब्द से मैं सतर्क हो गया। मैने उससे पूछा-‘क्या हुंआ।’
वह बताने लगा कि-‘ ‘‘मैं अभी एक आदमी के घर उसके लड़के की शिकायत लेकर गया था। वह मेरे भाई से बेकार में लड़ता रहता है तो वह कहने लगा कि बचपन में उसके लड़के को सिर पर चोट लगी थी तो उसके दिमाग में खराबी पैदा हो गयी थी। अब बताओं भला ऐसा कहीं होता है। अच्छी तरह खाता पीता है, बात करता है। भला ऐसा कहीं ऐसा होता है’’?’
मैंने कहा-‘‘पर उसने जब स्वयं कहा है तो होगा? वह अपने लड़के की इस कमजोरी को स्वयं ही मान रहा है क्या यही कम है।’
उसने कहा-‘‘हां यह बात तो सही है। उस आदमी ने बरसों से स्कूटर तक नहीं चलाया। शायद यही वजह रही होगी, पर मैं उसे अकेले की बात नहीं कर रहा। ऐसा लगता है कि मांबाइल, कंप्यूटर और तथा अन्य आधुनिक साधनों के उपयोग से अधिकतर लोग कही मानसिक रोगों का शिकार तो नहीं हो रहे।’

मैंने हंसते हुए कहा-‘आप तो जानते हो कि किसी अन्य व्यक्ति को मनोरोगी बताकर मैं अपने को मनोरोगी घोषित नहीं करना चाहतां।’
वह जोर से हंसा-‘अच्छा! याद आया! वही जो तुमने मानसिक चिकित्सालय के बोर्ड पर लिखी बातों का जिक्र किया था। हां, मैं भी सोचता हूं कि इस तरह दूसरों को मनोरोगी मानना छोड़ दूं।’

मेरा एक अन्य लेखक मित्र है और वह एक दिन मनोचिकित्सालय गया था। वहां उसने एक बोर्ड पढा, जिस पर दस प्रश्न लिखे थे। साथ ही यहा भी लिखा था कि अगर इन प्रश्नों का उत्तर ‘हां’ है तो आपको मानसिक चिकित्सा की आवश्यकता है। मुझे वह सभी प्रश्न याद नहीं है पर जितने याद हैं उतने लिख देता हूं। उस लेखक मित्र की बेटी ने उसे ब्लाग तो बना दिया है पर उसने अभी उस पर मेरे कहने के बावजूद लिखना शुरू नहीं किया। जब वह लिखेगा तो उससे कहूंगा कि वह दस के दस प्रश्न वैसे ही लिख दे। उनमें से जो प्रश्न मुझे याद हैं वह नीचे लिख देता हूं।

1.क्या आपको लगता है कि आप सबसे अच्छा व्यवहार करते हैं पर बाकी सबका व्यवहार खराब है।
2.क्या आपको लगता है कि आप हमेशा सही सोचते हैं बाकी लोग गलत सोचते है।
3.क्या आपको लगता है कि आप दूसरों की सफलता देखकर खुश होते हैं और बाकी लोग आपकी सफलता या उपलब्धि से जलते है।
4. आप दूसरों का भला करते हैं पर सभी लोग आपका बुरा करने पर आमादा होते है।
5. क्या आपको लगता है कि आपकी नीयत अच्छी है अन्य सभी लोगों की खराब है।
6.आप सबसे अच्छा काम करते हैं पर उसकी कोई सराहना नहीं करता जबकि दूसरों के खराब काम को भी आप सराहते है।

मैने जब अपने मित्र की बात सुनी तबसे अपने आपको यह यकीन दिलाने का प्रयास करता हूं कि मैं मनोरोगी नहीं हूं। कई बार जब तनाव के पल आते है तब मैं सोचता हूं कि कहीं मैं मनोरोगी तो नहीं हूं तक यह प्रश्न अपने मन में दोहरात हूं साथ ही यह उत्तर भी कि नहीं। ताकि मुझे यह न लगे कि मै मनोरोग का शिकार हो रहा हूं।
अगर मैं कहीं ने लौटता हूं और मुझसे कोई पूछता है कि‘आपके साथ वहां कैसा व्यवहार हुआ?’
बुरा भी हुआ हो तो मैं कहता हूं कि‘अच्छा हुआ’
कोई पूछे-‘अमुक व्यक्ति कैसा है?’
मैं कहता हूं-‘ठीक है?’
अंतर्जाल पर कोई बात लिखते हुए कई बार यह स्पष्ट लिख देता हूं कि मैं कोई सिद्ध या ज्ञानी नहीं हूं जो मेरे विचार में परिवर्तन की संभावना न हो। इसके साथ ही यह भी बता देता हूं कि अपने लिखे का अच्छे या बुरे न होने का भार मै अपने मस्तिष्क पर नहीं डालता।
दूसरो का लिखा अगर समझ में न आये या अच्छा न लगे तब भी वहां नहीं लिखता कि यह ठीक नहीं है। सोचता हूं कि मुझे मुझे ठीक नहीं लगा तो क्या दूसरों को अच्छा लग सकता है। अगर किसी जगह प्रतिवाद स्वरूप टिप्पणी लिखनी तो जरूर लिखता हूं कि भई, आपके विचार पर मेरा यह विचार है परं और उससे पहले भी सोच लेता हूं कि वह बात इन प्रश्नों के दायरे ने बाहर है कि नहीं। प्रशंसा करना मनोरोग के दायरे में नहीं आता है पर आलोचना कहीं मनोरोग के प्रश्नों के दायरे में तो नहीं यह अवश्य देख लेता हूं।’

वैसे दूसरे क्या सोचते हैं यह अलग बात है। हां, अपने अंदर जरूर आजकल देखना चाहिए कि कहीं हम मनोरोग का शिकार तो नहीं हो रहे। हम जिस तरह विद्युतीय प्रवाह से चुंबकीय प्रभाव उत्पन्न करने वाली वस्तुओं का उपयोग कर रहे हैं उसको देखकर मुझे लगता है कि हमारे अंदर मनोरोगों का होना कोई बड़ी बात नहीं है। मैं डरा नहीं रहा हूं। हो सकता है कि शुरू में आप डर जायें पर एक बात याद रखें कि मनोरोगों की दवा भी मन में ही है और जब आप जान जायेंगे कि आप में उसका कोई अंश है तो बिना बताये अपना इलाज भी शुरू कर देंगे। जैसे मैंने अपने मित्र की बात सुनकर तय किया कि अब अपने मुख से अपनी प्रशंसा नहीं करूंगा और कोई करे तो उस पर नाचूंगा नहीं। किसी को अपने से कमतर नहीं बताऊंगा । अपनी वस्तु या पाठ को दूसरे के पाठ से श्रेष्ठ बताने का प्रयास से स्वयं परे रहूंगा। मन का इलाज मन से करने का प्रयास किया है अब सफल हुआ कि नहीं यह मुझे भी पता नहीं।

3 Comments

  1. chandan bhartiya
    Posted May 18, 2008 at 10:23 अपराहन | Permalink

    बहुत ही अच्छा.

  2. Posted May 18, 2008 at 11:06 अपराहन | Permalink

    इतना आसान नहीं है डैग्नोसिस, की एक साधरण इन्सान कुछ प्रश्नों को पढ़कर पता लगा ले. यह तो ऐसी विधा है जहाँ बड़े से बड़े अनुभवी विशेषज्ञ भी समस्या पहचान पाने में कभी-कभी गलती कर बैठते हैं.

  3. Posted May 18, 2008 at 9:22 PM | Permalink

    मन का इलाज मन से-बिल्कुल सही.


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