गिरने से पहले वह डालियां सीना तानकर खड़ी थीं

हम किसी बड़ी इमारत में ऐसी जगह बैठे हैं जहां दिन में भी बिजली जलाना पड़ती है। इस कारण चारों तरफ रोशनी बिखरी रहती है। खिड़किया खुली हैं और उन पर रंग बिरंगे पर्दे लहलहा रहे हैं। बाहर तेज गर्मी है और लोग अंदर ऐसी और कूलर में आनंद के साथ बैठकर एक दूसरे से बात कर रहे हैं। अचानक आंधी आती है। बहुत जोर की आंधी हमला करती हुई प्रतीत होती है तो सारा दृश्य बदल जाता है। बिजली चली आती है और खिड़कियां से पल्ले आपस में इतने भयानक रूप से लड़ते हैं जैसे भूतों की कोई फिल्म देख रहे है। खिड़किया बंद कर धूल को अंदर रोकने का प्रयास भी भयानक होता है। अचानक कांच टूटकर आदमी के शरीर पर आ गिरने का खतरा दिखाई देता है। बाहर भी अंधेरा अंदर भी अंधेरा। जो मन अभी दूसरों के साथ बैठकर अंदर बाहर प्रकाश की अनुभूति कर रहा था वह भी अंधेरे में बैठा दिखाई देता है। हंसी ठिठोली के साथ बात करते हुए लोग भयभीत हो जाते हैं। अगर कोई घर से बाहर है तो वह मोबाइल से फोन कर अपने परिवार वालों को सूचित करता है कि ‘मै इधर ठीक हूं तुम घर का ख्याल रखना’। बाहर वायु देवता के प्रकोप से उपजी आंधी चल रही है और मन में चिंताओं की चिता जल रही है।

सच मौसम की तरह जीवन है या यूं कहें कि जीवन की तरह मौसम है। कब मौसम बदले और कब जीवन का रूप कौन जानता है।

मैं रास्ते में स्कूटर पर हूं। आंधी से उड़ती धूल मुझ पर आक्रमण कर मेरी आंखों में प्रवेश कर चुकी है। वह धूल जो कई बार मेरे पांव तले रौंदी गयी है वह हवा के सहारे उड़कर मेरा मार्ग अवरुद्ध करती दृष्टिगोचर हो रही है वह शक्ति का प्रदर्शन कर बता रही है कि प्रतिदिन रौंदे जाने का आशय यह कतई नहीं है कि उसकी कोई शक्ति नहीं है। मैं रुकने के लिये इधर उधर देखता हूं। कुछ पेड़ खड़े दिखाई देते हैं। इनके नीचे कई बार वर्षा होने पर मैंने आश्रय लिया है। यह मेरे प्रतिदिन का मार्ग है पर आज अजनबी हो गया लगता है। मैं इन पेड़ों के नीचे आश्रय लेने की सोच भी नहीं सकता। अचानक वर्षा भी शूरू हो जाती है। मैं स्कूटर लेकर आगे बढ़ता जा रहा हूं। मुझे अपने अंदर ही लड़खड़ाहट का अनुभव होता है। आखिर एक बंद दुकान के नीचे रुकने का निर्णय करता हूं। वहां एक अन्य पथिक भी शायद आश्रय लेकर खड़ा है। मैं स्कूटर खड़ा कर वहां खड़ा हो जाता हूं। थोड़ी दूर पर एक बड़ा पेड़ है पर वहां से कोई खतरा नहीं है।

मैं खड़ा होता हूं, मेरे जेब में रखे मोबाइल में हरकत होती लगती है। मैं फोन उठाता हूं। एक मित्र का फोन है। वह कभी मेरा ब्लाग नहीं पढ़ता पर उसे पता है कि मैं लिखता हूं। अन्य पढ़ने वालों ने उसे बताया भी है। उसे यह भी पता है कि लाईट न होने पर कुछ भी लिखना कठिन है-यह बात मैने उसे बताई। वह कई बार मजाक में विषय भी सुझाता है। मैं फोन उठाता हूं वह हंसते हुए पूछता है-‘‘इस समय कहां हो। कहीं बीच रास्ते में तो नहीं हो। आज तुम्हारे ब्लाग का क्या होगा?‘‘

सूरज डूब चुका है और उसे यह पता है कि मैं रात्रि को घर जाने वाला होता हूं। मेरे मन में विद्रुप भाव उत्पन्न होते हैं और मैं शुष्क भाव से कहता हूं-‘‘तुम्हें मेरी फिक्र है या अपनी? हां मैं तुम्हारा कम कर दूंगा। आज रात मैं उससे शायद ही मिल पाऊं। घर पहुंचने में देर हो जायेगी। फिर पता नहीं आज घर से बाहर जाऊं कि नहीं।

उसने कहा-‘चले जाना यार, इस आंधी में लाईट तो अभी कहीं भी नहीं बन पायेगीं। तुम लिख तो पाओगे नहीं। चले जाओगे तो मेरा काम हो जायेगा।’

अचानक आंधी और तेज हो जाती है। मैने उससे कहा-‘‘मुझे अभी कुछ सुनाई नहीं दे रहा। तुम बाद में बात करना।’

मैने फोन बंद कर दिया। मेरे अंदर उस समय अपने बचाव के लिये संघर्ष के विचार घुमड़ रहे हैं। आंधी की गति ने कुछ दूर खड़े पेड़ की डालियां नीचे गिर पड़ीं। आधे धंटे तक आंधी ने अपना रौद्र रूप दिखाया। जैसे प्रकृति मनुष्य का ललकार रही हो और संदेश देती हो‘आ जाओ, मुझसे युद्ध करो।’

हमेशा अहंकार में डूबे मनुष्य दुबके पड़े हैं। आंधी थम गयी है बरसात भी हल्की हो रही है। मै चलने को उद्यत होता हूं। साथ वाला राहगीर कहता है-‘‘देखिये पल भर में क्या हो जाता है। हम मनुष्य कुछ समझते नहीं। प्रकृति की ताकत देखिये। यह पेड़ की डालियां किस तरह सीना तानकर खड़ी थीं और अब किस तरह आंधी ने उनको गिरा दिया। यह पते जो शान लहरा रहे थे कैसे जमीन पर आकर गिरे।’

मै हंस पड़ा फिर उससे कहा-‘‘पर यह डालियां आंधी आने से पहले सीना तानकर खड़ी थीं। यह पत्ते लहरा रहे थे। यह अपना जीवन जी रहे थे और उसे इन्होंने शान से जिया। यह गिरे यह नहीं बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि यह कैसे जिये? यह प्राणवायु का विसर्जन कर मनुष्यों को जीवन प्रदान करते थे। गिर गये हैं तो भी किसी के काम आयेंगे। कहीं अग्नि में जलकर किसी की रोटी का निर्माण भी करेंगे। आप कुछ देर में देख लेना इनको लोग उठाने आयेंगे और वह कोई इनके निकट संबंधी नहीं होंगे।’

वह आदमी हैरानी से मुझे देख रहा था। फिर बोला-‘‘आपने तो बहुत ऊंची बात कह दी।’

मैंने उसके उत्तर का जवाब नहीं दिया। मैंने कुछ देर पहले ही विकराल आंधी को अपने पास से निकलते देखा था और उस उबा देने वाले संघर्ष ने मेरे को व्यथित कर दिया था कि कुछ अधिक सोच भी नहीं सकता था।

2 Comments

  1. Posted May 15, 2008 at 6:27 PM | Permalink

    सच मौसम की तरह जीवन है या यूं कहें कि जीवन की तरह मौसम है। कब मौसम बदले और कब जीवन का रूप कौन जानता है।—– बिल्कुल सही कहा आपने …..
    रेगिस्तान में रेत को मुट्ठी में बन्द करने की कोशिश की , हाथ में कुछ न आया तो हथेली खोल दी और हवा में घुलती रेत के रूप को देख कर मुग्ध होना सीख लिया.

  2. snisha
    Posted May 30, 2008 at 5:15 AM | Permalink

    hi, nahut hi khub likha hai apne.


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