श्रृंगार रस में आधुनिक कवितायें-हास्य कविता

आया एक आशिक का ईमेल
लिख था उसमें
‘‘दीपक बापू, जिसको मैं चाहता हूं
वह पढ़ती है अंतर्जाल पर आपकी हास्य कविताएं
हम उसे ताकते हैं वह नहीं देखती हमारी तरफ
उसके दम पर ही आप हिट पाएं
हमारे सारे अंग उसे देखते हुए शिथिल हो जायें
उसे प्रभावित कर सकूं
ऐसी कोई हास्य कविता हमको भिजवायें’

पढ़कर पहले चौंकें दीपकबापू
फिर लड़खड़ाते हुए यह भेजा यह संदेश
‘पहले तो हम तुम्हें यह समझायें
हम तो हिट नहीं बल्कि  हैं फ्लाप
लिख नहीं पाते कुछ और
इसलिये रचते हास्य कविताएं
तुम किस गफलत में हो
नवयौवनाओं को भी भला कब हास्य रस से
सराबोर कविताएं दिल को भाएं
यह अलग बात हैं कि मजाक में
कुछ देर के लिये हंस जाएं
पर उससे कभी दिल न लगायें
तुम तो जाओ
किसी श्रृंगार रस के रचयिता के पास
जो तुम्हें दे सकते हैं कुछ प्रेम कविताएं
अरे, इश्क भी भला कभी बदलता है
हमेशा एक जैसा ही रूप चलता है
पर समय बदल गया है
अब तुम किसी नवयौवना को
ताजमहल जैसा नहीं
किसी कार  की तरह सुंदर बोलना
 चंचल और शोख बताते हुए किसी
मोटर सायकल से उपमा जोड़ना
वाणी को कोयल से नहीं
किसी मोबाइल की ट्यून से तोलना
चाहे कुछ भी हो जाये
हास्य कविता भेजने की मत सोचना
रच डालो श्रृंगार रस में आधुनिक कवितायें
हो सकता है उसको भायें


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