कुछ कुछ नहीं बहुत कुछ होता है-समीक्षा
गुना के बृजमोहन श्रीवास्तव जी का ब्लाग अब ब्लागवाणी, चिट्ठाजगत, नारद और हिंदी ब्लाग पर आ गया है। आज उन्होंने अपना एक व्यंग्य भी लिखा। हुआ यूं कि उन्होनें महीना भर पहले मेरे एक ब्लाग पर कमेंट लिखा था और कुछ उसमें ऐसी बात थी जो मेरे समझ में नहीं आ रही थी या कुछ ऐसा था जो मै ही सही नहीं लिख सका था। तब मैंने उनको एक ईमेल किया कि मैं तो कृतिदेव में लिखने वाला आदमी हूं और मुझे अब यूनिकोड में लिखने पर अपने मूलस्वरूप में नहीं लिख पाता इसीलिये कई बातों को वैसे नहीं लिख पाता जैसी मेरे दिमाग में होती हैं या छोड़ भी जाता हूं।
मैने अपने ब्लाग पर कमेंट के रूप में भी रखा और उनको ईमेल भी किया तो उनका पता मैं ही गलत लिख गया था याहू मे को इन होता है और मैं जल्दी में काम डाल गया था। खैर उसके अगले दिन ही मेरा श्रीअनुनाद सिंह जी के ब्लाग पर जाना हुआ और मैं वहां से कृतिदेव को यूनिकोड में बदलने वाला टूल उठा लाया। उसके परिणाम से मेरी बाछें खिल गयीं होंगी-क्योंकि कंप्यूटर में को कांच तो होता नहंीं कि अपने को देख सकें-ऐसा मेरा अनुमान है। बहरहाल मैंने अपना लिखना एक तरह से दोबारा शूरू किया पर श्रीवास्तव जी का कमेंट भी पिछली पोस्टों पर आ रहा था। तब मुझे लगा कि नयी पोस्टों पर न आने का सीधा कारण यह है कि यह कोई मित्र ब्लागर है जो नाम बदलकर मुझे प्रेरित कर रहा है। इस पर एक दो कविता और आलेख भी लिख डाले। हालांकि यह भी सच है कि वह अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं है। कुछ दिन से सभी ब्लागों पर कुछ ऐसे कमेंट आ जाते है और लगता है कि कोई मित्र हैं क्योंकि वह कमेंट या मित्रवत होते हैं यह कुछ लिखवाने के लिये।
मैंने तो श्रीवास्तवजी को साफ लिख दिया कि आप कोई ब्लागर हैं और यह मेरा दावा है। अगले दिन ब्लागस्पाट पर उनके कमेंट से मैने उनका ब्लाग पकड़ लिया। उसके बाद ईमेल से उनको कहा कि आ जाईये इन चैपालों पर यहां बहुत लोग है जो आपके मित्र बनेंगे। इसके लिये भी एक नहीं दोतीन बार कहना पड़ा और आखिर कल उन्होंने कहा कि आप ही पंजीयन करा दीजिये। सो ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत को ईमेल किये और श्रीवास्तव जी का बता दिया कि चिट्ठाजगत पर तो आज ही आपका चिट्ठा आ जायेगा पर ब्लागवाणी पर एकदो दिन लग सकता है। मगर मात्र दस मिनट के अंदर ही दोनों से सूचना आ गयी और फिर हमने उनके ब्लाग पर देखा तो कमेंट आने का सिलसिला भी शूरू हो चुका था।
कल मुझे अपने पुराने दिनों की बहुंत याद आयी। कंप्यूटर पर ब्लाग लिखना शुरू करने से ही सब नहीं आ जाता। बड़े शहरों में सिखाने वाले बहुत हैं इसलिये संभव है उनको थोड़ी आसानी होती है छोटे शहरों में बहुत समस्या आती है।
हालांकि जब कोई ब्लाग पर लिखता है अनजाने में कोई कारिस्तानी कर जाता है तो लोग समझते हैं कि वह तो बहुत चालाक है जैसे कि हमारे बारे में समझ लिया गया था और लोगों को लगा कि हम नारद पर पंजीयन को लेकर अज्ञानता का नाटक कर रहें हैं। श्रीवास्तव जी तो कमेंट लगाते रहे और फिर अपने नाम के अंगे्रजी शब्द डालकर उसे पकड़ते रहे तब हमें लगा कि यह तो बहुत हमसे अधिक तेज हैं कभी हमने भी ऐसे शब्द पकड़ कर अपने ब्लाग को नहीं देखा। इसके बाद उन्होंने लिखा कि आपकी नयी पोस्ट कैसे देखें आप हमें बतायें तब लगा कि उन्होंने अपनी शुरूआत ही ऐसे की होगी कि कैसे अपने ब्लाग पकडे जायें और हमने इसीलिये नहीं कि इधर लिखने में लगे रहे। मै इसका जिक्र अपने आलेखों में कर चुका हूं यह भी लिख चुका हूं कि मुझे इनमें कोई आपत्तिजनक नहीं लगा।
उनके हर कमेंट पर मै जवाब लिखता था क्योंकि वह अपनी कमेंट लगाकर मेरे लेख में कुछ ऐसा जोड़ते थे जो उसमें नहीं होता था। कमेंट भी इतने लगा चुके हैं कि मुझे लगता है कि वह कहीं कमेंट किंग की पदवी अपने नाम न करा लें। सच तो यह है कि मैं अब सोचने लगा हूं कि अब तो एक भी शब्द निरर्थक लिखने की गुंजायश नहीं है। अब तो सीधे यूनिकोड में लिखने वाला बहाना नहीं चलेगा और श्रीवास्तव जी एक-एक लाईन पढ़ते हैं और जहां गलती होती है वहंा बताते है। ऐसे में अब चैकस होकर लिखना पड़ेगा। यह प्रेरणा मुझे उनकी कमेंट से मिली है। इसलिये ऐसा भी लगता है कि कमेंट लगाने वाले का भी ब्लाग लेखक से कम महत्व नहीं है और जो अंतर्जाल पर इन ब्लाग को पढ़ते है वह कमेंट भी पढ़ें। कई कमेंट ब्लाग की पोस्ट की सार्थकता और आकर्षण बढ़ा देते है। श्रीवास्तव जी तथा कुछ अन्य ब्लागरों की कमेंट देखकर मेरी यही धारण बनी है।
विभिन्न फोरमों पर सक्रिय ब्लागर मेरी मदद करते रहे हैं हालांकि इसमें विलंब यूं हो जाता है जब कोई अपनी समस्या रखता है तब ही उसे लोग बताने जाते हैं। पर करते तो हैं यह भी मेरा यहंा का अच्छा अनुभव रहा है। मुझे ब्लागस्पाट के व्यूज देखने के लिये एक पोस्ट लिखने के बाद श्री आलोक जी ने एक काउंटर की जानकारी भेजी पर तब तक पता नहीं मेरे कितने व्यूज हुए इस जानकारी से वंचित हो चुका था पर अब उससे मुझे पता लगा जाता है कि कितने व्यूज हुए और विचार करने का अवसर मिलता है। छोटे शहरों में यह समस्याऐं आती है जिसका अंदाजा वही कर सकता है जो उसका सामना कर चुका होता है। यह तो मैं अपनी किस्मत कहूंगा कि मैं उस समय फोरमों पर गया जब श्रीअनुनादसिंह जी का ब्लाग एक दम वहंा आया ही था और मुझे कृतिदेव का टूल मिल गया नहीं तो शायद कभी नहीं मिलता और मैं भी ऐसे टूलों के चक्करों में इतना समय बरबाद कर चुका था कि किसी ऐसे आदमी के कहने पर नहंी उठाता जिसे पर मुझे यकीन नहीं होता। मैं अपने अनेक आलेखों में यूडिकोड में लिखने में अपनी परेशानी का जिक्र कर चुका था और जब मुझे यह टूल मिला तो एक तरह से ब्लागिंग का दूसरा दौर शुरू किया। इस तरह देखा जाये तो मैं और श्रीबृजमोहन श्रीवास्तव दोनों ही नये लिखने वाले हैं। वैसे धीरे-धीरे मैं उनको जितना ज्ञान है वह दूंगा पर मैं यह सारे पुराने ब्लागरों से कहूंगा कि आप लोग इस बात का ध्यान रखें कि अगर आपको लगता है कि किसी ब्लागर के ब्लाग में कोई कमी है जो उसे बताते हुए वह जानकारी भेजें जिसका लाभ वह उठा सकें। मैंने यह लेख श्रीवास्तव जी को लेकर इसीलिये लिखा कि जैसे मेरे लिये यह एक कहानी हो। बहुत समय तक तो मैं उनको छद्म ब्लागर ही समझ रहा था उनका लिखा देख यह सोचता था कि आखिर वह कौन हो सकता है?
अब चूंकि कृतिदेव में लिखता हूं तो लेख बड़ा हो रहा है पर सभी ब्लागरों से अनुरोध है कि इसी तरह सहयोग का वातावरण बनाये रखें। हम बहुत सीख गये हैं पर अभी बहुत कुछ सीखना है और फिर नये ब्लागरों को भी सिखाना है और तभी हम लोग अंतर्जाल पर हिंदी को सही रूप में स्थापित कर पायेंगे। श्रीवास्तव जी का ब्लाग देखकर मुझे इस बात की खुशी हुई कि जिस तरह चिट्ठाजगत, ब्लागवाण, नारद और हिंदी ब्लाग ने नये ब्लागरों को प्रोत्साहित करने का सिलसिला शुरू किया है वह प्रशंसनीय है।श्रीवास्तव जी पुराने लेखक है और पहले भी अंतर्जाल पर ब्लोग पर कमेंट लगाते रहे है और मेरा मानना है कि वह यहां बहुत ख्याति अर्जित करेंगे यह उनके लिखे को देखकर कोई भी कह सकता है।
उनके ब्लाग का पता है
कुछ कुछ नहीं बहुत कुछ होता है
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शायद आपने चिट्टे के लिंक का पता यह दे दिया है
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जब कि होना चाहिये
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