शेर के इंतजार में उम्र न निकल जाये-हास्य कविता
पार्क में घूमती हुई लड़कियों को
उस लड़के ने छेड़ा
‘हम तुम इक कमरे में बंद हों
और शेर आ जाये
उससे कहूं पहले मुझे खा जाये’
एक लड़की ने उसकी हरकत देखकर कहा
‘अभी तक तुम्हारी सुई चालीस बरस
पहले गाने पर ही अटकी हुई है
उसके बाद जमाने में बहुत तरक्की हुई है
कहां आयेगा तेरे कमरे में शेर
अब तो जंगल में भी नहीं दिख पाता
लगता है तुम अखबार नहीं पढ़ते
तहस नहस हो रहे पर्यावरण और
प्रेम के बदलते रूप को नहीं समझते
कहीं और अपना दांव आजमाओ
कहीं शेर के इंतजार में
तुम्हारी शादी की उम्र नहीं निकल जाये
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This entry was written by
दीपक भारतदीप, posted on
April 21, 2008 at 4:12 PM, filed under
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2 Comments
वाह दीपकजी मजा आगया -लेकिन लडकी गलत गाना गा रही थी गाना इस तरह से है “” शेर से मैं कहूं मुझको छोड़ दे ,तुझे खा जाए”"कुछ लोग गलत गाते ही हैं एक वो गाना भी है जिए तो जिए कैसे – उसमें ++विन आपके “” नहीं है -=सही है “”संग आपके “”