सहज भाव वाले लोग ही कविता लिख पाते हैं

एक दिन मैं अपने एक मित्र के साथ खड़ा था तो एक सज्जन वहां आये। उस समय मैं और मेरे मित्र अखबारों मे छपी किसी खबर पर चर्चा कर रहे थे। बातों ही बातों मे सज्जन बोले-‘‘अरे यार, आजकल अखबारों में भी मजा नहीं आता। उस दिन मैं एक कविता पढ़ रहा था। अब हमारे साथ रोजमर्रा जो होता है उसे लोग कविता के रूप में लिख देते हैं। यह भी भला कोई बात हुई। अगर हम लिखने बैठें तो एसी दस कविता लिख जायें।’’

मेरा वह मित्र मेरे कविता लिखने का विरोधी है और अक्सर गद्य ही उसे पसंद आते हैं पर उस समय पहले तो वह मेरी तरफ देख कर मुस्कराया फिर उन सज्जने से बोला-‘‘तुम फिर लिखते क्यों नहीं। तुम्हारे घर में इंटरनेट कनेक्शन है और यह मेरा दोस्त तुम्हें ब्लाग बनाना सिख देगा। तुम कविता लिखो तो हम तुम्हें कमेंट भी लगा देंगे हालांकि इसके ब्लाग पर एकाध पर ही कमेंट लगाया है पर तुम्हारे पर रोज  लगाया करेंगे।’’

वह सज्जन एक दम झेंप गये और बोले-‘‘यार इसके लिये हमको टाईम कहां मिलता है।’’

हमारे मित्र ने कहा-‘‘क्यों? अखबार पढ़ने का टाईम कुछ कम कर लेना और उसके बदले लिख लेना। यह हमारा मित्र खूब कविताएं लिखता है और हमें बहुत अच्छी लगतीं हैं। इसका कविता लिखना हमें इसलिये पसंद नहीं है क्योंकि इसके लेख और व्यंग्य ही हमें अच्छे लगते हैं। वैसे कहना सरल है पर कविता लिखना भी कोई आसान काम नहीं है।’’

वह सज्जन बोले-‘‘टाईम हो तो सब किया जा सकता है।’’
हमारे मित्र ने कहा-‘‘टाईम का नहीं इच्छा का सवाल है और वह न तुम में है और न मुझमें पर मैं मान रहा हूं तुम मानोगे नहीं। दूसरे के काम की आलोचना करना या टिप्पणी करना आसान है।’’

वह सज्जन बातचीत का विषय बदल गये और फिर कुछ देर मैं और मित्र वहां से उठकर चले गये। उसके जाने का बाद मैंने उससे कहा-‘‘यार, तुम्हें क्या जरूरत पड़ी थी बहस बढ़ाने की। वह कह रहा था मान लेते। ख्वामख्वाह मेरी प्रशंसा करने से क्या लाभ?’’

मेरे मित्र ने कहा-‘‘जब तुम और मैं किसी विषय पर बातचीत कर रहे थे तो उसे बिना सोचे समझे बीच में बोलना नहीं था अपनी  बात  वह कहकर चला जाता। अपने काम से फुर्सत नहीं है दूसरों पर टिप्पणियां करते हैं।

अगर उन सज्जन ने मुझे अकेले में यह बात कही होती तो मैं उनको कोई उत्तर नहीं देता क्योंकि मेरा मानना है कि इस देश का हर आदमी अपने को ब्रह्मज्ञानी समझता है। जीते तो सीना तानकर चलते हैं और हारे तो फिर पुराने ग्रंथों का ज्ञान बघारने लगते हैं। बात कविता की हो रही थी। कई लोग कविताओं को देखकर नाकभोंह सिकोड़ते हैं और शायद कई रचनाकार कविता लिखने से  कतराते हैं। पहले मैं भी कतराता था पर समय के साथ मैंने कुछ कविताऐं ऐसी पढ़ीं जो हृदय में घर कर गयीं। मेरे को एक कविता की पंक्तियां  जो मैंने एक पत्रिका में पढ़ी थी और मेरी स्मृति अगर ठीक है तो वह श्री राजेंद्र यादव की थी को यहां पढें अगर किसी अन्य की हो तो सूचना दें उसके लिये क्षमा याचना करूंगा।

पैरो तले रोंदे जाने पर
ऊपर को उठती है
हम से तो यह धूल ही अच्छी जो
कुचले जाने पर प्रतिरोध तो करती है

हो सकता है कि कविता के कुछ शब्द मैं इधर-उधर लिख रहा होऊं पर उसका भाव मुझे कभी भुलाये नहीं  भूलता। मुझे इस कविता ने बहुत प्रभावित किया और तब लगा कि अगर कथ्य दमदार हो तो उसके लिये किसी बहुत बड़े गद्य की जरूरत नहीं होती। यहां मै कहना चाहूंगा कि

मन में बैठे शब्द तो
पानी की तरह बहते हैं
बाहर नही आने दिया तो
सड़ांध फैलाते  मन में
कविता की धारा बहने दो
चले जाओ रचना के वन में
जमाने का दर्द उसे ही लौटा दो
भला हम उसे क्यों सहते हैं

निष्कर्ष यह है कि कविता लिखना लोगों को सरल लगता है फिर सब क्यों नहीं लिखते। शिक्षित बहुत हैं पर कवित्व मन सभी का नहीं है। इसका एक पक्ष यह भी है कि जो सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों पर प्रभावपूर्ण ढंग से कविता लिखते हैं वह लोगों के दिमाग में बहुत प्रभाव डालते है। सहज भाव वाले ही कविता लिखते हैं और जो कविता लिखते हैं वह सहज भाव के हो जाते है।


2 Comments

  1. Posted अप्रैल 16, 2008 at 4:09 PM | Permalink

    सहज भाव वाले ही कविता लिखते हैं और जो कविता लिखते हैं वह सहज भाव के हो जाते है।

    इसमे तो कोई दो राय नही है।

  2. shubhashishpandey
    Posted अप्रैल 17, 2008 at 12:21 PM | Permalink

    kuchh bhi likhna aur kavita likhne me antar hota hai, kavita tabhi nikalti hai jab hriday use mahsus karta hai . kaivta me dum ho to jo sahbd aap roj sunte hain wahi shabd kavita me kabhi aaso la dete hain to kabhi hasa hasa ke pagal kar dete hain


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