जिंदगी के आसरे-कविता

जिंदगी के सफर में
कभी जाने तो कभी अनजाने चेहरे
मिल जाते
सभी देते हैं अपनी जुबान से
वक्त पर काम आने का भरोसा
पर निभाते हैं वही
जिनसे हम कभी कभी ही मिल पाते

अपने लोगों की पहचानी भीड़ में
शामिल हम इसलिये होते
ताकि उनके भरोसे
रात का चैन की नींद सो सकें
पर जब यह भरोसा
समय आने पर 
दिल का भ्रम लगता है
तक घिर जाते हैं मुसीबत में
तब  भी
कोई होता है अजनबी जिसमें
हमारे लिये दर्द होता
और वही देता है सहारा
अपनों से वफा की उम्मीद नहीं हो
पर यकीन कर लेता
गैरों के मन में घर
जिसके सहारे दुनिया के आसरे टिक जाते
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2 Comments

  1. mehhekk
    Posted अप्रैल 6, 2008 at 9:43 अपराहन | Permalink

    bahut sahi apno se jyada paraye hi kabhi bahut kaam aate hai,bahut sundar kavita.

  2. Posted अप्रैल 16, 2008 at 8:17 अपराहन | Permalink

    ६ तारीख की कविता आज पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ -बिल्कुल साधारण किंतु गंभीर -नाविक के तीर – हकीकत -जीवन से जुड़ी हुई अनुभब की गई व प्रत्येक के अनुभब में नित्य आती हुई -अपनों से सहारे की उम्मीद न होने पर भी यकीन करना कितना वास्तविक और स्वभाबिक है =असल में दीपक जी बात क्या है की किसी सौन्दर्य प्रेमी के लिए कविता विलास या कौतूहल तृप्ति का साधन हो सकती है मुझे जीवन के सूक्ष्म और यथार्थ चिंतन -समाज का वर्तमान चरित्र प्रतिपादित करती रचनाएँ आकर्षित करती है इसलिए दुष्यंत कुमार -कृष्ण बिहारी नूर के बाद आपकी रचनाओं पर निगाह टिकी है कविताओं में आपके लेख भी शामिल हैं


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