पेट में खाया कौन देखता है-आलेख

समाज के नाम पर सभी पुरानें रीतिरिवाजों को लोग इसलिये अपनाये हुए है कि उसमे अगर उनका कभी खर्च होता है तो कभी प्राप्त भी होता है। अगर लड़की की शादी में व्यय करते हैं तो लड़के की शादी में मिलता भी है। इसलिये आपने देखा होगा कि सभी लोग दहेज प्रथा का विरोध करते हैं पर फिर भी इसका अस्तित्व बना हुआ है और नित-प्रतिदिन इसमें आधुनिक वस्तुओं का समावेश होता जा रहा है।

जिस तरह कुऐं का मेंंढक कभी कुएं से बाहर नहीं निकलता वैसे ही भारत के लोग भी हैं। परिवार छोटे हैं तो क्या तनाव फिर भी कम नहीं हो रहा। लड़का है तो उसके रोजगार की चिंता है ताकि उसका विवाह कराया जा सके और लड़की है तो भी उसे आजकल उच्च शिक्षा दिलानी पडती हैं। शादी का होता है एक दिन पर उसके लिये आदमी और औरत अपनी पूरी जिंदगी दाव पर लगा देती हैं। वैसे तो महंगाई बहुत है पर इसके बावजूद कुछ लोग जो अच्छा खा सकते हैं वह भी पैसे बचाने के लिये अपनी सेहत दाव पर लगा देते है। कुछ लोगों का तो दर्शन यह है कि ‘पेट में खाया कौन देखता है इसलिये जोड़ना चाहिए समाज में तभी इज्जत बनती हैं’।

ऐसे दर्शन से प्रतिबद्ध लोग अपने जीवन से खिलवाड़ करते मैने देखे हैं। मगर होता क्या है? आखिर में उनके पैसे पर डाक्टर मजे करते हैं। ऐसे में भी वह अपना दर्शन बघारते हैं कि ‘देखो पैसा बचाकर रखा तो समय पर काम आया न!’’

ऐसे में बिस्तर पर लैटे मरीज से क्या कहो कि‘यही बचत तुम्हें इस अस्पताल में लायी है। पीलिया आखिर किस कारण से होता है? खून की कमी के कारण ही न!’

उस दिन एक सहªदय महिला मिली तो वह कह रहीं थीं‘‘अपनी बहिन के यहां गयी थी। उसे पीलिया हो गया है। अभी तो वह अस्पताल में भर्ती है कल छुट्टी मिलने वाली है। आप अपने होम्योपैथी वाले दोस्त डाक्टर का पता दो वहां उसको ले जाऊंगी। मैं पहले ही उससे कहती थी कि कुछ खाया पीया कर। नहीं मानती। बस पैसा बचाना है और अब भी अस्पताल में पैसा खर्च होते देख परेशान है। मैने भी आज गुस्से में कह दिया कि मर गयी तो कौन करायेगा तेरे बच्चों का ब्याह? मेरे घर के खाने पर भी कहती थी कि खाने पर इतना पैसा खर्च मत किया करो। आज तो मैंने कह दिया कि तेरे रास्ते चलती तो मुझे भी यही आना पड़ता।

यह कोई अकेली घटना नहीं हैं। कई ऐसा लोग है पर उनका दोष भी नहीं है। जो जीवन सरलता के जिया जा सकता है उसे लोगों ने कठिन बना दिया है। आदमी अपने घर-परिवार से बाहर कुछ सोच भी नही सकता। बच्चें को पढ़ाना लिखाना तो ठीक पर उसके विवाह को लेकर चिंता और खुशी दोनों ही उसके पूरे जीवन के आनंद का हरण कर लेती है। बस बच्चों के आसपास ही वह अपना जीवन घूमते देखना चाहता है। लड़की के लिये दहेज देने के साथ जो अपमान झेलना पड़ता है और लड़के के पक्ष में होने पर वही दूसरों के साथ करने में आनंद आता है। इसलिये इस ठहरे समाज में कोई परिवर्तन नहीं आता क्योंकि कुऐं के मेंढक एक हो या झुंड उनकी आदत तो एक जैसी ही रहनी है। चाहे भी कोई भी नयी चीज आये लोग दहेज में उसे पाना चाहते हैं। यानि कोई जिंदगी में कोई किसी को न तो सरलता से जीने देना चाहता है न अपने लिये सरलता चाहता है।

One Comment

  1. Posted April 2, 2008 at 7:28 PM | Permalink

    दीपक जी आज कुछ ऎसा हुया हे, जिस से कई बार मे सोचता हु कही मे फ़िजुलखर्च तो नही,फ़िर बहुत कुछ सोचा, इन सब के बाद दिमाग मे जॊ बात आई लिखना चाहता था लेख मे, लेकिन जब नेट पर आया ओर आप का लेख पढा तो जबाब मिल गया, बहुत उचित लगा आप का लेख लेकिन बात आप की ठीक हे लोग यही कहते हे,पेट में खाया कौन देखता है,अरे भाई जिन्दगी एक बार ही आनी हे आज दोबारा नही आना फ़िर मस्ती से जी भर कर जियो


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