ब्लोग पर कमेन्ट को ही गुलाल और पकवान समझना-हास्य कविता
अंतर्जाल पर अपनी प्रेमिका को
लुभाने के लिए ब्लोग पर कवितायेँ लिखते-लिखते
ब्लोगर बन गए उस शख्स ने
अपनी प्रेमिका के ब्लोग पर लिखा
”यह कमेंट अपने व्यस्त समय से निकालकर
तुम्हारी कविता पर लगा रहा हूँ
इसे होली के गुलाल की तरह समझना
अंतर्जाल पर तो बहुत बात हो गई
अब अपने घर का पता दो
मैं चाहता हूँ तुमसे और परिवार से मिलना”प्रेमिका ने किसी सहेली से उधार
लेकर कुछ कवितायेँ लिखी थीं
कभी वह ब्लोगर से नहीं मिली थी
टाईम पास के लिए ही
उसने ब्लोगर से इश्क रचाया था
कई दिन से वह अपने इश्क के लिए
बने ब्लोग से भी बोर हो चली थी
अंतर्जाल की माया से थी वाकिफ
वैसे तो बहुत घरेलू पत्नी पर
फुरसत में मनचली थी
ब्लोगर के प्रस्ताव से घबडाई
कंप्यूटर पर अपनी सलाहकार सहेली लो बुला लाई
और ब्लोगर के लिए लिखा कमेन्ट
”मैं भी लिख रही हूँ कमेन्ट
इसे कमेन्ट नहीं पकवान समझना
पढ़कर ऐसे ही एन्जॉय करो जैसे खाया हो
मैं भी बिजी हूँ
अब आ गयी होली और
शुरू होंगे इम्तहान
नहीं होगा टाईम
पढाई से दूर होने का
नहीं कर सकती क्राईम
और मुझे भी है आगे पढ़ना”पढ़कर गुस्से में ब्लोगर चिल्लाया
”यह अंतर्जाल पर कैसी है माया
बिना आत्मा के शब्द हैं काया
यह क्या बात हुई मैं कहता हूँ
कमेन्ट को गुलाल समझना तो
वह कहती है कि
कमेन्ट को ही पकवान समझना”
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नोट-यह हास्य कविता काल्पनिक है और किसी व्यक्ति या घटना से इसका कोई संबंध नहीं है और किसी से मेल खा जाये तो वही इसके लिए जिम्मेदार होगा.————————————–
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बहुत बढिया!!
पढ़कर गुस्से में ब्लोगर चिल्लाया
”यह अंतर्जाल पर कैसी है माया
बिना आत्मा के शब्द हैं काया
यह क्या बात हुई मैं कहता हूँ
कमेन्ट को गुलाल समझना तो
वह कहती है कि
कमेन्ट को ही पकवान समझना”
wah wah !
bahut khuub!
achchee hasya kavita hai.
होली की शुभकामनाएं.. :)