संत कबीर वाणी:सेवा के बदले दाम मांगे वह सेवक नहीं
फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम
कहैं कबीर सेवक नहीं, कहैं चौगुना दाम
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो मनुष्य अपने मन में इच्छा को रखकर निज स्वार्थ से सेवा करता है वह सेवक नही क्योंकि सेवा के बदले वह कीमत चाहता है।
आज के संदर्भों में व्याख्या -हमने देखा होगा कई लोग समाज की सेवा का दावा करते हैं पर उनका मुख्य उद्देश्य केवल आत्मप्रचार करना होता है। कई लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने नाम से सेवा संस्थान बना लिए है और दानी लोगों से चन्दा लेकर तथाकथित रूप से समाज सेवा करते हैं और मीडिया में अपनी ‘समाजसेवी” की छवि का प्रचार करते हैं ऐसे लोगों को समाज सेवक तो माना ही नहीं जा सकता। इसके अलावा कई धनी लोगों ने अपने नाम से दान संस्थाए बना राखी हैं और वह उसमें पैसा भी देते हैं पर उनका मुख्य उद्देश्य करों से बचना होता है या अपना प्रचार करना-उन्हें भी इसी श्रेणी में रखा जाता है क्योंकि वह अपनी समाज सेवा का विज्ञापन के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
Filed under: Blogroll, Deepak bharatdeep, E-patrika, aducation, arebic, bharat, edcation, friednds, hindi megazine, hindi sahitya, hindi writer, kabir, web bhaskar, web dunia, web duniya, web jagaran, web pajab kesari, web times, आध्यात्म, आलेख, दीपक भारतदीप, धर्म, भारत, शिक्षा, संस्कार, समाज, साहित्य, सृजन, हिंदी साहित्य
दीपक जी,बहुत सही व सटीक विचार प्रेषित किए हैं।आभार।