खुद ही बहकते हैं लोग-हिन्दी शायरी

अपने लिखने से मैं दुनिया बदल सकता
तो ऐसा भी लिखता
अगर मेरे किसी खास ढंग पर
ऐतबार करते लोग
तो वैसा भी दिखता
जमाने की हवाओं में बहते लोग
खुद ही बहकते लगते हैं
अनजान खौफ से सहमें रहते हैं
किसी में किसी पर भरोसा नहीं दिखता
कमजोर जजबातों मुझे नहीं सुहाते
इसलिए मैं उन पर कुछ नहीं लिखता
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चिल्लाकर बोलने की
आँख फाड़ देखने की
कान से ऊंची आवाज सुनने की
कोशिश करता आदमी
कुछ बोल पाता
कुछ देख पाता
कुछ सुन पाता
अगर अपनी अक्ल पर काबू रखता आदमी
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4 Comments

  1. mehek
    Posted March 13, 2008 at 6:12 PM | Permalink

    अनजान खौफ से सहमें रहते हैं
    किसी में किसी पर भरोसा नहीं दिखता
    कमजोर जजबातों मुझे नहीं सुहाते
    इसलिए मैं उन पर कुछ नहीं लिखता
    wah behtarin,aafarin

  2. Posted March 20, 2008 at 5:05 AM | Permalink

    अपने लिखने से मैं दुनिया बदल सकता
    तो ऐसा भी लिखता
    अगर मेरे किसी खास ढंग पर
    ऐतबार करते लोग
    तो वैसा भी दिखता
    जमाने की हवाओं में बहते लोग
    खुद ही बहकते लगते हैं
    ” bhut sunder alfaaj or bhav”

  3. Posted February 8, 2009 at 10:50 PM | Permalink

    KAUD PE BHAROSA HAI TO, KHUDA TERE SAATH HAI, APNO PE BHAROSA HAI TO,
    HAR DUAA SAATH HAI, ZINDAGI SE KABHI MAT HARNA ‘A DOST’ JAB TAK TUMAHARA YE
    ‘DOST’ TERE SAATH HAI,

  4. atul mohan samdarshi
    Posted October 14, 2009 at 9:38 AM | Permalink

    prayas sarahniya hai


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