खुद ही बहकते हैं लोग-हिन्दी शायरी
अपने लिखने से मैं दुनिया बदल सकता
तो ऐसा भी लिखता
अगर मेरे किसी खास ढंग पर
ऐतबार करते लोग
तो वैसा भी दिखता
जमाने की हवाओं में बहते लोग
खुद ही बहकते लगते हैं
अनजान खौफ से सहमें रहते हैं
किसी में किसी पर भरोसा नहीं दिखता
कमजोर जजबातों मुझे नहीं सुहाते
इसलिए मैं उन पर कुछ नहीं लिखता
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चिल्लाकर बोलने की
आँख फाड़ देखने की
कान से ऊंची आवाज सुनने की
कोशिश करता आदमी
कुछ बोल पाता
कुछ देख पाता
कुछ सुन पाता
अगर अपनी अक्ल पर काबू रखता आदमी
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अनजान खौफ से सहमें रहते हैं
किसी में किसी पर भरोसा नहीं दिखता
कमजोर जजबातों मुझे नहीं सुहाते
इसलिए मैं उन पर कुछ नहीं लिखता
wah behtarin,aafarin
अपने लिखने से मैं दुनिया बदल सकता
तो ऐसा भी लिखता
अगर मेरे किसी खास ढंग पर
ऐतबार करते लोग
तो वैसा भी दिखता
जमाने की हवाओं में बहते लोग
खुद ही बहकते लगते हैं
” bhut sunder alfaaj or bhav”