अभिव्यक्ति और भंड़ास-हास्य व्यंग्य

लोग दोस्तों से नाखुश रहते हैं कि वह मदद नहीं करते पर मुझे कभी ऐसी शिकायत नहीं होती क्योंकि वह मुझे ऐसे विषय देते है और मैं पर लिख पाता हूँ। अंतर्जाल पर ब्लोगर और निजी मित्रों की वजह से चल पा रहा हूँ। निजी मित्रों की बातचीत से विषय मिलते हैं और ब्लोग पर लिखता हूँ और कमेन्ट देने वाले होंसले बढाते हैं-जो मेरे लिए सोच समझकर अच्छा लिखने की चेतावनी की तरह होती है। ऐसा लगा रहा है कि ब्लोगर मित्र आज छुट्टी पर हैं क्योंकि उनके नियमित कमेन्ट नहीं मिले तो सोचा आज चाहे जो लिख डालो और कौन पढता है। हम कोई मीडिया में लोकप्रिय तो हैं नहीं कि लोग निरर्थक और बेकार लिखने का आरो लगा देंगे। वैसे भी अब ऐसा लग रहा है कि अपने पढ़ने वाले कम होते जा रहे हैं सो आज अपनी भंडास निकल लूं।

हुआ यूं कि उस दिन हम एक निजी संस्थान में काम से गए। वहाँ बातचीत हो रही थी इसी मीडिया पर। उनमें एक सज्जन ऐसे थे जो परिचित थे और हमसे दीपक भारतदीप का चिंतन ब्लोग का पता ले गए थे और वह इसलिए हमने उनको दिया था कि वह पत्रिकाओं में हमारे चिन्त्तननुमा आलेखों को पसंद करते हैं। कभी-कभी वह पढ़ते हैं और कभी नहीं। एक-दो बार हमने पूछा तो कहते हैं ”यार, टाईम कहाँ मिलता है। जब मिलता है तो देख लेता हूँ।”

हम कुछ देर वहाँ वार्तालाप में अपने लिखने के लिए कोई सामग्री ढूँढने लगे। वही सज्जन बोले-”आजकल मीडिया तो लोगों को पागल समझ रहा है। समाचार चैनल खोलो लगता है तो जैसे अखबारों में गासिप पढ़ रहे हैं और अखबार पढों तो लगता कामिक्स पढ़ रहे हैं। किस खिलाडी का किससे चक्कर चल रहा है? कौन खिलाड़ी किस मंदिर जा रहा है। किस अभिनेता को जुकाम हो गया और किस अभिनेत्री को छींक आ रही हैं। बस यही दिखाते हैं। सुबह अख़बार में भी वही होता है। आखिर यह प्रचार माध्यम के लोग जनता को क्या समझ रहे हैं।”

इस पर अनेक लोगों ने अपनी भंड़ास निकाली कुछ शालीन तरह के अपशब्दों का प्रयोग भी हुआ। तब मुझे हिन्दी ब्लोग जगत की बहुत याद आयी। आखिर वह सज्जन मुझसे बोले–”यार, तुम्हारा ब्लोग कभी देखता हूँ तो कभी नहीं।वैसे आजकल तुम क्या लिख रहे हो?”

तब मैंने कहा-”आप अगर सबसे रुष्ट हैं तो मेरे ब्लोग पर नारद,ब्लोगवाणी, चिट्ठाजगत और हिन्दी ब्लोग के लोगो लगे हैं उन पर चले जाईये तो वहाँ और भी लिखने वाले हैं। अगर आप मेरे ब्लोग से नहीं जाते तो मैं आपको उनके पते देता हूँ।”

एक अन्य सज्जन ने पूछा-”वहाँ लोग क्या लिखते हैं?”
मैंने हंसकर कहा-”जो आप बोल रहे हैं वैसा ही वहाँ भी लिखते हैं।”
दूसरे सज्जन ने कहा-”हम तो अपनी भंड़ास निकाल रहे हैं।”
मैंने अपने परिचित सज्जन से कहा-”अगर आप कहैं तो हमारे कई ब्लोगर इस मामले में भी बहुत आगे हैं और मैं आपके पढ़ने के लिए उनके ब्लोग के लिंक अपने ब्लोग पर लगा दूं। आप उनके नाम से ही समझ जायेंगे कि वह आपकी भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।”
उन सज्जन से पूछा-”क्या लिखते हैं?”
मैंने कहा-”जो आप बोल रहे हैं। वह भी समाज के असंतोष को आपकी भाषा में ही व्यक्त करते हैं हाँ, कभी-कभी वह सीमाएं लाँघ जाते हैं पर हमेशा नहीं।”

फिर बातचीत आगे भी हुई पर उन लोगों के मन का असंतोष देखकर मैं हिन्दी ब्लोग जगत के बारे में सोच रहा था। इस समय सभी प्रचार माध्यम अपनी आभा खो रहे हैं। वह दर्शकों और पाठकों की पसंद के अनुसार अपनी सामग्री प्रस्तुत करने का दावा करते हैं पर उनके लिए इस पसंद को नापने का कोई वास्तविक आधार भी नहीं है। अभी देश में उंगली पर गिनती करने लायक लोगों को ब्लोग के बारे में मालुम है। कई लोग हमारे ब्लोग पढ़ जाते होंगे तो उनको पता ही नहीं होगा के हमें वेब साईट देखी या ब्लोग। उनको यह भी नहीं मालुम होगा कि पोस्ट के नीचे कमेन्ट लिखने की जगह भी होती है जहाँ लिखकर लेखक का हौंसला बढ़ाना चाहिए।

मगर जब इसका प्रचार होगा और लिखने और पढ़ने वाले बढेंगे तब इसके स्वरूप में बहुत बदलाव आयेगा। अभी प्रचार माध्यमों पर काम करने वाले लोग स्वयं अपने जजबातों पर नियंत्रण रखते हैं पर ब्लोग पर इसकी गुंजायश अधिक है कि आप चाहे जैसे लिखें। मैंने लिखा अपशब्द तो लोग समझ सकते हैं कि वह किस तरह के होंगे पर कुछ दूसरे के समझने की उम्मीद न कर सीधे लिख जायेंगे। आक्रोश चारों तरफ फैला हुआ है। उसमें सभी लोगों से अपने शब्द और भाषा पर नियंत्रण की आशा करना बेकार है। समय के साथ ब्लोगरों की संख्या बढेगी तो अपने विचार की अभिव्यक्ति के लिए कुछ लोग आयेंगे तो कुछ लोग अपनी भंड़ास निकालने वाले भी कम नहीं होंगे। साहित्य हमेशा समाज का दर्पण होता है। समाज की सामान्य उथल-पुथल, घर-परिवार की घटनाएँ और देश का सामान्य वातावरण कहानियों, व्यंग्यों, कविताओं के रूप में अभिव्यक्त होता है पर अगर सब जगह आक्रोश है तो वह भंड़ास के रूप में व्यक्त होगा और उसे रोकना मुश्किल होगा।

यह आलेख मैं रात को शांति से चिंतन करते हुए लिख रहा हूँ जो मुझे अपने मित्र ब्लोगरों ने मुहैया किया है और चूंकि उनके द्वारा मेरा लिखा पढे जाने का खतरा नहीं है इसलिए यह लिख रहा हूँ। वह पढ़ते तो कहते कि क्या यहाँ पहले ही कम असंतोष है जो तुम उसे और हवा दे रहे हो। मगर सच यही है कि लोगों के मन में आक्रोश है और वह भंड़ास की रूप में होगा तो दूसरा उज्जवल पक्ष भी है कि हिन्दी में लिखने और पढ़ने वालों की संख्या भी बढेगी।

One Response to “अभिव्यक्ति और भंड़ास-हास्य व्यंग्य”

  1. Bharat dweep g. Sadar namaskar.

    Awashya hi blog man ka asantosh aur dil ka haras nikalne ki jagah hai. parantu is kone men baithkar chupchap woh karna jo ek bada sahityakar karta hai prashansniya hai.

    Is global dharti par jab chahun owr angrazy ka dhoop karak ban kar nikla hua hai aapne Usi andaz men hindi ki chhatri lagakar prashansniya kaarya kiya hai.

    Abi light cut gaya hai aur UPS warning de raha hai

    Isliye baad men milte hai

    Shubh Weeda

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