जमाने के रास्ते हम क्यों जाते हैं-हिन्दी शायरी

भीड़ में अलग दिखने की कोशिश
करते लोग बहक जाते हैं
कोई उन्हें देख रहा है
यही सोचते रह जाते हैं
तमाम तरह के स्वांग रचते
जो किसी को नहीं पचते
जैसा देखते हैं खुद को आईने में
वैसे ही लोग देख रहे हैं
इस भ्रम में करते हैं श्रृंगार
अंहकार  का होता व्यवहार
अपनी आँखों जैसा जमाने को पाते  हैं

इस भीड़ में कौन देखता है किसको
पता नहीं लगता पर
अपने को दिखता सभी पाते हैं
बनावटी अदाओं का खेल होता यहाँ
मीठ बोल में भी असली मिठास कहाँ
लोग अपनी अदाओं से पकडे जाते हैं

ऐसे में अपने चमकने का है
एक ही रास्ता 
लोग चलें झूठ की तरफ
हम चलें सच की तरफ
जमाने की हो  खोटी नीयत
हमें रखना है दिल साफ
जिसकी होती है बहुतायत
उसकी कदर कम हो जाती है
जिसका मिलना हो मुश्किल
वह अदा लोगों को छू जाती है
फिर जाता है ज़माना जिस रास्ते
उस रास्ते हम क्यों जाते हैं
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