कवि मन को कभी नहीं समझ पाओगे-कविता

कवि से उसने कहा
‘तुम कवितायेँ ही लिखते रहोगे
या लोगों की भीड़ में भी सुनाओगे
इस तरह लिखने से क्या फायदा
लोगों की वाह-वाह लूटो
मंच पर चढ़कर सुनाओ बाकायदा
वरना तुम न नाम पाओगे न नामा
कोई तुम्हारा नाम नहीं लेगा
अकेले बैठकर पछताओगे”

कवि ने कहा
”शब्दों के ग्राहक तो बहुत हैं
वाह-वाह शब्द के वाहक भी बहुत हैं
पर अर्थों को कितने समझते हैं
भावों में कितने बह सकते हैं
इसका हिसाब भी किया करो
मैं ही लिखूं और सुनाऊं
अर्थों से बहरे लोगों से ताली बजवाऊँ
भावों में बहना तो मुझे ही है
अकेला रहूँ या भीड़ में जाऊं
भीड़ में जाकर सुनाने से अच्छा है
कुछ और कविता लिखूं
अपनी नजर से कवित्व का बोध होते दिखूं
रंग-बिरंगे पंडाल में
लाइटों की रौशनी में
आकर्षण बहुत होता है
पर मन के अँधेरे को कोई दूर नहीं कर सकता
मेरा कवि मन ही है वह प्रकाश पुंज
जो मन में रौशनी हमेशा कर सकता
तालियों में अपनत्व
थालियों में घनत्व
ढूंढते हो तुम, कवि मन को नहीं समझ पाओगे
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5 Comments

  1. mehek
    Posted February 26, 2008 at 4:16 PM | Permalink

    bahut sundar kavita hai,kavi man ki bhav sachhe pragat huye hai,awesome.

  2. Posted February 26, 2008 at 4:19 PM | Permalink

    उफ़, एक और सच्चाई और समय की जंग! सुन्दर और सजीव रचना!

  3. Posted February 26, 2008 at 4:46 PM | Permalink

    बहुत बढिया लिखा है।

    जो मन में रौशनी हमेशा कर सकता
    तालियों में अपनत्व
    थालियों में घनत्व
    ढूंढते हो तुम, कवि मन को नहीं समझ पाओगे

  4. Posted February 27, 2008 at 1:35 AM | Permalink

    बेहतरीन-सत्य वचन. कवि मन को कौन समझ पाया है.

  5. sandhya rathore
    Posted February 28, 2008 at 2:37 PM | Permalink

    kavai k man ko aur kavi k man k gahraeyo ko koe nahe chu sakta.aur na he koe padh sakta hai vah to sagar k saman hay .


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