तरक्की का यही है खेल-हास्य कविता

पढें फारसी बेचें तेल
पढें अंग्रजी खाली बैठें दण्ड पेल
लेकर डिग्री ढूंढते नौकरी
तभी मिलेगी दहेज़ के साथ
दुल्हन के रूप में कोई छोकरी
तब तक निठल्ले घूमेंगे
या सट्टे वाला खेलेंगे खेल

अनपढ़ और अनगढ़ के लिए
काला अक्षर भैस बराबर
पर फिर भी शुद्ध दूध का मालिक होता
मौज करता भैस चराकर
पढें लिखें तो चाकरी के लिए
घूमते इधर-उधर
लोगों से नजरें चुराकर
मिल भी जाये गुलामी तो
साहब का लेबल लगाए घूमते
भले ही दिल की आजादी नहीं होती
पर दिखाने की खूब करते
चलते बोस के इशारे पर
दिखाते जैसे खुद रहे हों खेल

पढ़ना बना देता है पाखंडी
लगा देता बेकारों की मंडी
आजादी तो अब रह गयी है दिखावे की
गुलामों की फौज बढ़ रही है
तरक्की का यही हैं खेल

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