अब यह खेल आम आदमी का नही रहा-आलेख

क्रिकेट के खिलाडियों की बोली को लेकर लोग आश्चर्य चकित हैं पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं है. बीस ओवरीय विश्वकप में भारत की जीत को भुनाने के लिए कुछ ऐसा होगा इसकी मुझे संभावना लग रही थी. मेरी उत्सुकता इस बात को लेकर थी की भारत के उन तथाकथित स्टार खिलाडियों को कैसे ‘एडजस्ट’ कैसे किया जायेगा जिन्हें उस विश्वकप प्रतियोगिता को महत्वहीन बताते हुए ले नहीं जाया गया था. आज खिलाडियों की बोली देखकर सब समझ में आ गया. उन खिलाडियों की बोली नहीं बल्कि उनको आइकोन बनाया गया कहीं ऐसा न हो कि उनकी कोई बोली नहीं लगाए. इतना ही नहीं क्रिकेट के प्रति राष्ट्र प्रेम का जज्बा न रहे इसलिए विदेशी खिलाडियों की भी बोली लगी. एंड्रू साईमंड जिसे अभी कुछ दिन तक भारत में खलपात्र प्रचारित किया गया वह भी बोली के मामले में दूसरे स्थान पर है.

कुल मिलाकर बीस ओवरीय विश्व कप में भारत की जीत को विस्मृत करने का यह एक प्रयास मात्र है क्योंकि उसमें वरिष्ठ खिलाडियों के लिए कोई स्थान नहीं है और बाजार के लिए वह पसंदीदा लोग हैं. वैसे जिस तरह टीवी पर यह दिखाया जा रहा है उससे अब आदमी को अपने बिकने पर कभी शर्म नहीं आयेगी. खिलाडियों के लिए जिस तरह बिकना-बिकना शब्द का प्रयोग किया जा रहा है उसके बाद सब भले लोग अपने आपको किसी भी क्षेत्र में बिकने के लिए प्रस्तुत करेंगे.

अभी कोई कहेगा कि ”तू बिक गया है तो आदमी लड़ने के लिए तैयार हो जाता है पर अब प्रतिवाद में कहेगा’मुझमें काबलियत है इसलिए बिका,तुझमें नहीं है इसलिए नहीं बिक सकता है और मुझसे जलता है’. कुछ दिन पहले जिन लोगों ने आस्ट्रेलिया में भारतीय टीम के साथ जो व्यवहार हुआ था उस पर अपना गुस्सा दिखाया था आज वह सोच रहे होंगे कि हम कहाँ गलत थे. अगर नहीं सोच रहे तो सोचें उस समय जिसने खलपात्र की भूमिका निभाई वह आज बोली में नंबर दो का हीरो है. अब यह पता नहीं है कि कोई पटकथा पहले की लिखी हुई है या त्वरित गति बदलते हुए दृश्यों के साथ लिखी जा रही है. सुनते हैं कि फिल्मों में तो कोई भी पटकथा दृश्य-दृश्य दर तय होती है और पहले से तयशुदा पटकथा में तमाम तरह के परिवर्तन भी आते हैं. फिल्म वालों के साथ क्रिकेट वालों के सोहबत देखकर मैं पहले भी लिख चुका हूँ कि अब क्रिकेट फिल्म के पैटर्न पर चलेगी. यही हो रहा है.

मगर हमारे लिए यह क्रिकेट वह खेल है जिसमें बल्ले और बैट के खेल के साथ उसमें हम जैसे दर्शकों के जज्बात भी होते हैं और जिस तरह के क्रिकेट की बात हो रही है उसमें आम आदमी की दिलचस्पी होगी इसमें हमको संदेह है. पहले तो एक ही हीरो को फिल्म वालों ने मैदान पर उतारा था पर अब तो और भी हीरो-हीरोइन इस बोली के मैदान में उतर आये हैं और समझ में नहीं आ रहा कि यह चल क्या रहा है? जो समझ में आ रहा है उसे बिना किसी प्रमाण के अनुमान से कैसे लिखें. अभी तो यह खेल मैदान में खेला जा रहा था पर होटलों में बोलियों का खेल भी इसका हिस्सा हो रहा है जो कि इतनी आसानी से समझा नहीं जा सकता. पहले क्रिकेट के खिलाड़ी फिल्मी स्टाइल में रैंप पर नाचे और अब फिल्म वालों को क्रिकेट में बोली का खेल फिल्मी स्टाइल में खेलते देखकर हैरानी हो रही है.

अजीब दृश्य है. जैसे कभी फिल्मों में हीरो और हीरोइन या उनके माँ-बाप के मकान की कुर्की लगते देखते थे अब टीवी पर खिलाडियों के लिए ऐसे दृश्य देखकर हैरानी हो रही है. कम से कम यह आम आदमी का खेल जैसा पहले था अब नहीं रहा है. अब लोग मैच के स्कोर, खिलाडियों के प्रदर्शन और पिच से अधिक इस पर चर्चा अधिक करेंगे कि किस खिलाड़ी की बाजार रेट क्या है?

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