सहज तराजू आनि के, सब रस देखा तोल
सब रस माहीं जीभ रस, जू कोय जाने बोल
संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि संसार में विभिन्न प्रकार के रस हैं और हमने सब रसों को सहज स्वभाव की ज्ञान -तुला पर तौलकर देख-परख लिया है। सब रसों में जीभ का रस सर्वोत्तम एव अधिक वजन वाला है। उसे वही जान सकता है जो अपने शब्द और वाणी का सही उपयोग करना जानता है।
मुख आवै सोई कहै, बोलै नहीं विचार
हटे पराई आतमा, जीभ बाँधि तलवार
संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि कुछ नासमझ लोग ऐसे हैं जो कभी भी सोच समझकर नहीं बोलते और मुहँ में जो आता है बक देते हैं। ऐसे लोगों की वाणी और शब्द तलवार की तरह दूसरों को कष्ट पहुँचाते हैं।
Posted by mehhekk on February 15, 2008 at 3:05 PM
realy beautiful thought.
Posted by मीनाक्षी on May 13, 2008 at 4:12 PM
हम यहाँ जो भी पढ़ते हैं उनमें से कुछ पर तो अपनी उपस्थिति दर्ज करनी ही चाहिए, आपकी कल की पोस्ट से लगा कि आपको पता भी नहीं चलता और हम यहाँ से अनमोल वचन आत्मसात करके चलते बनते हैं.
कबीर के दोहे जितनी बार पढ़ते हैं और पढ़ने की लालसा जाग जाती है.