निठल्ले करते हैं काम की बातें
और जो करते काम किसी को नहीं सुनाते
हो गया है जमाने का अंदाज यही
बातों में जीता, विजेता कहलाता वही
नाम फ़ैल रहा है चहूँ और उनका
जो करते दहाड़ने जैसी बात
फिर छिप जाते है अपने दडबों में
सो जाते हैं फैलाकर अपनी लात
लड़ते हैं लोग सड़क पर
पत्थरों के हिसाब की कौन देखे खाताबही
जिनके पसीने से रोशन होता जहाँ
भला किस कागज़ पर उनका नाम होता
लिखने वाला कोई होता ईमानदार तो
ताजमहल क्यों बादशाह के नाम लिखा होता
जिन्होंने सींचे हैं अपने गुलशन
गरीबों की खून से
वही मालिक उनके
रहबर भी कहलाये
पसीना बहाने वाले रचयिता का
नाम भला कौन देखता
बातों से बहल जाते लोग
जिनके पास दौलत के अंबार हैं
विजेता भी कहलाये हैं वही
शहर बसते हैं पत्थर से
और पत्थर हो जाते
चलते हैं लोग बुतों की तरह
निठल्ले हैं जो लोग
अपनी पहचान खुद ही बतलाते
पर फिर अपना इतिहास खुद ही रचाते
चलता है जमाने में सच की तरह वही
पर सच फिर भी शाश्वत है
जहाँ दर्ज होते हैं बेईमानी से इतिहास
वहाँ प्रश्नों के ढेर उसे झुठलाते
नाम भले ही लेते हों पर
अनामों को उनके पसीने पर सलाम बजाते
इतिहास भरा है झूठ से
पर चलता है ज़माना उनकी राह पर
जो सत्य का रास्ता बताया
कितना भी बादशाह और साहूकार
किताबों में स्थान घेर लें
पर परोपकार से खाली होती उनकी खाता बही
अपने पसीने से जो सींचते है
आदर्शों का गुलशन
असली विजेता कहलाते हैं वही
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One Comment
पर सच फिर भी शाश्वत है
yea, you’re right there….