मनुष्य की अपने स्थान से दूसरी जगह पलायन करना एक स्वाभाविक प्राकृतिक प्रक्रिया है और इसे रोकना लगभग असंभव है. अगर किसी स्थान से कुछ लोग दूसरे स्थान के लिए पलायन करते हैं तो वहाँ किन्हीं का आगमन भी होता है. इस पृथ्वी को बने करोडों वर्ष हो गए हैं और पश्चिमी विज्ञान और भारतीय अध्यात्म के प्राचीन ग्रंथ इस बात की पुष्टि करते हैं. अपने क्षेत्र से पलायन कर दूसरे क्षेत्र में जाना हर जीव की प्रकृति और उसे रोकने का अर्थ है प्रकृति के विपरीत कार्य करना.
हम यहाँ मनुष्यों की बात करें तो उसकी बुद्धि में अन्य जीवों की अपेक्षा विवेक तत्व की प्रधानता है और जो उसके मन को अनेक कारणों से पलायन के लिए बाध्य या प्रेरित करता है जबकि पशु पक्षी केवल अपने भोजन और पानी की उपलब्धता के अभाव और जलवायु के प्रतिकूल होने की स्थिति में ही अपने इलाके से दूसरे इलाक़े की तरफ पलायन करते हैं. अन्य जीवों में भी द्वंद्व होते हैं पर मनुष्यों में बुद्धि में विवेक तत्व की प्रधानता के कारण झगड़े कम होते हैं पर जब होते हैं तो भयानक होते हैं. अन्य जीवों में कमजोर जीव अगर झगड़े से थोडे दूर चला जाए तो वह बच जाता है पर मनुष्य तो अपनी बौद्धिक ताक़त से बहुत दूर तक जा सकता है और तमाम तरह के अपराध भी कर सकता है.
हम यहाँ अब केवल मनुष्यों की बात करें. सदियों से एक गाथा गाई जाती हैं कि’ हम सब एक ही सर्वशक्तिमान के कृपा से यहाँ पैदा होते हैं और जीवन धारण करते हैं:इसके बावजूद कोई इस उपदेश पर चल कर उसे अमल नहीं करता. आम जीवन में सभी भेदात्मक बुद्धि से अपनी राय कायम करते हैं. जाति, भाषा , क्षेत्र, नस्ल, और संस्कृति विविधता में बांटकर मनुष्यों का समूह अपनी रक्षा के लिए जुट जाता है. समूह का नेतृत्व करने वाले लोग अपने समूह पर शासन करने के लिए दूसरे समूहों का भय खड़ा करते हैं. आम तौर से लोग समूहों को अपने व्यवसाय, परिवार और अकेले होने के भय से अपनाते हुए शांति पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं पर जब किसी समूह के मुखिया को लगता है की उसकी अपने समूह पर पकड़ कम हो रही हैं तो वह कुछ ऐसे भय उपस्थति करता है जो अस्तित्व में ही नहीं होते. खासतौर से वह मुखिया जिनको लगता है कि उनकी पकड़ कमजोर हो रही हैं वह अपना सम्मान बचाने के लिए ऐसे भयों का निर्माण करते हैं जो एक कोरी कल्पना अधिक कुछ नहीं हैं.
यहाँ कोई एक प्रसंग नहीं दिया जा सकता क्योंकि ऐसा सदियों से होता आ रहा है. मुखियाओं के नाम बदल सकते हैं और समूहों के भी पर मूल प्रकृति नहीं. पहले राजा लोग ऐसा ही करते थे, और आज भी ऐसा ही हो रहा है मैने कोई दो वर्ष पहले एक पत्रिका में लेख लिखा था और वह किसी अन्य प्रसंग में था और आज मैं उसे देख रहा था तो यह देखकर हैरानी हुई की उसमें लोगों के जाति, भाषा , क्षेत्र और धर्म के नाम पर समूहों पर मैने वही लिखा था जो आज लिख रहा हूँ क्योंकि इन समूहों के मुखिया उनका उपयोग बहुद्देशीय रूप में किसी भी प्रसंग में करते हैं. हर बार वह अपने समूह के सामने दूसरे समूह का कल्पित भय उपस्थित करते हैं
पहले तो अपने क्षेत्र से बाहर पलायन कर गये व्यक्ति की सफलता का गुणगान करते हैं जैसे उसने वहाँ जाकर अपने समूह का परचम फहरा दिया है. यह बात इस तरह कही जाती है की बाकी लोगों को भी वहाँ जाने का कभी न कभी अवसर मिलेगा. इससे भी काम न बने तो बाहर से आए किसी व्यक्ति या समूह का भय दिखाते हैं. ‘वह अपनी भाषा चला रहा है’ अपने संस्कार यहाँ दिखा रहा है’ ‘अपनी भाषा फैला रहा है’ और अपना धर्म फैला रहा है’आदि बातें कहकर लोगों को पहले चिंतित किया जाता है. अपनी भाषा , धर्म जाति, धर्म और समाज पर ख़तरे की आशंका समूह के लोगों को डरा देती है. चिंताएँ स्वाभाविक है-’हमारे बेटे का रोज़गार कैसे लगेगा’, समाज के दूसरे लड़कों का भी रोजगार नहीं बना तो हमारी बिटिया का विवाह कैसे होगा’ ‘समूह के बिना हमारा अस्तित्व कहाँ रहेगा-यह डर आदमी में पैदा होता है. डर हमेशा आदमी को ख़तरनाक बनाता है. और उन समूहों के लोगों में से सक्षम व्यक्ति अपने मुखिया के कहने पर कुछ भी करने के लिए तिया हो जाते हैं.
मगर इन संघर्षों के बावजूद किसी भी क्षेत्र से न तो लोगों का पलायन रुकता है और न ही आगमन. मन आदमी को कहीं भी ले जाता है. कहते हैं की छोटे शहरों से लोग बडे शहरों की तरह रोजागर के लिए पलायन करते हैं, पर बडे शहरों से भी लोग अपने विकास के लिए विदेशों में जाए हैं. हमेशा ऐसा नहीं होता. कई लोग अपने जीवन में परिवर्तन के लिए भी पलायन करते हैं. कुछ लोग क्षेत्र में बदनाम होकर भी दूसरी जगह पलायन करते हैं. आदमी को बताने के लिए बहाने होते हैं पर उसका मन जानता है की वह एक अनजानी खुशी पाने के लिए भी अपना स्थान छोड़ता है. आजकल हमने ऐसे भी किस्से सुने हैं की लोगों ने पंद्रह-पंद्रह लाख रूपये विदेश में जाने के लिए खर्च किये हैं. इतनी बड़ी रकम क्या किसी गरीब के पास होती है? कई लोगों ने इससे भी अधिक खर्च किये हैं तब लगता है की इतना पैसा होते हुए भी आदमी विदेश क्यों जाना चाहता है?
ढेर सारे बहाने होते हैं: सब कुछ होते हुए भी आदमी दूसरी जगह बसने का मन बना सकता है और वहाँ बसने के लिए अपने को मूल स्थान से उजाड़ना भी जरूर है. कई लोग यह भी करते हैं. बडे शहर अगर छोटे शहर से भागे हुए लोगों की शरणगाह बनते हैं तो बडे शहरों के भागे हुए लोगों के लिए यही भुमिका छोटे शहरों की भी है. मतलब कई उद्देश्यों से आदमी का मन उसे पलायन के प्रेरित करता है और उसे रोकना कभी संभव नहीं है.
भारत पर सदियों तक हमले हुए. कहते हैं देश में एक नहीं था. हम इसे यह भी कह सकते हैं की लोगों के पास एक स्थान से दूसरे स्थान के और पलायन करने की सुविधा नहीं थी. विदेशे हमलावर एक-एक इलाके को जीतते गए और वहाँ से सैनिकों के साथ आगे बढ़ते रहे. लोगों के सहानुभूति किसी के साथ नहीं थी क्योंकि उनके भी तो इधर आने के भी रास्ते खुलते गए. यहाँ हर राज्य और समूह का मुखिया बस अपने आसपास के राज्यों और समूहों का खतरा देखते और दिखाते रहे और विदेशी हमलावर पूरे देश में छा गए. कई प्रकार की भाषा बोलने वाले यहाँ हिन्दी वाले हो गए. कई जातियों का तो पता नहीं हमारे समाज में भी घुल-मिल गयीं .
लोग कहते हैं की हमें अपनी संस्कृति, भाषा, जाति और धर्म बचाने हैं.यह नारे लगते हैं पर उनका मूलभूत स्वरूप क्या है कोई नहीं बताता. क्या दूसरे समूह में इंसान नहीं है, क्या उनकी कोई भाषा नहीं है. क्या दूसरे समूह में आदमी और औरत का आपस में कोई रिश्ता नहीं होता. इन प्रश्नों कोई उत्तर नहीं देता. बस उनको तो भय खडा करना है ताकि अपने समूह को काबू में रख सकें. मैं अपने लेख को पढता हुआ यह लिख रहा हूँ. कोई संदर्भ देने की जरूरत नहीं लगती. उस लेख को में किसी दिन अपने ब्लोग पर रखूंगा क्योंकि वह तीन हजार शब्दों का है, उसका संदर्भ आज प्रासंगिक नहीं है पर उसमें आज भी कुछ ऐसी बातें है वह आगे भी कई प्रसंगों पर लागू होने वाली हैं. बिना संदर्भ का यह लेख हास्यासपद हो सकता है. मैंने इसे मन में आते-जाते ख्यालों की तरह लिखा है.(क्रमश:)