अपनी जिन्दगी अपने दम पर-कविता
रास्ते पर देख कर चला करो
गड्ढे बहुत हैं अगर कहीं गिर गए तो
कोई उठाएगा नहीं
क्योंकि गिरों हुओं को उठाने का चलन
जमाने में बंद हो गया है
ऊंची आवाज में बोलो अपने शब्द
लोगों के कान से आगे बात
इतनी आसानी से नहीं जाती
शहर में शोर बहुत हो गया है
अपने चेहरे पर पोतो श्रृंगार
खूब करो अपना प्रचार
नहीं करो कोई विचार
सादगी से हर कोई बोर हो गया है
अगर चला सकते हो
अपनी जिन्दगी अपने दम पर
नहीं रहना चाहते जमाने के रहम-ओ-कर्म पर
तो इसकी कोई जरूरत नहीं नहीं
क्योंकि हर आजाद ख्याल शख्स
इंसानों की जात के लिए बदचलन हो गया है
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bahi bahut khub har aazad khayal shaksh vali pankti,gazab kaha,sundar.