हमने ओढ़ ली खामोशी-कविता
कोई दे गया गाली तो
खामोशी ओढ़ ली हमने
बदले में देते हम भी
पर लगता मामला बढ़ने
वह तीन देता हम तीस देते
बढ़ती गालियों की संख्या
झगडे बढ़ने से तो भला क्या डरते
पर समय और शब्द
व्यर्थ बर्बाद करने से क्या फायदा
पहले ही घेर रखा तरह-तरह के गम ने
जीता होगा वह भी ग़मों में
तभी तो दे गया गाली
दिमाग में तनाव कर गया खाली
मन में बजा रहा होगा अपने लिए ताली
देता होगा दिल में खुशी की बात बनने
वैसे हम नहीं भूलते हिसाब किसी का
प्रेम का हो या नफरत का
प्रेम वालों से निभाने में अगर आगे हैं
तो नफ़रत करने वालों से भी लेते हैं सबक
जिन्दगी लगती हैं अपने आप संवरने
गाली से किसी को नहीं हराएंगे
शब्द बहुत है हमारे मन में
कभी गंभीर होते तो
कभी कसते हैं व्यंग्य
निकल पड़ते हैं स्वत:
जो रास्ता दिया हमने
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कुछ तो लोग कहेंगे…लोगों का काम है कहना….
बेफाल्तू में अपना वक्त ज़ाया करने से बेहतर है चुप्पी साध लेना…
जो खामोश रह कर किया जा सकता है वो बरस कर नहीं किया जा सकता है…
थोथा चना बाजे घना….
बरसने वाले बादल गरजा नहीं करते….
वैसे भी आपके शब्दों की मूसलाधार तो जारी है ही…
खामोश रह कर अपना काम करते रहना ही बेहतर है बन्धुवर…
तरीका भी सही है और अंदाज-ए-बयां भी।
वेहद सुंदर कविता , मन को छू गयी , बधाईयाँ !