समाज के अच्छे कामों का भी ठेका बुरे लोगों के पास-आलेख
कई बार कई भले लोगों के दिमाग में विचार आता है कि अपने वर्तमान आम को बदलकर दूसरा काम कर लूं पर अब जब इधर-उधर देखता तो उसे लगता है कि अब भले आदमी के लिए कोई काम नहीं बचा।
आज टीवी चैनलों पर एक खबर देख रहा था तो सोच रहा था कि आखिर हर अच्छे काम के सूत्र उन्हीं लोगों के हाथ में क्यों पहुँचते हैं जो अपराधी हैं। खबर एक डाक्टर के बारे में थी जो अब कानून का वंचित मुजरिम है।उसके बारे में बताया जा रहा है कि वह गैर कानूनी रूप से किडनी बेचने का काम करता था। इतना नहीं उसने फिल्मों में भी पैसे लगाने के साथ उनमें अभिनय और वितरण तक काम भी अपने हाथ में ले रखा था।
ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ। ऐसे अनेक मामले आते हैं जब किसी के बारे में कोई रहस्योदघाटन होता है तो उसके व्यासायिक कामों की सूची इतनी बड़ी होती है कि लगता है कि क्या कोई काम बचा है जिसे भले लोग कर सकें। और तो और गरीबों के लिए कल्याण की बात लिखते और कहते हुए भी डर लगता है कि कहीं कोई संदिग्ध दृष्टि से न देखने लगे। अगर कहीं किसी की मदद करें तो किसी से चर्चा करना बेकार लगता है क्योंकि लोग समझेंगे कि जरूर यह उसका कोई फायदा उठाएगा। इस देश की समस्या यह नहीं है कि कुछ लोग बुरे काम कर रहे हैं बल्कि समस्या यह है कि भले काम भी बुरे लोग करने लगे हैं।
मान लीजिये आप भले आदमी हैं और अपनी कालोनी या मोहल्ले में कोई कवि सम्मेलन या कोई धार्मिक कार्यक्रम कराना चाहते हैं इस्ल्के लिए भद्र लोगों से चन्दा मांगें तो हर कोई मना कर देगा. अगर कोई ताक़तवर व्यक्ति-जिसके डर के कारण सब कथित रूप से इज्जत करते हैं- पहुंच जाये तो उसे हर कोई कुछ न कुछ जरूर देगा यह सोचकर’पता नहीं कब इससे काम पड़ जाये’।
इस तरह समाज की पूरी सता ऐसे लोगों के पास पहुंच गयी है जो अपने फायदे के लिए समाज हित का काम करते हैं। धीरे-धीरे यही लोग अब खूंखार होते जा रहे हैं क्योंकि उनको लगता है के सर्वशक्तिमान के बाद इस दुनिया में अपने इलाके के सबसे अधिक ताक़तवर लोग हैं और चाहे जो कर सकते हैं.
कुल मिलाकर संकट इस बात का नहीं है कि समाज पर स्वार्थी और असामाजिक तत्वों का वर्चस्व है बल्कि निस्वार्थी और भले लोगों की निष्क्रियता इसके लिए जिम्मेदार है. बुरे लोगों के अपने निहित स्वार्थ होते हैं और उनका संगठन बहुत आसानी बन जाता है जबकि निस्वार्थी और भले लोग अच्छे काम के लिए संगठन तो बना लेते हैं पर कोई आर्थिक लाभ न होने से वह बनकर ही रह जाते हैं. ”कौन फालतू के चक्कर में पड़े’-यह भाव उनको निष्क्रिय कर देता है. कहीं स्वार्थी तत्व ऐसे संगठन बनाते हैं तो उसका संचालन भी करते हैं. कहीं तो भले लोग जो अपने संगठन चलाने के इच्छुक होते हैं ऐसे लोगों को ढूंढते हैं जो थोडे दमदार हों और उनकी मदद कर सकें.
इस तरह पूरा समाज ही उन लोगों के नियंत्रण में जो अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं. देश और समाज के हर बुरे काम तो वह करते ही हैं अच्छी कामों का ठेका भी बहले लोगों ने उनको दे दिया है.
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