संत कबीर वाणी:पढ़ कर पत्थर और लिख कर ईंट होते लोग

चतुराई क्या कीजिए, जो नहिं शब्द समाय
कोटिक गुन सूवा पढै, अन्त बिलाई खाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि उस चतुरता का क्या लाभ जब किसी प्रकार के ज्ञान की बात हृदय में नहीं समाती. करोडों प्रकार के गुणों की बात सुनकर तोता सीखता-पढता है पर अवसर आने पर बिल्ली उसको खा जाती है.

पढ़ि-पढ़ि के पत्थर भये, लिखी भये जू ईंट
कबीर अंतर प्रेम का, लागी, नेक न छींट

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं संसार के लोग बहुत पढ़-पढ़ का पत्थर के समान और लिख-लिख कर ईंट की तरह कठोर हो जाते हैं. उनके अंतर्मन में तनिक भी छीन नहीं लगी, इसलिए व सरल सरस ह्रदय के सच्चे मनुष्य नहीं बन पाए

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