संत कबीर वाणी:जो सात्विक नहीं उसे संत नहीं कहा जा सकता


कबीर विषधर बहु मिलै, मणिधर मिला न कोय
विषधर को मणिधर मिलै, विष तजि अमृत होय

संत कबीर दास जी कहते हैं कि विषधर सर्प तो बहुत मिलते हैं पर मणि वाला सर्प नहीं मिलता। यदि विषधर को मणिधर मिल जाय तो विष मिटकर अमृत हो जाता है।

भावार्थ-कहते हैं कि जहाँ सांप ने काट लिया हो वहाँ मणि लगाने से विष निकल जाता है। वही मणि दूध में डाल कर पीया जाये उसका कोड भी दूर हो जाता है (हालांकि इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है)। आशय यह है कि यहाँ बुर लोगों की संगत के कारण बुरी आदतें तो बहुत जल्दी आ जाती हैं पर अच्छे की संगत बहुत जल्दी नहीं मिल पाती है और अगर मिल जाये तो अपने आप ही अच्छे संस्कार विचार मन में आ जाते हैं।

चाल बकुल की चलत हैं, बहुरि कहावैं हंस
ते मुक्ता कैसे चुंगे, पडे काल के फंस

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो लोग चाल तो बगुले की चलते हैं और अपने आपको हंस कहलाते हैं, भला ज्ञान के मोती कैसे चुन सकते हैं? वह तो काल के फंदे में ही फंसे रह जायेंगे। जो छल-कपट में लगे रहते हैं और जिनका खान-पान और रहन-सहन सात्विक नहीं है वह भला साधू रूपी हंस कैसे हो सकते हैं।

संकलन कर्ता का अभिमत-आजकल हमने देखा होगा कि धर्म के क्षेत्र में ऐसे लोग हो गए है जो बातें तो आदर्श की करते हैं पर उनका ऐक ही उद्देश्य होता है कि अपने लिए माया का अधिक से अधिक संग्रह करते हैं कहने को वह साधू संत कहलाते हैं और उनके द्वारा प्रायोजित शिष्य भी उन्हें भगवान का अवतार कहते हैं पर उन्हें कभी भी उन्हें आध्यात्मिक गुरू नही माना जा सकता है। उनकी वाणी में हमारे पुराने धर्म ग्रंथों का महा ज्ञान तोते की तरह रटा हुआ होता है और उनका सामान्य व्यवहार देखकर कभी भी यह नही कहा जा सकता कि वह उसे धारण किया हुआ है। ऐसे लोगों को धर्म का व्यापार करने वाला तो कहा जा सकता है पर साधू-संत नही माना जा सकता है चाहे वह कितना भी जतन कर लें।

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