कोई हारता और कोई जीतता
कोई कैसे बांचता और कोई कैसे सुनाता
चुनाव का खेल ऐसा है
लड़ने और लड़ाने वाले योजना बनाते
लिखने वाले अपने मन के
अनुसार शब्दजाल रचाते
कैमरे के सामने अकड़ने वाले
भांड बनकर वोट मांगने
चौराहे पर आते
सब सोचते हैं आम आदमी को
समझ में कुछ नहीं आता
कर देता पल भर में खेल
निकल देता हैं सब का तेल
पता है अब आये हैं
फिर पांच बरस नहीं आयेंगे
उसके बाद भी चाल,चरित्र और
चेहरा बदल कर आयेंगे
रोज देखता है वह जो चेहरे
कोई तेल बेचता है
कोई शैंपू के लिए करता है अपील
मांगे आते हैं वह भी वोट
देता है अपने चेहरे की दलील
धन्य है वह लोग
जो लोकतंत्र में अपना कर्तव्य निभाते हैं
अपने घर से बाहर निकल आते हैं
अब जैसी मर्जी आये जिसकी
वैसी पोस्ट मार्टम रिपोर्ट बनाता
आम आदमी बैठा मुस्कराता
One Comment
अच्छा व्यंग्य किया है राजनिति पर।
One Trackback
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