यह बात नहीं जमती है
नई सड़कें पहली बरसात में
ही अपनी जगह से लापता हो जातीं है
और फिर अखबारों में भी
सुखियाँ पातीं है
उसी तरह
बेईमानी के रास्ते पर चलते-चलते
मशहूर हो जाते हैं सभी लोग
ईमानदार पर शर्मसार
गैरों में जानता ही कौन
अपनों में ही उनको
इज्जत नहीं मिल पाती है
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कुछ तोड़कर नया बनाने की बात
बहुत अच्छी लगती है
कुछ मिटाकर फिर जोड़ने की
बात भी बहुत फबती है
पर इंसान की असलियत मिटाकर
इन्सानियंत को पैसे से पिटवाकर
चल जाये यह दुनिया
कभी बात नहीं जमती है
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बहुत सही लिखा है आपने अपनी कविता में । दुनिया की बहुत सारी बातें नहीं जमती हैं परन्तु फिर भी होती रहती हैं ।
घुघूती बासूती