जब शब्दों की जंग होती है
जब जंग शब्दों से होती है
तब जीत अर्थों में होती हैं
कटु वाक्य कर सकते हैं
लोगों में सनसनी पैदा
पर सामग्री बेसिरपैर की होती है
तलवार लोहे की हो या शब्दों की
काम नहीं करती जब
भाषा के कमान से निकले
तीक्ष्ण शब्दों की मार होती है
चिल्लाना, गुर्राना और मजाक
उडाने से काम नहीं चलता
जहाँ व्याकरण का दाव चलता है
अलंकार से सजे और रस में नहाए शब्द
का रुआब सब जगह चलता है
कहैं दीपक बापू
बिना पढे साहित्य
लिखने वाले बहुत देखे
पर पढ़कर जिन्होंने लिखा
उनके शब्दों में सात्विक भाव देखे
ए लिखने वालों कुछ पढ़ भी लिया करो
बिना अध्ययन के लिखना ऐसे ही है
जैस बिना गुरु के चेला चलता है
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This entry was written by
दीपक भारतदीप, posted on
December 18, 2007 at 5:37 PM, filed under
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