मन को झूठ के सहारे कब तक बहलायें

यूं ही कहीं देख लें बाग़
तो दिल मचल जाता है
फोटो में ही क्यों न देख लूं वृक्ष
शेर कहने का जजबात उमड़ आता है
देखते हुए नकली दृश्य
अब ऊबने लगा है मन
जहाँ देखता है हरियाली को लहराते हुए
वही ठहर जाता है
घर में चीखता हुआ टीवी
रास्ते में वाहनों की भयानक आवाजें
जीवन का ऐसा हिस्सा बन गईं है
कि धीमी चलती हवा में
पेडों के हिलते पत्तो की मधुर आवाज
कहीं सुन ले तो खुश हो जाता है
पंच तत्वों से बने शरीर में रहने वाले
मन को कब तक
झूठ के सहारे बहलायें
धरतीपुत्र पेडों से भला वह कब दूर रह पाता है
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One Comment

  1. rajender gaur
    Posted December 26, 2007 at 3:08 AM | Permalink

    JIVAN KE SUKH DUKH ICHA SABHI TO PRASTITHI AUR SAMYA KE ANUSAR HOTE HAI.

    SABHI TO KISI NA KISI PATRA KO JI RAHE HAI EK HI SATHAN OR VASTU SE ALAG ALAG VAYKATI ALAG ALAG ARTH OR BHAV GREHN KARTE HAI APNE APNE ANUBHAV V MANSIK STHITHI OR JIVAN KE RANG SE SAROBAR SABHI KO USI RANG ME CHAHTE OR SOCHTE HAI


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