करते रहो समर्पण भाव से अपना कर्म
इधर जाएँ कि उधर
यह कभी तय नहीं कर पाए
जिस माया को पाने की चाहत है
उसके आदि और अंत को समझ नहीं पाए
चारों और फैली दिखती है रोशनी
पर कभी हाथ से पकड़ नहीं पाए
कहीं इस घर मे मिलेगी
कहीं उस दर पर सजेगी
और कहीं किसी शहर में दिखेगी
उसके पीछे दौडे जाते लोग
जितना उसके पास जाओ
वह उतनी दूर नजर आये
सौ से हजार
हजार से लाख
लाख से करोड़
गिनते-गिनते मन की भूख बढती जाये
कहै दीपक बापू
माया की जगह जेब में ही है
उसे सिर मत चढ़ाओ
इधर-उधर देख क्यों चकराये
पीछे जाओगे तो आगे भागेगी
बेपरवाह होकर अपनी राह चलोगे
तो पीछे-पीछे आयेगी
जितना खेलोगे उससे
उतना ही इतरायेगी
मुहँ फेरोगे तो खुद चली आयेगी
आदमी की पास उसका है धर्म
करते रहो समर्पण भाव से अपना कर्म
सत्य का यही है मर्म
जीवन के खेल में वही विजेता होते
जो सत्य के साथ ही चल पाए
—————————
Filed under: Blogroll, Deepak bharatdeep, E-patrika, Thought, arebic, bharat, edcation, friednds, hindi, hindi megazine, hindi poem, hindi sahitya, hindi thought, hindi tv, hindi writer, india, inglish, kavita, knowledge, life, online journalism, shayri, sher, social, telent, urdu, vividha, web bhaskar, web dunia, web duniya, web jagaran, web pajab kesari, web times, अभिव्यक्ति, आध्यात्म, क्षणिका, चिन्तन, ताल-बेताल, दीपक भारतदीप, विश्वास, शेर, शेर-ओ-शायरी, संस्कार, समाज, साहित्य, सृजन, हास्य कविता, हास्य-व्यंग्य, हिंदी साहित्य, हिन्दी
सच है बन्धु…जितना पीछे भागेंगे…वो उतना दूर होती जाती है…
तृष्णा ही ऐसी है कि कम होने के बजाए बढती ही जाती है…
दा होल थिंग इज़ दैट के …
बाप बडा ना भैय्या…
सबसे बडा रुपैय्या…
कहा जाता है कि मनुष्य के जीवन में आवश्यकता होती है पद,प्रतिष्ठा, पैसा,प्रशंसा और प्रसिद्धि की , मगर मनुष्य को केवल पैसा ही दिखाई देता है , क्या करेंगे यही तो माया है .