ऐसा कोई सयाना नहीं रहा

कोई हमारे दर्द को आकर सहलाये
इस चाह में इन्तजार करने का
ज़माना अब नहीं रहा
किसी के दर्द को सहलाकर
हम अपने दिल को तसल्ली कर लें
पर किसी के दिल का हिस्सा बन जाएं
ऐसा नाम कमाना नहीं रहा
जिन्दगी के इस सफर में
हमसफ़र कई बनाते हैं
पर बस जाएं किसी के साथ
जिन्दगी भर के लिए
ऐसा आशियाना अब नहीं रहा
वादे करें खूब
नकली बाग़ में
दिखाए नकली दूब
छोड़ जाएं बेरहम
जब मझधार में रहें डूब
किसी की जिन्दगी में अमृत घोलकर
अपने लिए भी सुख ढूंढ लें
ऐसा कोई सयाना नहीं रहा
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2 Comments

  1. Posted December 7, 2007 at 3:09 AM | Permalink

    “कोई हमारे दर्द को आकर सहलाये
    इस चाह में इन्तजार करने का
    ज़माना अब नहीं रहा”…

    निराशा के भाव को बहुत अच्छी तरह उकेरा है आपने शब्दों में…

    बधाई….

  2. Posted December 7, 2007 at 12:34 PM | Permalink

    दीपक जी
    कड़वी सच्चाई बयां की है आपने. सुंदर शब्द और उतने ही अच्छे भाव.बहुत खूब .
    नीरज


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