शक्तिशाली लोग हर जगह समाज की फिक्र करें
मलेशिया में भारतवंशियों के आन्दोलन पर वहाँ की सरकार का बराबर रवैया अत्यंत चिंता का विषय है और हर समय विभिन्न देशों में मानवाधिकारों के हनन का मामला उठाने वाले अनेक अंतर्राष्ट्रीय संगठन इस पर खामोश हैं क्योंकि उस समुदाय की न तो कोई आर्थिक ताकत है और न ही राजनीतिक आधार है.
मलेशिया में भारतवंशियों की हालत इस बात का द्योतक है शांति, सहिष्णुता और सात्विकता के भाव जो हमारे देश के लोगों में हैं और कहीं भी नहीं है. अंग्रेजों ने भारत के आर्थिक एवं मानवीय स्त्रोतों का अपने लिए खूब इस्तेमाल किया और जब इसके कठिनाई आई तो छोड़ कर चले गए. अंग्रेज जाते-जाते भारत का बंटवारा करते गए ताकि यह देश कभी अधिक शक्तिशाली न बन सके तो भीं उन्होने एक लंबे समय तक भारत विरोधी ताकतों को समर्थन दिया ताकि यह देश विवादों में फंसा रहे. आज पश्चिमी राष्ट्र जिस आतंकवाद के संकट में है वह उनकी ही देन है और यही वजह है एशिया के आम लोगों की उनके साथ कोई सहानुभूति नहीं है. इसके बावजूद किसी में इतना साहस नहीं है कि पश्चिमी मूल के लोगों को तंग कर सके.
भारत के लोगों की आर्थिक ताकत तो बढ़ रही है पर सम्मान नहीं बढ़ रहा, इसका सीधा आशय यही है कि जिनके पास आर्थिक और सामाजिक ताकत है वह समाज की वैसी ही फिक्र नहीं कर रहे जैसे पश्चिमी राष्ट्र के लोग करते हैं, यही कारण है कि पश्चिमी देशो के अलावा जहाँ कहीं भी भारतीय हैं उनको सम्मान नहीं मिलता. यह भी हो सकता है कि विश्व में भारतीय समाज के बढ़ती ताकत से खिसियाह्ट के कारण ऐसा हो रहा हो-क्योंकि इस समाज के धन और शक्ति से संपन्न लोगों से लाभ लेना चाहते हैं इसलिए उनसे सही व्यवहार करते हैं पर मन की खिसियाह्ट श्रमिक और कर्मचारी वर्ग के लोगों पर उतारते हैं.
मलेशिया कोई इतना संपन्न राष्ट्र नहीं है कि वह आर्थिक रूप से भारत की परवाह नहीं करें इसलिए भारत के आर्थिक राजनीतिक और सामाजिक रूप से संपन्न लोग अपने प्रभाव का उपयोग करें तो ऐसा नहीं है कि वहाँ की सरकार को भारतवंशियों के साथ सही व्यवहार करने का सन्देश दिया जा सके. हालांकि इस्लामिक राष्ट्र होने के साथ वह राजनीतिक रूप से चीन का साथी है और हो सकता है कि भारतवंशियों के साथ दुर्व्यवहार किसी सोची समझी राजनीति के तहत किया जा रहा हो पर अगर भारत के शक्तिशाली लोग अपने समाज के लिए प्रतिबद्धता दिखाएँ तो ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है. इसमें हमें संदेह नहीं है कि इस समय विश्व के आर्थिक जगत पर भारतीय चमक रहे है पर मन में होते हुए भी अपने समाज के लिए प्रतिबद्धता नहीं दिखाते यही कारण है कि जहाँ जाते हैं वहाँ अपने परिश्रम और लगन से वहाँ का विकास करते हैं पर सामाजिक रूप से सम्मान नहीं अर्जित कर पाते क्योंकि वह अपने समाज से अलग दिखने का प्रयास करते हैं. अब समय आ गया है कि जैसे आर्थिक जगत में दीवारें टूट रहीं है वैसे ही सामाजिक क्षेत्र मी दीवारें तोड़कर पूरे विश्व की भारतीय समाज को एक माना जाना चाहिऐ.
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आपके विचारो से सहमत हूँ
अपनी ताकत दिखाना सिखे भारत या विश्व सत्ता बनने का स्वप्न देखना छोड़ दे. “रोने से राज नहीं मिलता”
भायो, भगवान ने सबको दिमाग दिया है, भारतीयों को भी। लेकिन उसका उपयोग वे भारत की जगह विदेशों में अधिक कर पाते हैं। तो वे वहीं का विकास करेंगे। उन्हें भारत के साथ जोड़कर झूठी उम्मीदें मत पालिये।