जिसने ढूंढें हैं सहारे
आकाश में चमकते सितारे भी
नहीं दूर कर पाते दिल का अंधियारा
जब होता है वह किसी गम का मारा
चन्द्रमा भी शीतल नहीं कर पाता
जब अपनों में भी वह गैरों जैसे
अहसास की आग में जल जाता
सूर्य की गर्मी भी उसमें ताकत
नहीं पैदा कर पाती
जब आदमी अपने जज्बात से हार जाता
कोई नहीं देता यहाँ मांगने पर सहारा
इसलिए डटे रहो अपनी नीयत पर
चलते रहो अपनी ईमान की राह पर
इन रास्तों की शकल तो कदम कदम पर
बदलती रहेगी
कहीं होगी सपाट तो कहीं पथरीली होगी
अपने पाँव पर चलते जाओ
जीतता वही है जो उधार की बैसाखियाँ नहीं माँगता
जिसने ढूढे हैं सहारे
वह हमेशा ही इस जंग में हारा
——————————————
Filed under: Deepak bharatdeep, E-patrika, Global Dashboard, aducation, arbe, arebic, art, bharat, edcation, friednds, hasya kavita, hindi, hindi megazine, hindi poem, hindi sahitya, hindi story, hindi thought, hindi writer, kavita, knowledge, media, shayri, sher, social, urdu, web bhaskar, web dunia, web duniya, web jagaran, web pajab kesari, web times, writing, yakeen, अनुगूँज, अनुभूति, अभिव्यक्ति, कविता, क्षणिका, चिन्तन, दीपक भारतदीप, विचार, विश्वास, व्यंग्य चिंतन, शायरी, शेर, शेर-ओ-शायरी, साहित्य, सृजन, हास्य कविता, हास्य-व्यंग्य, हिंदी साहित्य, हिन्दी | Tagged: कविता, व्यंग्य, साहित्य, हास्य, हिन्दी, hasya, hindi, internet, vyangy
अंतिम पंक्तियां दिल को छू गई, वाह ।
आरंभ
जूनियर कांउसिल